विरासत स्वराज यात्रा 2022 ने की बनारस के घाटों की यात्रा

ललिता घाट से राजघाट तक की यात्रा नाव से

दिनांक 12 जनवरी 2022 को विरासत स्वराज यात्रा बनारस पहुँची। जलपुरुष राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में यात्रा दल ने सभी घाटों की यात्रा की। ललिता घाट से आरंभ करके राजघाट तक की यात्रा नाव से की गई। यहां जलपुरुष राजेन्द्र सिंह ने कहा कि, जब हम आस्था के साथ खिड़वाड़़ करते है। तब प्रकृति हमारा साथ नही देती। हमें एक तरफ तो मां गंगा के प्रति आस्था है और दूसरी तरफ इस आस्था को औद्योगिक गंदगी व सभी तरह का प्रदूषण नदी में डाल कर प्रदूषित कर रहे है। बनारस की छोटी-छोटी गलियां, छोटे-छोटे हर घर के मंदिर , उन सभी को एक बड़ी और चौड़े गाड़ियों के रास्ते काशी विश्वनाथ मंदिर कोरिडोर बनाने के लिए 168 मंदिरों को तोड़ा गया है। कानपुर, इलाहाबाद और इस बनारस शहर ने गंगा जी को मेला धोने वाली माल गाड़ी बना दिया है।

कानपुर, इलाहाबाद और इस बनारस शहर ने गंगा जी को मेला धोने वाली माल गाड़ी बना दिया है।

पहले बनारस गंगा किनारों के घाटों पर जाते थे तो वह हमारे मन को अंदर ले जाते थे, हमारा मन वहां पहुंचकर मंदिर बन जाता था। जहां मन अंदर चला जाए, वो मंदिर होता है। लेकिन आज यह घाट इस आधुनिक विकास की भौतिक मार से त्रस्त और ध्वस्त हो रहे है। जो गंगा जल हमारी 17 बीमारियों को दूर कर देता था, वह बिलक्षण प्रदूषणनाशनी गंगा जल शक्ति नष्ट होकर नाला बन गई है। गंगा का गंदा होना एक सभ्यता और संस्कृति का गंदा होना है। इसलिए बहुत निराशा हैं कि, इस तेज विकास के विनाश को रोकना कठिन हो रहा है। क्योंकि इस विकास के द्वारा सबसे बड़ी आर्थिक सत्ताएं पूर्ण रूप से हमारी विरासत मिटाना चाहती है।

आगे कहा कि, वर्तमान में देश की सभी नदियों पर संकट है। लेकिन जिस तरह से गंगा पर विकास के विनाश का संकट है, वैसा दूसरी नदियों पर देखने को नही मिलता। भारत के ज्ञान की राजधानी बनारस जो किसी जमाने में काशी कहलाती थी। अब वो विकास का नमूना बनारस बन रही है। तेजी से विकास करने वाले लोग ज्यादा बाजार और अर्थ को केंद्रित कर रहे है। जिससे तीर्थटन अब पर्यटन में बदल रहा है। शायद उनकी योजना होगी कि, काशी विरासत को बनारस विकास में दफना दें। इसलिए गंगा के बीच में ही चबूतरा बना कर। काशी विश्वनाथ का कोरिडोर बनना और गंगा के घाटों पर तीखा गंगा जी में अंदर करके मोड़ा गया है, इससे गंगा जी का सहज अर्ध चंद्राकर स्वरूप नष्ट हो गया है, इसके बदलने से गंगा जी के जल को रेत अब घाटों की तरफ जमने लगी है।

काशी विश्वनाथ का कोरिडोर बनना और गंगा के घाटों पर तीखा गंगा जी में अंदर करके मोड़ा गया है, इससे गंगा जी का सहज अर्ध चंद्राकर स्वरूप नष्ट हो गया है, इसके बदलने से गंगा जी के जल को रेत अब घाटों की तरफ जमने लगी है।

ज्ञान,तपस्या और साधना-सिद्धि की राजधानी काशी। अब विकास के लालची रसों की राजधानी बनारस बन गई है।

जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि, मैं जब पिछले दिनों बनारस आया था, तब यहां के बहुत सारे टूटे हुए मंदिर देखे थे। यह सब मंदिर काशी विरासत थे। ऐसी बनारस के लगभग 168 छोटे – बड़े मंदिर तोड़े गए। यह विकास भारतीय ज्ञान तंत्र, विद्या और आस्था के विस्थापन से शुरू होता है। यही भारतीय विरासत बिगाड़ और विनाश करता है। हमे इसे विकास की आवश्यकता है जिसमे बिगाड़ और विस्थापन न होता। यह विकास प्रकृति का पुनर्जन्म करे, प्रकृति का पोषण करे। आज हम लालच और लोभ में फस गए है। यह लालच आधुनिक शिक्षा पैदा कर रही है। हम जो भी शिक्षा पाते है, लाभ के लिए पाते है। कोई शिक्षक आज अपने विद्यार्थियों को लाभ के अलावा कुछ नही पढ़ाता है।

विरासत स्वराज यात्रा का यह भी लक्ष्य है कि, हमारी युवा पीढ़ी को यह समझ में आए कि, हमारी वास्तविक विरासत क्या है। इसके लिए विरासत का दस्तावेजीकरण, चिन्हीकरण उस विरासत का प्रमाणिकतौर पर लेखन, सीमांकन करके अपनी अगली पीढ़ी को बचाना है। इससे हमारी युवा पीढ़ी को रोजगार मिलेगा और साथ- साथ विरासत जानने का अवसर भी मिलेगा। इसलिए जलपुरुष राजेंद्र सिंह आज बनारस की विरासत को दस्तावेजीकरण करने के लिए युवाओं को तैयार कर रहे है। वह इस काम को अच्छे से आगे करें। यहां कई लोगों ने इस दिशा में अच्छे काम करने का संकल्प लिया।

जलपुरुष राजेंद्र सिंह आज बनारस की विरासत को दस्तावेजीकरण करने के लिए युवाओं को तैयार कर रहे है। वह इस काम को अच्छे से आगे करें।

इसके उपरांत यात्रा प्राचीनतम गांधी पीठ में पहुंची। यहां शिक्षकों और विद्यार्थियों से लंबी बातचीत हुई। यहां जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने प्रकृति में होने वाले विकासरूपी विनाश के वारे में अवगत कराया। कहा कि, आज हमे विकास और विरासत के रिश्ते समझकर , विकास से होने वाले विनाश से प्रकृति पर भारी संकट है। इस प्रकृति के क्रोध से बचने के लिए प्रकृति को जानना, समझना, सहेजना और फिर सभी को समझाना जरूरी है।

आगे कहा कि, प्रकृति के साथ मानवीय संतुलन बनाने की जरूरत है। संतुलन बिगड़ने से युवा का स्वास्थ बिगड़ेगा। यदि युवाओं को स्वस्थ रहना है, तो अपने स्वास्थ को प्रकृति के साथ जोड़ना होगा। यह सीख हमे गांधी जी से मिलती है। महात्मा गांधी ने कहा है कि, प्रकृति हम सभी की जरूरत पूरी करती लेकिन एक भी आदमी का लालच पूरा नहीं कर सकती। इसलिए युवाओं को प्रकृति का सम्मान करके समझना जरूरी है। जब तक यह विद्यालय प्रकृति की शिक्षा नही देंगे, तब तक विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति सम्मान नही आयेगा।

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यहां उपस्थिति विद्यार्थियों ने राजेंद्र सिंह जी से कई सवाल जवाब किए। यहां उपस्थिति विद्यार्थियों ने कहा कि, हां यह शिक्षा हमें लाभ ही सिखाती है। इसके बाद यात्रा सर्व सेवा संघ कार्यलय राजघाट पहुंची। यहां पी. वी. राजगोपाल और उनके साथियों से बात चीत हुई। इसके बाद पैदल यात्रा फिरिक्का घाट पहुंची। यहां नए घाट नदी के विज्ञान के विपरीत बनाए जा रहे है। इससे नदी जल दूषित – प्रदूषित होगा। यात्रा 12 जनवरी को दमोह रहेगी। सुरेश रैकवार के नेतृत्व में यात्रा चित्रकूट रही।

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