
भारत में National Eligibility cum Entrance Test (NEET) को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक, परीक्षा प्रबंधन में अनियमितताओं, ग्रेस मार्क्स विवाद और National Testing Agency (NTA) की कार्यप्रणाली पर उठते सवालों ने लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। सुप्रीम कोर्ट तक इन मामलों की सुनवाई हुई और देशभर में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर बहस तेज हुई।
प्रश्न यह है कि क्या “एक राष्ट्र–एक परीक्षा” मॉडल वास्तव में निष्पक्ष और विश्वसनीय है, या फिर यह धीरे-धीरे शिक्षा को अत्यधिक केंद्रीकृत व्यवस्था में बदल रहा है?
देश में अब शिक्षा नहीं बची, केवल परीक्षाएँ बची हैं। विद्यालय हैं, शिक्षक हैं, पुस्तकें हैं, प्रयोगशालाएँ हैं, पर सब किसी न किसी प्रवेश परीक्षा की परिक्रमा कर रहे हैं। ज्ञान पीछे छूट गया है, रैंक आगे निकल गयी है। बच्चे अब डॉक्टर बनने का सपना कम और “नीट क्लियर” करने का दबाव अधिक महसूस करते हैं। यही दबाव आज की परीक्षा-केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था का नया पाठ्यक्रम बनता जा रहा है।
हालाँकि लाखों विद्यार्थी कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी से तैयारी करते हैं, लेकिन पूरी व्यवस्था शिक्षा को सीखने की प्रक्रिया से अधिक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बदलती दिखाई देती है।
NEET को कभी समान अवसर का औजार बताया गया था। कहा गया—एक देश, एक परीक्षा, एक मेरिट। यह तर्क सुनने में लोकतांत्रिक लगता है, लेकिन वास्तविकता में यह व्यवस्था धीरे-धीरे शिक्षा को एक केंद्रीकृत अनुशासन-तंत्र में बदलती जा रही है। हर वर्ष सामने आने वाले पेपर लीक, परीक्षा माफिया, कोचिंग उद्योग का बढ़ता प्रभाव और छात्रों की आत्महत्याएँ यह प्रश्न खड़ा करती हैं कि क्या वर्तमान परीक्षा मॉडल वास्तव में विद्यार्थियों के हित में है?
विडम्बना यह है कि सरकारें शिक्षा में मातृभाषा, स्थानीय पाठ्यक्रम, क्षेत्रीय आवश्यकताओं और नई शिक्षा नीति के माध्यम से विकेन्द्रीकरण की बात करती हैं, लेकिन परीक्षा के समय पूरा देश एक ही प्रश्नपत्र और एक ही मानक के अधीन खड़ा कर दिया जाता है। लाखों विद्यार्थियों की मेहनत, संवेदनशीलता और भविष्य को तीन घंटे की परीक्षा में सीमित कर दिया जाता है। यह केवल मूल्यांकन नहीं, बल्कि मानसिक दबाव का राष्ट्रीय ढाँचा बनता जा रहा है।
और फिर प्रश्नपत्र लीक हो जाता है।
तब यह स्पष्ट दिखाई देता है कि केंद्रीकरण केवल शक्ति का ही नहीं, भ्रष्टाचार का भी संकेन्द्रण करता है। जब एक ही परीक्षा करोड़ों विद्यार्थियों की नियति तय करेगी, तो अपराध और माफिया भी उसी एक व्यवस्था के आसपास सक्रिय होंगे। एक सेंध लगती है और पूरा देश प्रभावित हो जाता है। बिहार में लीक हो तो केरल का छात्र भी असुरक्षित महसूस करता है। किसी माफिया का लाभ लाखों मेहनतकश विद्यार्थियों के अविश्वास में बदल जाता है।
बार-बार पेपर लीक क्यों हो रहे हैं?
प्रश्न यह है कि बार-बार लीक होने के बावजूद व्यवस्था बदलती क्यों नहीं? क्योंकि केंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था अब केवल शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं रह गयी है; वह एक विशाल प्रशासनिक ढाँचे में बदल चुकी है। धीरे-धीरे ऐसी परीक्षा संस्कृति विकसित हो रही है जिसमें रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच की तुलना में वस्तुनिष्ठ उत्तर देने की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण बनती जा रही है। स्कूल ज्ञान के केंद्र कम और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के माध्यम अधिक दिखाई देने लगे हैं।
आज देश का मध्यमवर्ग अपने बच्चों को विद्यालय से अधिक कोचिंग संस्थानों के भरोसे डॉक्टर बनाना चाहता है। कोटा, दिल्ली, पटना और हैदराबाद जैसे शहर शिक्षा के साथ-साथ प्रतियोगी बाजार के प्रतीक बन चुके हैं। वहाँ बच्चे किताबों से कम और दबाव से अधिक घिरे रहते हैं। नींद कम, टेस्ट सीरीज़ अधिक। संवाद कम, रैंक अधिक। और इस पूरी प्रक्रिया में विद्यार्थी धीरे-धीरे मनुष्य से “रोल नंबर” में बदलता जाता है।
कोचिंग संस्कृति और मानसिक दबाव
सबसे बड़ा प्रश्न “मेरिट” की अवधारणा को लेकर भी है। गाँव का वह छात्र, जिसके विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक नहीं, प्रयोगशाला नहीं, इंटरनेट नहीं, उससे कहा जाता है कि वह महानगरों के महंगे कोचिंग संस्थानों से निकले विद्यार्थियों से समान प्रतियोगिता करे। फिर उसी असमानता को “योग्यता” का नाम दे दिया जाता है। यह वैसा ही है जैसे किसी को नंगे पाँव दौड़ाकर कहा जाए—हार गए तो दोष तुम्हारी प्रतिभा का है।
यह व्यवस्था केवल आर्थिक असमानता ही नहीं बढ़ाती, मानसिक दबाव भी पैदा करती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े वर्षों से विद्यार्थियों में बढ़ते तनाव और आत्महत्या की घटनाओं को लेकर चिंता जताते रहे हैं। हर वर्ष परीक्षा असफलता के भय से कई छात्र जीवन समाप्त करने जैसे कदम उठा लेते हैं। लेकिन व्यवस्था इन घटनाओं को अक्सर व्यक्तिगत कमजोरी मानकर आगे बढ़ जाती है। बहुत कम चर्चा इस बात पर होती है कि आखिर ऐसी शिक्षा कैसी है जिसमें सत्रह-अठारह वर्ष के बच्चे जीवन से अधिक परीक्षा से डरने लगें।
NTA पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
इस पूरी व्यवस्था का एक और गंभीर पक्ष है—परीक्षाओं का संचालन उन संस्थाओं के हाथों में चला जाना जिनका अकादमिक जगत से प्रत्यक्ष और जीवंत संबंध सीमित दिखाई देता है। National Testing Agency आज देश की अनेक बड़ी परीक्षाओं का केंद्र बन चुकी है, लेकिन लगातार यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या केवल परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी शिक्षा की जटिल सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक चुनौतियों को पूरी तरह समझ सकती है?
शिक्षा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती; वह सामाजिक और बौद्धिक प्रक्रिया भी होती है। कई शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा प्रणाली में विश्वविद्यालयों, स्कूल बोर्डों, शिक्षकों और विषय विशेषज्ञों की अधिक भागीदारी होनी चाहिए, ताकि परीक्षा केवल “प्रबंधन” का विषय बनकर न रह जाए।
क्या “एक राष्ट्र–एक परीक्षा” मॉडल पर पुनर्विचार की आवश्यकता है?
भारत जैसे बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और सामाजिक रूप से असमान देश में एक ही परीक्षा को “पूर्ण समानता” का प्रतीक मान लेना कई सवाल खड़े करता है। अलग-अलग राज्यों की शिक्षा-व्यवस्था, संसाधन, भाषाई परिस्थितियाँ और सामाजिक वास्तविकताएँ अलग हैं। फिर भी सबको एक ही मापदंड से मापा जा रहा है। यह लोकतांत्रिक विविधता से अधिक प्रशासनिक सुविधा का मॉडल प्रतीत होता है।
प्रश्नपत्र लीक की घटनाएँ इस मॉडल की सबसे बड़ी कमजोरी को उजागर करती हैं। जब पूरा भविष्य एक ही परीक्षा पर टिका होगा, तब उसके आसपास अपराध का संगठित नेटवर्क भी विकसित होगा। पेपर माफिया, फर्जी अभ्यर्थी, डिजिटल हैकिंग और रिश्वत जैसे अपराध उसी केंद्रीकरण की उपज हैं। जहाँ शक्ति केंद्रित होती है, वहाँ भ्रष्टाचार भी केंद्रित हो जाता है।
विकेन्द्रीकरण क्या समाधान हो सकता है?
समस्या केवल सुरक्षा की नहीं, ढाँचे की भी है। हर बार समाधान के नाम पर अधिक निगरानी, अधिक कैमरे और अधिक पुलिस की बात होती है। लेकिन जब पूरा भविष्य एक ही दरवाजे पर खड़ा होगा, तो उस दरवाजे पर भीड़, दलाल और अपराध भी जमा होंगे।
इसलिए अब शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था के विकेन्द्रीकरण पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। राज्यों, विश्वविद्यालयों और मेडिकल संस्थानों को अधिक शैक्षणिक भूमिका दी जा सकती है। बोर्ड परीक्षाओं के अंकों, सतत मूल्यांकन, क्षेत्रीय प्रश्न बैंकों, बहु-स्तरीय प्रवेश प्रक्रिया और विषय आधारित मूल्यांकन जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
विकेन्द्रीकरण का अर्थ अराजकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का विभाजन है। यदि परीक्षा प्रणाली बहु-स्तरीय होगी, तो किसी एक गड़बड़ी से पूरे देश का भविष्य प्रभावित नहीं होगा। अभी स्थिति यह है कि एक शहर की चोरी लाखों विद्यार्थियों के परिश्रम पर संदेह खड़ा कर देती है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल चयन नहीं, मनुष्य निर्माण भी है
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतियोगिता और चयन तक सीमित हो जाना चाहिए? डॉक्टर बनने की प्रक्रिया यदि भय, अवसाद और अमानवीय प्रतिस्पर्धा से होकर गुजरेगी, तो क्या चिकित्सा वास्तव में सेवा का माध्यम बन पाएगी, या केवल सफलता का एक निर्दयी पेशा बनकर रह जाएगी?
शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल उम्मीदवार पैदा करना नहीं, बल्कि संवेदनशील, जिज्ञासु और जिम्मेदार नागरिक बनाना भी होना चाहिए। लेकिन वर्तमान परीक्षा-केन्द्रित व्यवस्था विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने से अधिक उत्तर याद करने के लिए प्रेरित कर रही है।
और जिस दिन शिक्षा प्रश्न पूछना छोड़ दे, समझ लीजिए वहाँ ज्ञान नहीं, केवल नियंत्रण बचता है।
कृपया पेपर लीक होने के कारण रद्द होने पर बीबीसी के पूर्व संवाददाता राम दत्त त्रिपाठी की भारत सरकार के पूर्व सचिव राम दत्त त्रिपाठी से बेबाक बातचीत यहाँ सुनें :
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लेखक परिचय: डॉ. अचल पुलस्तेय – एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, लेखक, लोक अध्येता और कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण पर केंद्रित है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में *महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास*, *कोरोना काल कथा* (उपन्यास), *लोकतंत्र और नदी*, और *लटें उड़ने से बसंत नहीं आता* (काव्य संग्रह) जैसी चर्चित शोध एवं साहित्यिक पुस्तकें शामिल हैं।



