
आज दुनिया भर में Artificial Intelligence यानी AI की चर्चा है।TV चैनल, अखबार, social media — हर जगह AI के बारे में कुछ न कुछ आ रहा है।लेकिन यह चर्चा ज्यादातर technology के चमत्कार तक सीमित है।असली सवाल कोई नहीं पूछ रहा।यह AI किसके हित में काम कर रहा है? इसे कौन control करता है? इसके पीछे किसका पैसा है? और सबसे जरूरी— आम इंसान के जीवन पर इसका क्या असर पड़ने वाला है?
इन्हीं सवालों की पड़ताल करती है यह लेख शृंखला, जो नौ भागों में होगी।इसे लिखा है सेवाग्राम आश्रम प्रतिष्ठान वर्धा महाराष्ट्र के सचिव और जाने–माने साहित्यकार तथा सामाजिक कार्यकर्ता विजय तांबे ने।
“AI का वर्तमान विमर्श देश की असली समस्याओं और उनके कारणों सेआपको दूर ले जाना है।इसे कभी तो रोकना होगा।यह लेख श्रृंखला उसे रोकने की शुरुआत है— और आपके सोचने की भी।”- विजय तांबे।
– संपादक
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पेश है लेखमाला का पहला भाग
Science – Technology का असली फर्क — और AI की चुनौती भाग – एक
Science और Technology को एक ही चीज़ समझने की गलती हम अक्सर करते हैं। किसी जाने-माने technologist को हम scientist कह देते हैं, या किसी scientist को technologist बना देते हैं।
जो लोग पकृति और सृष्टि के नियमों को खोजते हैं — उन्हें हम scientist कहते हैं। वे बुनयादी research करते हैं। Scientists के खोजे हए नियमों और सिद्धांतों को इंसानी जीवन के लिए उपयोगी कैसे बनया जाए — यह काम technologist करते हैं। Washing machine ह या microwave oven — उसका श्रेय technologist को जाता है। लेकिन जिन वैज्ञानिक नियमों पर वे बने हैं, उनका श्रेय scientist को देना ही पड़ता है।
Technology हमेशा उपयोगी होती है। लकिन किसके लिए उपयोगी है — यही असली सवाल है। जैसे uranium उपयोगी है। उससे सस्ती बिजली भी बन सकती है और atom bomb भी। एक ही चीज़ — द बिल्कुल अलग उद्देश्य। Technology के पास अपना कई नैतिक विवेक नहीं होता। इसलिए technology से क्या बनाना है, यह निर्णय कोई और करता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का पूरा सच समझने के लिए कृपया Ram Dutt Tripathi and Sam Pitroda की बातचीत का यह वीडियो देखें :
यह निर्णय मुख्यतः दो तरह के लोग करते हैं।
पहले हैं investors। Science को technology में बदलने के लिए Research and Development पर बड़ी मात्रा में पैसा लगाना पड़ता है। यह काम investors करते हैं। लेकिन उनका एकमात्र उद्देश्य होता है — लगाए हुए पैसे पर अधिकतम return। कोई product समाज के लिए कितना भ जरूरी हो, अगर उससे मुनाफा नही होगा तो क्या वह बाजार में आएगा? आप खुद सोचिए।
दूसरे हैं नेता या सत। Uranium से बिजली बनानी है या atom bomb — यह फैसला सत्ता करती है। और अगर खुली आँखों से देखें तो समझ आता है कि investors और सत्ता की मिलीभगत अक्सर रहती है। सम्माननीय अपवाद होते हैं, लेकिन वे बहुत दुरभ हैं।
सन 1715 के बाद भप के engine से औद्योगीकरण की नींव पड़ी। सिर्फ 300 सालों में हम बिजली, mechanisation, computers, robotics, automation से होते हुए Artificial Intelligence के शुरुआती दौर में खड़े हैं। इन 300 सालों में products की गुणवत्ता और विविधता लगातार बढ़ती रही। उत्पादन की रफ्तार कल्पना की सीमाएँ तोड़ती रही। इस पूरी यात्रा में investors और सत्ता की भूमिका केंद्रीय रही है।
अब तूफानी रफ़्तार से आगे बढ़ रहा AI हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है। हर नई technology अपने साथ एक नई संस्कृति लाती है, नए मानदंड बनाती है। जब आम जनता उन मानदंडों को दल से स्वीकार कर लेती है — तभी वह technology सफल होती है।
तो AI कौन सी संस्कृति लेकर आ रहा है? उसके पछे किसके हित हैं? क्या यह हमारी इंसानियत पर सवाल खड़े करने वाला है? इन सवालों की पड़ताल हम इस पूरी श्रृंखला में मिलकर करेंगे — खुली आँखों और खुले दिमाग से।
अगले भाग में: Programming और AI — क्या फर्क है?
लेखक परिचय:
विजय तांबे: सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक।मराठी में चार कथा संग्रह प्रकाशित।गोरा की किताब An Atheist with Gandhi का मराठी अनुवाद।चौथी औद्योगिक क्रांति और AI के सामाजिक परिणामों के अध्ययन में विशेष रुचि।वर्तमान में सेवाग्राम आश्रम, वर्धा के सचिव।
📞 9869019727 | ✉️ vtambe@gmail.com
अगले हिस्सों में होगा :
2. Programming और AI — क्या अंतर है?
3. AI और रोजगार — कौन बचेगा?
4. AI और विषमता — अमर-गरीब की खाई
5. AI और सोचना — क्या हमारा दिमाग जंग खा रहा है?
6. AI और राजनीति — मन बदलने की मशन
7. AI और मानव कल्याण — क्या सचमुच होगा?
8. AI और UBI — बेरोजगारी का जवब या नया जाल?
9. विकल्प है! — हमारे terms पर जीना
क्रमश :



