शादी : पहले दिन की त्रासदी

सात फेरों की सात विषमतायें                               

 

महेश चंद्र द्विवेदी, आई पी एस

महेश चंद्र द्विवेदी, पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश            

मेरी पत्नी कभी-कभी हंसते हुए कह देतीं हैं कि औरों की तो लव-मैरिज होती है,  पर हमारी हेट-मैरिज हुई थी। उनके पास ऐसा कहने का ठोस कारण भी है,  क्योंकि हमारा विवाह मेरे माता-पिता ने मेरी अनुपस्थिति में तय कर दिया था और फिर घटना-चक्र ऐसा चला कि मैने पत्नी (होने वाली) के पिता को पत्र में यह लिखकर विवाह नामंज़ूर कर दिया था कि मैं इस विवाह को निबाह पाने में असमर्थ रहूंगा। मेरी बात का निहितार्थ था कि मुझे लड़की पसंद नहीं है। उसके उपरांत घटना-चक्र की सुई उलटी घूमी और दो वर्ष बाद हम दोनो ने मन ही मन में लड्डू फोड़ते हुए सात फेरे ले लिये थे।

           मेरे विवाह के कुछ वर्ष पश्चात एक दिन जब मैं लंदन में था, तब वहां इंग्लैंड में जन्मी भारतीय मूल की एक लड़की रीटा ने मुझसे पूछ दिया था,

           “हमारे यहां तो लवमैरिज होती है और वह ऐसे दो व्यक्तियों में होती है, जिहोंने पारस्परिक सम्पर्क में रहकर एक-दूसरे के अनुभवों, आदतों, आकांक्षाओं, आस्थाओं, अपेक्षाओं, अभिरुचियों एवं अरुचियों में समानता पाई हो। आप के यहां एक-दूसरे के विषय में कुछ भी न जानने वाले दो व्यक्तियों में अरेंज्ड मैरिज हो जाती है। मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसे दम्पति जीवन भर एक साथ कैसे रह लेते हैं?” 

         अंतिम वाक्य कहते हुए उसके मुख पर सचमुच अचरज का भाव परिलक्षित था। उस समय मैने उसे उत्तर दे दिया था,

        “यह इसलिये कि हमारे यहां स्त्री और पुरुष दोनो को बचपन से ऐसे संस्कार दिये जाते हैं कि विवाह-पूर्व अथवा विवाह के पश्चात कभी किसी के मन में यह विचार ही नहीं आता है कि दोनो कभी एक दूसरे से पृथक हो सकते हैं। हां, किसी अपवाद की बात अलग है।”  

        यह सुनकर रीटा के मुंह से अनायास ‘वाउ’ निकला था। मैने उस लड़की को उत्तर तो दे दिया था परंतु मुझे लगा था कि सम्भवतः वह उत्तर अपने में सम्पूर्ण नहीं था| अतः रीटा का वह प्रश्न मेरे मस्तिष्क में गांठ बनकर बैठ गया था और यदा कदा पुनः खड़ा हो जाता था। सम्पूर्ण उत्तर का ज्ञान तो अब जीवन भर के अनुभवों की समीक्षा करने पर हो रहा है। विवाहपूर्व मेरी पत्नी और मुझमें पारस्परिक सम्पर्क बस इतना हुआ था कि बड़ों की उपस्थिति और निगरानी में शरमाते और घबराते हुए दस-पंद्रह मिनट तक एक साथ बैठ लें। जहां तक एक-दूसरे के अनुभवों, आदतों, आकांक्षाओं, आस्थाओं, अपेक्षाओं, अभिरुचियों एवं अरुचियों के विषय में जानने की बात है, हमें इनको जानने का कोई अवसर नहीं मिला था। विवाहोपरांत हमें यह अवश्य पता चला था कि इन सात गुणों में समानता होने के बजाय अधिकांश में हम दोनो में इतनी असमानता थी कि यदि रीटा की तराजू पर तौला जाये, तो हमारे विवाह को लवमैरिज के बजाय हेटमैरिज कहना अधिक उपयुक्त होगा। 

  1. मेरी पत्नी जिस नगरीय वातावरण में पली थी, उस वातावरण एवं सभ्यता से मेरे गांव का दूर-दूर का रिश्ता नहीं था। मेरे गांव वालों में कुछ ने जीवन में कभी भी मोटरगाड़ी की सवारी नहीं की थी और एक बुज़ुर्ग ने रेल देखी भी नहीं थी। मेरे गांव से 7 किलोमीटर दूर एक टुटही सी सड़क थी और रेल का स्टेशन 10 किलोमीटर दूर था और वहां पहुंचने के साधन पैदल, साइकिल या बैलगाड़ी ही थे। गांव में बैलगाड़ी सबसे धनी लोगों के पास ही होती थी और सायकिल एक-दो घरों में ही होती थी। मेरे विवाह से बीस वर्ष पूर्व सायकिल इतनी बड़ी चीज़ समझी जाती थी कि मेरी बड़ी जिज्जी के विवाह में जीजा जी इसलिये नाराज़ हो गये थे क्योंकि उन्हें दहेज में सायकिल नहीं दी गई थी और फिर वह पंद्रह वर्ष तक ससुराल नहीं आये थे। दूसरी ओर मेरी पत्नी के कस्बे तक पक्की सड़क थी और वह जीप से वहां जाया करती थी। विवाहोपरांत मेरी पत्नी कार से मेरे गांव आईं थीं और उससे पहुंचने में भी उन्हें बहुत कष्ट हुआ था क्योंकि कच्ची सड़क पर कार बड़े नखड़े दिखाते हुए चली  थी।

          मैं जिस गांव का रहने वाला था, वहां अभाव और अशौच का साम्राज्य निशिदिवस पसरा रहता था। पत्नी का जन्म कस्बे में हुआ था, और लालन-पालन बड़े नगरों में हुआ था। सफ़ाई का उन्हें तभी से मैनिया था जब कि मेरे घर और गांव के परनाले और गलियां गंदगी से बजबजाते रहते थे। बचपन में मैं उनमें निर्द्वंद्व होकर ऐसे घूमता रहता था जैसे गंगा-स्नान कर रहा हूं। हमारी गंदगी से अरुचि इतनी कम थी कि होली के दिनों में वह गंदगी एक दूसरे पर रंग की तरह फेंकने का गांव में रिवाज़ था।

मेरे गांव में सामान्यतः एक बार पहनी हुई फतुई-धोती दस-पंद्रह दिन बाद धोई जाती थी और रज़ाई दस-पंद्रह वर्ष बाद, जब कि मेरी पत्नी को कपड़े दस-पंद्रह घंटों में बदलने की आदत थी। विवाहोपरांत पहले दिन ही गांव की मेरी एक चाची, जिनकी साड़ी दूर से महक रही थी, पत्नी के पास आकर प्यार जताते हुए बैठ गईं थीं और अपना एक बच्चा, जिसकी आंखों में मोटा-मोटा काजल लगा था परंतु नाक होठों पर नहर सी बह रही थी, को पत्नी की गोद में डाल दिया था। पत्नी ने अपनी उबकाई कठिनाई से रोक पाई थी।

रात में पत्नी को जिस दरी पर लेटने को कहा गया था, उसमें उन्हें इतनी दुर्गंध लगी थी कि उन्होंने उसे एक किनारे से पकड़कर नीचे गिरा दिया था। यहां यह बता देना समीचीन होगा कि मेरी पत्नी की घ्राणशक्ति सामान्य से बहुत तेज़ है और मेरी सामन्य से बहुत कमज़ोर। अतः मुझे उस दरी में कुछ भी अस्पर्श्य नहीं लगता था। सौभाग्यवश उनकी यह त्रासदी एक दिन की ही थी, क्योंकि अगले दिन ही उन्हें वापस माइके जाना था और फिर मेरे नौकरी वाले नगर में जाकर रहना था। 

क्रमश:

2 Comments

  1. बहुत ही अच्छा लिख रहे हैं सर। आपकी इस कथा में उस दौर में गांव की जिंदगी और संस्कार सब पढ़ने को मिलेगा। कहानी के अगले भाग की प्रतीक्षा.

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