मामला एलोपैथी बनाम आयुर्वेद का नहीं, बल्कि हेल्थ पालिसी का है

                                                                                                                                     

डा आर अचल
डा आर अचल

कोरोना बनाम चिकित्सा की लड़ाई को बड़ी सफाई से एलोपैथी बनाम आयुर्वेद में बदल कर नदियों में बहती लाशों को छुपा दिया गया . हालाँकि दोनो ही नहीं दुनिया की सारी चिकित्सा पद्धितयों की आज ज़रूरत है.

चीन,जापान,ताइवान,वियतनाम,क्यूबा,हंगरी,सू़डान,गुयना,मेडागास्कर,मैक्सिको आदि देशो ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ अपनी पारम्परिक चिकित्सा विधियों को अवसर देखकर कोविड की लड़ाई जीत चुके है।ऐसे समय मे भारत की जनता को केवल आधुनिक चिकित्सा के संसाधनो का विकल्प दिया गया है। एलोपैथी के सारे मेडिकल कालेज,अस्पताल अपनी क्षमता के अनुसार प्रयोग(Practice) कर रहे है।

इधर आयुर्वेद के चार संस्थानों अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान दिल्ली,चौधरी ब्रह्मप्रकाशआयुर्वेद चरक संस्थान दिल्ली,तिब्बिया कालेज दिल्ली,नेशनल इंस्टिट्यूट आफ आयुर्वेद जयपुर,आयुर्वेविश्वविद्यालय जामनगर,एवं केरल,तमिलनाडु,महाराष्ट्र,के कुछ संस्थानो को छोड़ सभी आयुर्वेदिक,यूनानी संस्थाओ में लाकडाउन है तथा इनके कुछ चिकित्सक व फैकल्टी,मेडिकल अफसर एलोपैथी प्रोटोकाल के अनुसार एलोपैथिक कोविड अस्पतालों में खप रहे है।

ऐसे समय में एक आयुर्वेदिक दवा निर्माता ने एलोपैथी चिकित्सा विधि पर मृत्यु का आरोप लगा कर आयुर्वेद उद्धारक छवि प्राप्त कर ली है। हाँलाकि आयुर्वेद के निजी शिक्षण संस्थायें महामारी काल में खुद आइसोलेशन मुद्रा में है।यहाँ सवाल एलोपैथी चिकित्सा विधि पर उठाने के बजाय सरकारी तंत्र व नीतिनिर्माताओं से पूछना चाहिए कि केवल एलोपैथी को यह अवसर क्यो दिया गया है ? 

आयुर्वेद अस्पतालों,आयुर्वेद कालेजो को आयुर्वेदिक कोविड सेंटर क्यों नहीं बनाया गया।यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि चीन व ताईवान ही अपने पारम्परिक चिकित्सका कोविड सेंटर बना कर प्रयोग किया है।वैश्विक प्रोटोकाल तोड़ने के लिए पिछले साल ताइवान को विश्वस्वास्थ्य संगठन से बाहर कर दिया गया था।  

यह सवाल उनसे पूछा जा रहा है जो सरकार द्वारा अधिकृत होकर कार्य कार्य कर रहे है,जबकि सवाल उनसे होना चाहिए जिन्होने अधिकृत किया है यथा आयुर्वेद अस्पतालों के प्रतिबंधित किया है।

नीति निर्माताओं का रवैया यह है कि पिछले साल कोविड के पहले दौर में स्वास्थ्य मंत्री ने मार्च में यह स्पष्ट कर दिया था कि इस महामारी में आयुष की कोई भूमिका नहीं है।परन्तु कुछ आर्वेदिक एक्टीविस्टो के प्रयास से सरकार ने काढा का फार्मुला सार्वजनिक कर आयुर्वेद बचाव तक समित कर दिया ,  जिसके लिए आयुर्वेद आदि विधियों के चिकित्सको की कोई जरूरत नहीं है।

नीति निर्माताओं का रवैया यह है कि पिछले साल कोविड के पहले दौर में स्वास्थ्य मंत्री ने मार्च में यह स्पष्ट कर दिया था कि इस महामारी में आयुष की कोई भूमिका नहीं है।परन्तु कुछ आर्वेदिक एक्टीविस्टो के प्रयास से सरकार ने काढा का फार्मुला सार्वजनिक कर आयुर्वेद बचाव तक समित कर दिया ,  जिसके लिए आयुर्वेद आदि विधियों के चिकित्सको की कोई जरूरत नहीं है।

पुनः एक्टिविस्टो के प्रभाव से संकोच करते हुए एक आयुर्वेदिक प्रोटोकाल जारी किया ।जिसका लाभ यह हुआ कि कुछ आयुर्वेद चिकित्सक कोविड रोगीयों को चिकित्सा करने लगे है,परन्तु उस प्रोटोकाल की दवायेंसरकारी अस्पतालो,मेडिकल कालेजो में नहीं पहुँचाया जा सका,अब वेचारा आय़ुष चिकित्सका क्या करे ?

एलोपैथी बनाम आयुर्वेद की लड़ाई में मजेदार बात यह है कि जो एलोपैथी चिकित्सक चिकित्सा विज्ञान मे रुचि रखते है वे आयुर्वेदादि चिकित्सा विधाओं का भी अध्ययन करते है,वे आयुर्वेद को आभासी कहने के बजाय डेटा बेस आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग करते है,ऐसे बहुत से एलोपैथिक चिकित्सक मिल जायेगे,जो एलोपैथी  छोड़ कर आयुर्वेदादि से प्रेक्टिस करते है।आयुर्वेद के प्रति वही एलोपैथिक चिकित्सक व संगठन उपेक्षा का भाव रखते है,जो चिकित्सा विज्ञान को सेवा व ज्ञान के बजाय केवल धन कमाने का जरिया मानते है। 

इधर आयुर्वेद के 98 प्रतिशत चिकित्सक एलोपैथी चिकित्सा करते है।जिसका कारण स्कूलिंग है,वे अपने स्कूल टाइम मे कभी यह नहीं देख सके कि एलादि वटी से वमन(उल्टी) ठीक होता है तथा महाज्वरांकुशरस,त्रिभुवनकीर्ति से ज्वर भी उतरता है। वे एलोपैथिक अस्पतालों में इन्टर्न करके एलोपैथी हो जाते है।उन्हे कभी विश्वास ही नही हो पाता है कि आयुर्वेद में वमन,ज्वर,रक्तस्राव की दवाये है।

 इस मामले में ऐसा भी है कि आयुर्वेद के बहुत  से विद्वान जो नीतिनियामक पदों पर बैठे है वे न स्वयं  आयुर्वेदिक दवाये खाते है,किसी रोगी को खिलाते है,भला उन्हे कैसे विश्वास हो कि कोरोना का इलाज आयुर्वेद की दवाओं से भी हो सकता है , जबकि आज विश्वास दिलाने का समय है, सरकार से अवसर माँगने का समय है.

 पर यहाँ तो आयुर्वेद के लोग ऐलोपैथी पर एक व्यक्ति से सवाल उठाने पर लहालोट है,जबकि जरूरत यह थी सरकार से आयुर्वेद के लिए अवसर मांगने की,बजट बढाने की ।

यहाँ विश्वास संकट का एक मामला यह है कि जो हमारे नेता मंचों से आयुर्वेद को महान बताते है वे बीमार पड़ने पर,एम्स वेदांता के रास्ते अमेरिका पहुँच जाते है,यदि वे आयुर्वेद के एम्स AIIA,BHU,NIA मे चिकित्सा कराते तो रातो रात देश की हताश जनता,आयुर्वेद अस्पतालों मे लाइन लगा देती,परन्तु इसके लिए आयुर्वेद के चिकित्सकों को भी तैयार होना चाहिए।

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