डॉ. कफील का क्यों रहा विवादों से वास्ता और जाना पड़ा जेल…

बीआरडी मेडिकल कॉलेज गैस कांड से मशहूर हुए...

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल के  डॉ. कफील खान  का लगातार आक्सीजन गैस कांड पर बोलना और सरकार पर उंगली उठाना उनके लिए मुसीबत बनता रहा।

वह लम्बे समय से रासुका के तहत मथुरा जेल में बंद है।

आज उच्च न्यायालय ने उनकी रासुका को अनुचित बताते हुए रद्द कर दिया और उनकी रिहाई के आदेश दे दिए हैं।

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ऑक्सीजन कांड का सच अब भी पर्दे में

दस अगस्त को गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुए ऑक्सीजन कांड के तीन वर्ष पूरे हो गए।

पूरे देश को हिला देने वाली इस घटना का पूरा सच अभी तक सामने नहीं आ सका है।

पुलिस की जांच पूरी हो गई है और अब मामला अदालत में है। सभी नौ आरोपी जमानत पर रिहा हैं।

हालांकि इसमें से एक डॉ. कफील राष्ट्र्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत में पिछले पांच महीने से हिरासत में है।

जेल में रहते हुए और जमानत पर रिहा होने के बाद डॉ. कफील को छोड़ और किसी ने इस बारे तीन वर्ष में कभी अपना मुंह नहीं खोला।

ऑक्सीजन कांड को लेकर सबसे अधिक मुखर डॉ. कफील ही रहे। पिछले तीन वर्ष में उन्होंने एक वर्ष से ज्यादा समय जेल में गुजारा।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि डॉ. कफील खान को क्या ऑक्सीजन कांड में चुप न रहने की सजा मिल रही है?

क्या हुआ अब तक

दस अगस्त 2017 को शाम 7.30 बजे बीआरडी मेडिकल कॉलेज में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई खत्म हो गई।

जम्बो ऑक्सीजन सिलेंडर से ऑक्सीजन आपूर्ति करने का प्रयास हुआ, लेकिन सिलेंडर पर्याप्त संख्या में नहीं थे।

नतीजतन दस और 11 अगस्त तक बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस वार्ड और नियोनेटल वार्ड में 34 बच्चों की जान चली गई।

कुल नौ लोगों को आरोपी बनाया गया-

ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स के निदेशक मनीष भंडारी, बीआरडी मेडिकल कॉलेज के तत्कालीन प्रधानाचार्य डॉ. राजीव मिश्रा और उनकी पत्नी डॉ. पूर्णिमा शुक्ला, बाल रोग विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. कफील खान।

इसके अलावा एनस्थीसिया विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.. सतीश कुमार, चीफ फार्मासिस्ट गजानंद जायसवाल, सहायक लिपिक लेखा कार्य संजय त्रिपाठी, सहायक लिपिक सुधीर कुमार पांडेय, कनिष्ठ सहायक लेखा अनुभाग उदय प्रताप शर्मा।

सभी गिरफ्तार, फिर मिली जमानत

गिरफ्तार हुए और जेल गए। सबसे पहले मनीष भंडारी को नौ अप्रैल 2018 को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली।

इसके बाद डॉ. कफील खान जमानत पर 28 अप्रैल को रिहा हुए।

फिर डॉ. सतीश कुमार, डॉ. राजीव मिश्रा और डॉ. पूर्णिमा शुक्ला को जमानत मिली।

आखिर में गजानंद जायसवाल, संजय त्रिपाठी, उदय शर्मा, सुधीर पांडेय को जमानत मिली।

संजय त्रिपाठी, उदय शर्मा और सुधीर पांडेय के अलावा सभी के खिलाफ विभागीय जांच बैठाई गई।

विभागीय जांच पूरी होने के बाद डॉ. सतीश, डॉ. राजीव मिश्रा मार्च 2020 में बहाल हो गए।

तीन महीने तक काम करने के बाद डॉ. मिश्रा बीते 30 जून को रिटायर हो गए।

उनकी पत्नी डॉ. पूर्णिमा शुक्ला अगस्त 2019 में रिटायर हो गई थीं।

डॉ. सतीश कुमार अभी बीआरडी मेडिकल कॉलेज में काम कर रहे हैं।

फार्मासिस्ट गजानंद जायसवाल को बहाल करने की प्रक्रिया चल रही है। उनके रिटायर होने में सिर्फ एक महीना बचा है।

कुछ पर अभी जाँच ही शुरू नहीं

लिपिक उदय शर्मा, सुधीर पांडेय और संजय त्रिपाठी के खिलाफ अभी तक विभागीय जांच शुरू नहीं हो पाई है, इसलिए वे अभी भी सस्पेंड चल रहे हैं।

महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण ने 25 जुलाई को बीआरडी के प्रधानाचार्य को पत्र लिखकर तीनों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही के शीघ्र निस्तारण को कहा है।

ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स लिमिटेड भी पहले की तरह काम कर रही है।

अप्रैल 2020 में उसे दो चिकित्सा संस्थानों में गैस पाइप लाइन का काम भी काम मिल गया था।

मीडिया में मामला सामने आ जाने पर टेंडर निरस्त करने की बात कही गई और जांच के आदेश दिए गए.

दो आरोपों में कफील को मिली क्लीन चिट

डॉ. कफील के खिलाफ विभागीय जांच दो वर्ष बाद अगस्त 2019 में पूरी हो गई। यह जांच रिपोर्ट मीडिया में लीक हो गई।

इस जांच रिपोर्ट में चार आरोपों में से दो पर डॉ. कफील को क्लीन चिट मिल गई जबकि दो में उन्हें आंशिक रूप से दोषी ठहराया गया।

इस जांच रिपोर्ट को सरकार ने नहीं माना और फिर से विभागीय जांच शुरू करा दी।

इसके अलावा उन पर बहराइच के जिला अस्पताल प्रकरण में लगाए गए तीन आरोपों की जांच कराई जा रही है।

सरकार ने क्लीन चिट को नहीं माना

सरकार की ओर से कहा गया कि शासन ने डॉ. कफील खान को क्लीन चिट नहीं दी है।

उनके खिलाफ अनुशासनहीनता, भ्रष्टाचार, कर्तव्य पालन में घोर लापरवाही के कुल सात आरोप हैं, जिनकी जांच चल रही है।

डॉ. कफील 13 फरवरी से रासुका के तहत मथुरा जेल में बंद हैं।

रासुका लगाए जाने के पहले उन्हें अलीगढ़ विवि के गेट पर सीएएए-एनआरसी के खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने वाला भाषण देने का आरोप लगाते हुए 29 जनवरी को रात 11 बजे मुंबई में गिरफ्तार किया था।

इस केस में जमानत मिलने के चार दिन बाद भी उन्हें रिहा नहीं किया गया और उन्हें रासुका लगा दी गई।

मई में तीन महीने बाद रासुका की अवधि और तीन महीने के लिए बढ़ा दी गई।

डॉ. कफील की चुप्पी और फिर बोलने की सज़ा!

ऑक्सीजन कांड के बाद लगभग छह महीने महीने तक डॉ. कफील चुप रहे, इस प्रकरण में कुछ नहीं कहा।

हालांकि इस दौरान उन पर प्राइवेट प्रैक्टिस करने, ऑक्सीजन चोरी, बलात्कार का आरोपी होने जैसे आरोप लगाए गए।

उनके जेल जाने के बाद परिजन भी चुप्पी साधे रहे।

दिसंबर 2017 में मैंने उनके घर जाकर परिजनों से बात करने की कोशिश की, तो सभी ने हाथ जोड़कर कहा कि वे इस प्रकरण पर कुछ नहीं कहना चाहते।

डॉ. कफील ने अपनी रिहाई के करीब एक महीने पहले 17 अप्रैल 2018 को पहली बार इस बारे में कुछ कहा।

जेल से लिखा पत्र

उन्होंने जेल से लिखे एक पत्र में बताया कि उन्हें और दूसरे चिकित्सकों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।

यह घटना सिस्टम फेल होने की है।

इस पत्र में उन्होंने 10 अगस्त की रात की घटना को भी बयां किया था।

उन्होंने लिखा था, ‘मैंने हर वो संभव प्रयास किया जो मैं उन मासूम बच्चों की जिंदगियों को बचाने के लिए कर सकता था।

मैंने पागलों की तरह सबको फोन किया, गिड़गिड़ाया, बात की, यहां-वहां भागा, गाड़ी चलाई, आदेश दिया, चीखा-चिल्लाया, सांत्वना दी, खर्च किया, उधार लिया, रोया।

मैंने वो सब कुछ किया जो इंसान के रूप में किया जाना संभव था।’

नाराज हो गये थे योगी 

इस उन्होंने पत्र में उन्होंने यह भी लिखा कि उनकी जिंदगी में उथल-पुथल उस वक्त शुरू हुई जब 13 अगस्त की सुबह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बीआरडी अस्पताल पहुंचे।

उन्होंने कहा, ‘तो तुम हो डॉक्टर कफील जिसने सिलेंडर्स की व्यवस्था की।

मैंने कहा, ‘हां सर’ और वो नाराज हो गए। कहने लगे ‘ तुम्हें लगता है कि सिलेंडरों की व्यवस्था कर देने से तुम हीरो बन गए, देखता हूं इसे।’

पत्र में था जिम्मेदारों की ओर इशारा

इस चिट्ठी में उन्होंने ऑक्सीजन हादसे के जिम्मेदारों की तरफ स्पष्ट इशारा किया था-

‘पुष्पा सेल्स द्वारा अपनी 68 लाख की बकाया राशि के लिए लगातार 14 बार रिमाइंडर भेजा गया।

इसके बावजूद अगर इस संदर्भ में लापरवाही बरती गई और कोई कार्यवाही नहीं की गई तो इसके लिए गोरखपुर के डीएम, डीजी मेडिकल एजुकेशन और स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी दोषी हैं।

यह पूरी तरह से एक उच्च स्तरीय प्रशासकीय विफलता है कि जिन्होंने स्थिति की गंभीरता को नहीं समझा।

हमें जेल में डालकर उन्होंने हमें बलि के बकरे की तरह इस्तेमाल किया ताकि सच हमेशा-हमेशा के लिए गोरखपुर जेल की सलाखों के पीछे दफ्न रहे।’

स्थितियों ने डाला दूसरे रास्ते पर

डॉ. कफील करीब सात महीने जेल में रहने के बाद वह हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर 28 अप्रैल 2018 को रिहा हुए।

जमानत पर रिहा होने के बाद भी उन्होंने यह बात दोहराई।

रिहा होने के बाद वह शांति से परिजनों के साथ रहना चाहते थे लेकिन स्थितियों ने उन्हें एक बार फिर उन्हें दूसरे रास्ते पर डाल दिया।

जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने एक मई को मुझसे एक इंटरव्यू में कहा था कि वह अब अपना पूरा समय परिवार को देंगे।

सरकार ने उन्हें बहाल कर दिया तो वे फिर से बीआरडी मेडिकल कॉलेज में काम करने लगेंगे।

मैंने पूछा था कि यदि सरकार ने उन्हें बहाल नहीं किया तो क्या करेंगे? तब उनका जवाब था कि इंसेफेलाइटिस के इलाज का एक सेंटर खोलेंगे।

कफील के भाई पर हमला

डेढ़ महीने बाद 10 जून को डॉ. कफील के छोटे भाई काशिफ जमील को गोली मार दी गई।

बुरी तरह घायल उनके भाई को जरूरी मेडिकल सेवाएं देने में भी पुलिस ने बाधा डाली।

डॉ. कफील मजबूती से लड़े और उनकी जान बचाने में सफल रहे।

पर आज तक गोरखपुर पुलिस खुलासा नहीं कर पाई कि किन लोगों ने काशिफ जमील पर जानलेवा हमला किया।

डॉ. कफील ने इस मामले में भाजपा के एक सांसद पर अपने भाई पर हमला करने आरोप लगाया था, जिसे लेकर काफी सनसनी हुई थी।

चाहे-अनचाहे विवादों में आते गये कफील

इसके बाद चाहे-अनचाहे डॉ. कफील निरंतर विवादों में आते गए।

सितंबर 2018 में बहराइच में अज्ञात बुखार से बच्चों की मौत के मामले में उन्होंने हस्तक्षेप किया।

 उन्होंने आशंका जताई कि बच्चों की मौत इंसेफेलाइटिस से हो रही है.

वह 22 सितंबर को बहराइच जिला अस्पताल पहुंच गए और वार्ड में जाकर बीमारी के बारे में जानने की कोशिश की.

अचानक वहां पुलिस आ गई और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.

चौबीस घंटे बाद जब वह छूटकर गोरखपुर आए, तो उन्हें धोखाधड़ी के एक केस में उन्हें बड़े भाई अदील अहमद के साथ 23 सितंबर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। करीब एक महीने बाद वह जमानत पर छूटे।

चिकित्सा शिविरों पर ध्यान केंद्रित किया

इसके बाद उन्होंने अपने को मेडिकल कैंपो के आयोजन पर केंद्रित किया।

गोरखपुर के ग्रामीण इलाकों में वह मेडिकल कैंप लगाने लगे. इस दौरान सोशल मीडिया पर उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई।

उन्हें जगह-जगह कैंप के लिए बुलाया जाने लगा।

वर्ष 2019 की गर्मियों में मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार का प्रकोप होने पर वह वहां गए और कई दिन तक मेडिकल कैंप किया।

वह असम और बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में भी गए और चिकित्सा कार्य किया. इसी दौरान वह हेल्थ फॉर ऑल कैंपेन से भी जुड़े।

डॉ. कफील के बड़े भाई अदील अहमद खान बताते हैं कि निलंबन अवधि के दो वर्षों में डॉ. कफील ने 103 निशुल्क चिकित्सा शिविरों में अपनी टीम के साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में 50,000 मरीजों की स्वास्थ्य सेवा की.

राजनीतिक आंदोलनों में हुए सक्रिय

चिकित्सा सेवा का कार्य करते हुए डॉ. कफील का जुड़ाव देश के तमाम सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं से भी हुआ और वे उनके कार्यक्रमों-आयोजनों में शिरकत की।

बीते साल के अंत में वे सीएए-एनआरसी के खिलाफ आंदोलन में भी सक्रिय रहे। इस दौरान उन्होंने कई जगहों पर सभाओं को संबोधित किया।

इसी कड़ी में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दिए गए भाषण को जिला प्रशासन ने भड़काऊ मान लिया और उनके खिलाफ केस दर्ज कर लिया।

इस मामले में उन्हें मुंबई से गिरफ़्तार किया गया और वह करीब एक महीने तक इस आरोप में जेल में रहे। फिर उन्हें जमानत मिल गई।

लेकिन जमानत मिलने के चार दिन बाद भी वह मथुरा जेल से रिहा नहीं हो सके। अलीगढ़ जिला प्रशासन ने रिहा होने के पहले उनके उपर राष्ट्र्रीय सुरक्षा कानून लगा दिया।

वे तबसे वह जेल में है। तीन महीने बाद उन पर रासुका की अवधि फिर तीन महीने बढ़ा दी गई.।

रिहाई की अपील

रासुका के तहत हिरासत को डॉ. कफील की मां नुजहत परवीन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने 14 मार्च को सुनवाई करते हुए कहा कि इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट को करनी चाहिए।

इसके बाद नुजहत परवीन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. तबसे से इस पर सुनवाई हो रही थी  और लगातार तारीख पड़ रही थी।

इस याचिका में प्रदेश सरकार की कार्यवाही पर मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर सवाल उठाया गया था।

पहला यह कि अलीगढ़ में दर्ज केस में जमानत मिल जाने के बाद चार दिन तक क्यों रिहा नहीं किया गया?

दूसरा, डॉ. कफील को उनके खिलाफ दर्ज सभी मामलों में जब जमानत मिल चुकी है तो फिर किस आधार पर उन्हें रासुका के तहत हिरासत में रखा गया?

तीसरा और समय के हिसाब से बेहद महत्वपूर्ण कि कोविड-19 संक्रमण के कारण जब जेल से कैदियों को रिहा किया जा रहा है, तो उन्हें रिहा करने के बजाय रासुका की अवधि तीन महीने के लिए और बढ़ा दी गई।

अदालत में तारीख पर तारीख

हाईकोर्ट में पिछली सुनवाई 27 जुलाई को न्यायाधीश शशिकांत गुप्ता और मंजूरानी चौहान की बेंच में हुई थी।

इसमें याची के अधिवक्ता को संशोधित याचिका दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय देते हुए पांच अगस्त की तारीख निर्धारित की गई।

पांच अगस्त को न्यायाधीश मनोज मिश्रा और दीपक वर्मा की बेंच ने सुनवाई की।

अपर शासकीय अधिवक्ता पतंजलि शर्मा ने कोर्ट में कहा कि याची की संशोधित याचिका शुक्रवार को उनके कार्यालय को मिली है।

इसका जवाब देने के लिए दस दिन का समय चाहिए।

इस पर कोर्ट ने उन्हें 19 अगस्त को सुनवाई की तारीख निर्धारित करते हुए अपर शासकीय अधिवक्ता को अपना जवाब दाखिल करने कहा।

कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी अपना हलफनामा 19 अगस्त को प्रस्तुत करने को कहा।

हाईकोर्ट में इस मामले में पूर्व में आठ जून, दस जून, 16 जून, सात जुलाई को सुनवाई हुई थी।

रिहाई के लिए संगठन भी कूदे

डॉ. कफील खान को जेल से रिहा कराने की लड़ाई  उनके परिजनों तक सीमित नहीं रही है।

विभिन्न संगठन इसकी लगातार मांग कर रहे थे  और अपने-अपने तरीके से आंदोलन व मुहिम चला रहे थे।

इस मुहिम में राजनीतिक दल भी शामिल हुए। कांग्रेस का अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ डॉ. कफील की रिहाई के लिए एक पखवाड़े का अभियान चला रहा था।

इस अभियान के तहत घर-घर जाकर डॉ. कफील की रिहाई के लिए हस्ताक्षर, मजारों पर चादरपोशी, दुआख्वानी, रक्तदान, ज्ञापन के कार्यक्रम किए जा रहे हैं, साथ ही सोशल मीडिया पर अभियान चलाया जा रहा है।

प्रियंका समेत कई नेताओं ने लिखा पत्र

कांग्रेस की महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी ने 30 जुलाई को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था. इस पत्र में उन्होंने मुख्यमंत्री से डॉ. कफील खान के साथ न्याय करने की अपील की थी।

प्रियंका गांधी के पत्र के बाद लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने पांच अगस्त को प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है।

आठ अगस्त को आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर डॉ. कफील को रिहा करने की मांग की है।

सोशल मीडिया पर अभियान

डॉ. कफील की पत्नी डॉ. शबिस्ता खान अपने पति की रिहाई के लिए सोशल मीडिया पर अभियान चला रही है।

22 जुलाई को अधिवक्ता मंच इलाहाबाद ने डॉक्टर कफील खान को बिना शर्त रिहा किए जाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट के सामने प्रदर्शन किया था।

इसके पूर्व 19 जुलाई को भाकपा माले, आइसा, इंकलाबी नौजवान सभा, इंसाफ नेयूपी, बिहार के गोरखपुर, देवरिया, बलिया, लखनऊ, मिर्जापुर, सोनभद्र, इलाहाबाद, वाराणसी, आजमगढ़ मऊ , चंदौली, गाजीपुर, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, रायबरेली सहित कई जिलों में विरोध प्रदर्शन कर डॉ. कफील को रिहा की रिहाई की मांग उठाई।

जेल से पत्र 

जेल में रहते हुए डॉ. कफील तीन पत्र लिख चुके हैं. सबसे पहला पत्र उन्होंने 19 मार्च को प्रधानमंत्री को लिखा था।

इस पत्र में उन्होंने कोरोना महामारी से लड़ाई में योगदान देने की इच्छा जताते हुए जेल से रिहा करने की मांग की थी ताकि वह लोगों की सेवा कर सकें।

पत्र में उन्होंने रासुका के तहत हिरासत को को अवैध और पूर्णतया गलत बताया था।

उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार के दबाव में कपटपूर्ण तरीके से बिना किसी आधार व सबूत के अलोकतांत्रिक तरीके से उन्हें जेल में रखा गया है।

फिर उन्होंने जून महीने में ईद के पहले एक पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने कोविड-19 के संक्रमण के बड़ी तेजी से बढ़ने की आशंका जताते हुए सरकार को प्रति दिन दस लाख टेस्ट करने का सुझाव दिया था।

उन्होंने अफसोस जाहिर किया कि इस चुनौतीपूर्ण समय में वह जेल में हैं और देश को अपनी सेवाएं नहीं दे पा रहे हैं।

इसके बाद हालिया चिट्ठी में उन्होंने जेल की यातनापूर्ण स्थितियों का वर्णन किया है।

ऑक्सीजन कांड पर सबने ओढ़ी खामोशी

डॉ. के साथ जो हुआ, यह इसी का डर समझा जाए या कुछ और, लेकिन आज तीन साल बाद भी ऑक्सीजन कांड पर आज भी कोई बोलना नहीं चाहता।

इससे जुड़े पक्ष खामोश रहते हैं, विशेषकर मीडिया से. उन्हें एक अनजाना भय घेरे रहता हैं कि बोलने पर मुसीबत में न फंस जाए।

ऑफ द रिकॉर्ड सभी कहते हैं कि डॉ. कफील को भी चुप ही रहना चाहिए था।

अप्रैल 2018 में जेल से छूटने के बाद एक सवाल के जवाब में डॉ. कफील ने यही कहा था कि उन्हें ऑक्सीजन कांड के छह महीने बाद तक चुप नहीं रहना चाहिए था।

उनसे यही कहा गया कि कुछ समय के लिए चुप हो जाओ, सब ठीक हो जाएगा लेकिन उनसे गलती हुई।

उन्हें पहले ही दिन ऑक्सीजन हादसे के बारे में बोलना चाहिए था. जेल में उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि जो सच वे जानते हैं, उसे बोलना जरूरी है भले इसके लिए फिर जेल क्यों न जाना पड़े।

रशाद लारी , गोरखपुर से

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