
किसी भी देश में अमीर, कम अमीर, मध्यमवर्गीय, गरीब और बहुत गरीब — सब रहते हैं। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के हिसाब से जरूरी चीजों से लेकर आरामदायक सुविधाओं तक कुछ न कुछ खरीदता है। जरूरी चीजों की माँग कभी नहीं रूकती क्योंकि उनका कोई विकल्प नहीं होता। जैसे-जैसे हम आरामदायक सुविधाओं की तरफ बढ़ते हैं, व्यक्ति अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से निर्णय लेता है।
अमीर व्यक्ति आरामदायक चीजों पर ज्यादा खर्च करता है। लेकिन उन चीजों के निर्माण में मध्यम वर्ग से लेकर गरीब तक सबका हिस्सा होता है। इसलिए उस निर्माण से जो संपत्ति बनती है उसका कुछ हिस्सा समाज के सभी वर्गों में बँटता है। समाज में असमानता थी — लेकिन खरीदने की क्षमता अपने-अपने स्तर पर थी।
संपत्ति का केंद्रीकरण
जैसे-जैसे technology विकसित होती गई, उत्पादन प्रक्रिया में इंसान की भूमिका कम होती गई। और संपत्ति का वितरण नहीं — केंद्रीकरण होने लगा।
हर साल Oxfam संस्था वैश्विक असमानता की रिपोर्ट प्रकाशित करती है। आप इसे अपने mobile पर भी देख सकते हैं। आर्थिक विशषकों का कहना है कि पिछले डेढ़ सौ सालों में सबसे ज्यादा असमानता आज है।
रोजगार विहीन विकास
आजकल Jobless Growth रोजगार विहीन विकास शब्द प्रसिद्ध है। इसका अर्थ ही बताता है कि अब growth के लिए jobs की जरूरत नहीं। बजार में AI के हजारों chatbots आ गए हैं। हर एक का अलग काम है। नए आते रहेंगे, और ज्यादा advanced होते रहेंगे। उससे और jobs कम होती जाएंगी। AI के साथ आई नई technology उत्पादन तूफनी रफ्तार से बढ़ा रही है। लेकिन लोगों की जेब में पैसा नहीं तो खरीदेगा कौन?
नई technology जरूरी चीजों के लिए इस्तेमाल होती है या आरामदायक चीजों के लिए? जरूरी चीजों की quality में ज्यादा बदलाव नहीं होता — इसलिए उन पर ज्यादा investment की जरूरत नहीं। जहाँ ज्यादा return मिलता है वहाँ पैसा लगाया जाता है। नई-नई आरामदायक चीजें बनाने में investment करने पर अच्छा return मिलता है — और वे महंगी होने पर भी बिकती हैं।
बेरोजगारी क्यों बढ़ती है
पहले इन आरामदायक चीजों के निर्माण में समाज के सभी तरह के लोगों का हिस्सा होता था। AI technology की वजह से अब इस उत्पादन के लिए बहुत कम लोगों की जरूरत पड़ती है। जिनकी जरूरत नहीं वे बेरोजगार होते हैं। दिन-ब-दिन बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है — और इनमें उच्चशिक्षित बेरोजगारों की संख्या उलखनीय है।
जब बेरोजगारों की संख्या बढ़ती है तो जो काम पर हैं, उनसे भी कम दाम में काम करवाया जाता है। क्योंकि और कोई उससे भी कम दाम में काम करने को तैयार होता है। बेरोजगारों के पास पैसा नहीं। जो नौकरी करते हैं व कम पैसे में गुजारा करते हैं। दूसरी तरफ संपत्ति अपने आप कुछ गिने-चुने हाथों में जाती है। उनका एक अलग ही उच्च वर्ग समाज तैयार होता है।
आर्थिक असमानता का एक अच्छा उदाहरण यह है कि सभी बड़ी production companies ने अपनी finance company शुरू की है। संदेश यह है — हमस कर्जा लो, हमार माल खरीदो, और किस्त में पैसा वापस करो।
यह असमनता का असर आपको हर क्षेत्र में दिखता है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर सबका हक है — यह बात 1990 से पहले ठीक थी। Globalisation के बाद welfare state की कलना धुंधली होती गई। सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी से दूर होने लगी। गाँव हो या शहर — सरकारी स्कूलों की हालत डरावनी है। और उच्च वर्ग अपने बच्चों को ऐसे schools में भेज रहा है जिनकी primary की monthly fees एक लाख से ज्यादा है। हर शहर में नए five star hospitals खड़े हो रहे हैं — और उनके सामने दिखते हैं असुविधाजनक सरकारी अस्पताल।
सबसे कम आय वाली 50% जनता की आमदनी बहुत कम है। उनमें शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था का अभाव है। हम सब मिलकर एक लाचार समाज बना रहे हैं। लाचार समाज नागरिक नहीं बना सकता — उसे खरीदना आसान होता है।
अगले भागमें: AI और सोचना— क्या हमारा दिमाग जंग खा रहा है?
लेखक विजयतांबे : सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक। मराठी में चार कथासंग्रह प्रकाशित। गोरा की किताब An Atheist with Gandhi का मराठी अनुवाद। चौथी औद्योगिक क्रांति और AI के सामाजिक परिणाम के अध्ययन में विशेष रुचि। वर्तमान में सेवाग्राम आश्रम, वर्धा के सचिव।
“AI का वर्तमान विमर्श देश की असली समस्याओं और उनके कारणों से आपको दूर ले जाना है। इसे कभी तो रोकना होगा। यह लेख श्रृंखला उसे रोकने की शुरुआत है — और आपके सोचने की भी।”
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