ऋषि परंपरा के आधुनिक प्रतिनिधि थे विनोबा : उषा बहन

विनोबा विचार प्रवाह अंतर्राष्ट्रीय संगीति

डॉ पुष्पेन्द्र दुबे, लखनऊ (विनोबा भवन) 12 सितम्बर। भारत अरण्य संस्कृति का देश है।
यहां के ऋषि-मुनि संस्कृति के उद्गाता रहे हैं। उनका एक ही मंत्र है सादा जीवन उच्च विचार।
इस जीवन का मूल आधार आकाश और अन्न है। व्यक्ति और समाज को शांति और समृद्धि की आवश्यकता है।
उपनिषद के ऋषि ब्रह्म ज्योति के उपासक रहे। विनोबा जी उसी ऋषि परंपरा के आधुनिक प्रतिनिधि हैं।
उक्त विचार ब्रह्मविद्या मंदिर की अंतेवासी सुश्री उषा बहन ने सत्य सत्र में विनोबा जी की 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में विनोबा विचार प्रवाह द्वारा फेसबुक माध्यम पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगीति में कही। सुश्री
उषा बहन ने कहा कि औपनिषदिक चिंतन में आकाश शांति और अन्न समृद्धि का आधार है।
विनोबा की दृष्टि में जो भोजन पर सोलह में से पंद्रह आना भोजन पर खर्च करता है उसका जीवन सादा है।
आध्यात्मिक जीवन में दूसरे खर्च की गुंजाइश नहीं है।
सुश्री उषा बहन ने कहा कि आश्रम विनोबा जी के जीवन का अभिन्न अंग है।

ब्रह्मविद्या मंदिर

सुश्री उषा बहन ने ब्रह्मविद्या मंदिर की जानकारी देते हुए कहा कि इसे वविनोबा जी ने अपने जीवन का आखिरी प्रयोग कहा।
केरल की राजम्मा बहन ने पदयात्रा के दौरान विनोबा जी से प्रश्न किया कि क्या बहनें आध्यात्मिक साधना कर सकती हैं।
तब विनोबा जी ने उनसे कहा कि पदयात्रा में बहनों से पूछकर देखो।
सुश्री राजम्मा बहन ने बहनों से बात की और मार्च 1959 में राजस्थान के काशी का वास में विनोबा जी ने बहनों के लिए ब्रह्मविद्या मंदिर की स्थापना का संकल्प जाहिर किया।
उस समय कहा गया कि चार बहनें एक साथ नहीं रह सकतीं, इसलिए यह प्रयोग एक साल से अधिक नहीं चलेगा।
आज इसकी स्थापना को साठ साल से अधिक हो गए हैं।
विनोबा जी के निर्वाण के बाद भी यह निर्बाध चल रहा है।

आत्माधार

सुश्री उषा बहन ने कहा कि विनोबा जी ने इसकी स्थापना के समय ब्रह्मविद्या मंदिर की बहनों के लिए कहा कि उन्हें आत्माधार पर छोड़ रहा हूं।
उन्होंने प्रारंभ में ही व्यक्ति निरपेक्ष साधना का संकेत दे दिया।
विनोबा जी में न तो नेतृत्व था न गुरुत्व था। वे केवल साइन बोर्ड की भूमिका में रहे। दिशा बतलाते रहे।
उन्होंने स्वयं को शब्दकोश माना। जिसे जरूरत होगी वह उनके विचारों का उपयोग कर लेगा।
उनकी इस पद्धति से बहनों को आत्मनिर्भर होने में बहुत मदद मिली।
सुश्री उषा बहन ने बताया कि विनोबा जी ने अपने पत्र में लिखा कि समूह साधना की दृष्टि से प्रयोग शुरू किया है।
जीवन के आखिरी तक वे समूह साधना के मंत्र को खोलते रहे।

अहंकार रुकावट है

सुश्री उषा बहन ने कहा कि व्यक्ति के विकास में अहंकार रुकावट है।
सामूहिक साधना में मैं को हम में बदलने की बात आती है। इससे अहंकार निरसन होने में सहायता मिलती है।
मेरी और साधना दोनों विरोधाभासी हैं। मैं को हम से मिटाना ही साधना है।
सामूहिक साधना, साधना का शाॅर्टकट है। दूसरे के साथ व्यवहार में अपने चित्त की स्थिति पता चलती है।
सामूहिक साधना से चित्त के विकार दूर होते हैं। हमारी साधना की कसौटी समूह में होती है।
उन्होंने कहा कि सामूहिक साधना जैसा उत्तम साधन नहीं है।

संन्यास तत्व

महात्मा गांधी ने सत्याग्रह तत्व का सामूहिक प्रयोग किया।
वहीं विनोबा जी ब्रह्मविद्या मंदिर के माध्यम से संन्यास तत्व का सामूहिक प्रयोग किया।
आध्यात्मिक साधना में कर्म, ज्ञान और भक्ति का बहुत महत्व है।
विनोबा जी ने इसमें ब्रह्मचर्य और स्वाध्याय को जोड़कर पंचविध कार्यक्रम दिया।
सृष्टि के साथ जुड़ने के लिए श्रम अनिवार्य है। आध्यात्मिक साधना में उत्पादक शरीर श्रम अत्यंत आवश्यक है।
विनोबा जी ने मजदूरी के अनेक प्रयोग किए। उन्होंने श्रमनिष्ठा को उपासना का ही रूप माना है।
आज श्रम को नैतिक प्रतिष्ठा नहीं है। लोग मजबूरी में परिश्रम करते हैं।
उपनिषद में कहा गया है कि जो परिश्रमपूर्वक जीवन जीता है उसे पाप का स्पर्श नहीं होता।

स्वाध्याय

सुश्री उषा बहन ने कहा कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्वाध्याय बहुत जरूरी है।
जीवन का लक्ष्य क्या है और उसे कैसे पाना है यह स्वाध्याय है।
ऐसी जिज्ञासा जब पैदा होती है तब अध्यात्म में प्रवेश होत है।
आखिरी में निग्रंथ हो जाना स्वाध्याय का अंतिम लक्ष्य है। स्वाध्याय के बल पर ईश्वर के साथ जुड़ना है।
प्रतिदिन जो कुछ देखा, सुना, पढ़ा उसे लिखने से चिंतन करने का अभ्यास होता है और नये विचार सूझते हैं।
ब्रह्मविद्या मंदिर से विनोबा विचार के बीस खंडों का प्रकाशन हुआ है।
इससे अनेक व्यक्तियों को लाभ हुआ है।
सुश्री उषा बहन ने ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका आशय संयम है।
जीवन को भोग परायण होने से बचाना चाहिए।

सर्वसम्मति

सुश्री उषा बहन ने कहा कि ब्रह्मविद्या मंदिर का सर्वसम्मति अन्यतम गुण है।
सभी के विचारों को समान महत्व देते हुए सर्वसम्मति से निर्णय लिए जाते हैं।
इसलिए ब्रह्मविद्या मंदिर में कोई व्यवस्थापक नहीं है। असहमति होने पर परस्पर विचार-विमर्श होता है।
इससे निर्णय लेने में विलंब होता है, परंतु यह अहिंसक प्रक्रिया है।

स्वतंतत्र और स्वच्छदंता

सुश्री उषा बहन ने कहा कि इसकी स्थापना के समय ही विनोबा जी ने कहा कि हां सभी को पूर्ण स्वतत्रंता रहेगी।
इसमें प्रवेश के लिए तीन योग्यताएं होना काफी है ब्रह्मविद्या की भूख, वैराग्य वृत्ति और बाहर की जिम्मेदारी से मुक्ति।
स्वावलंबी जीवन यहां का विशेष गुण है।
चार घंटे उत्पादक श्रम और दो घंटे रसोई और सफाई में देने के बाद पूरा समय स्वतंत्र हैं।
विनोबा जी ने तो प्रार्थना में आने का आग्रह भी नहीं रखा, लेकिन साथ में कहा कि प्रार्थना में नहीं आने पर एक बहुत बड़े अनुभव से वंचित रह जाएंगे।
विनोबा जी ने स्वतंत्रता के साथ समर्पण को जोड़ा।
सुश्री उषा बहन ने कहा कि स्वतंत्रता कब स्वच्छंदता में बदल जाती है, इसका भान नहीं रहता।
इसके लिए समर्पण को भी मुख माना है।

बहनें ही क्यों, भाई क्यों नहीं

सुश्री उषा बहन ने कहा कि अनेक बार यह प्रश्न उपस्थित होता है कि ब्रह्मविद्या के लिए बहनों को ही क्यों चुना गया।
उन्होंने कहा कि आज भी समाज में बहनों की स्थिति दोयम दर्र्जे की है।
समाज की स्त्री के प्रति देहप्रधान दृष्टि है और उससे आगे मातृत्व पर जाकर टिकती है।
लेकिन विनोबा जी स्त्री को आत्मतत्व के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे। आत्मा के स्तर पर स्त्री-पुरुष भेद नहीं है।
विज्ञान युग में अणु शक्ति के समान सूक्ष्म में प्रवेश कर चित्त में विस्फोट करना है। इसके लिए ब्रह्मविद्या मंदिर अध्यात्म की प्रयोगशाला है। यह आगामी युग के लिए है।
प्रेम सत्र के वक्ता श्री रमेश सिंघवी ने कहा कि विनोबा जी आत्मगोपित व्यक्ति थे। अपने अंदर शक्तियों का शुद्धिकरण करते रहे।
दूसरे विनोबा जी त्मशोधक भी थे। उन्हें अपने शरीर से भिन्न होने का हमेशा भान बना रहा।
तीसरे उनमें आत्मौपम्य वृत्ति थी। वे पूरे जगत को एक ही मानकर व्यवहार करते थे।

करुणा सत्र

करुणा सत्र में की वक्ता ब्रह्मविद्या मंदिर की सुश्री नलिनी बहन ने कहा कि विनोबा जी का तपस्वी जीवन हम सभी के लिए प्रेरणादायी है।
वे आचरण सिद्ध व्यक्ति थे। उन्होंने देह को आश्रम में परिवर्तित कर दिया।
मगन संग्रहालय की सुश्री विभा गुप्ता ने बताया कि सेवाग्राम की सड़क चैड़ी करने के लिए वृक्ष काटने का काम शासन ने रोक दिया है।
शासन ने प्रोजेक्ट वापस ले लिया है।
उन्होंने बताया कि माता-पिता की सहमति से तीन हजार स्कूलों में तकली कताई को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
अ-सरकारी खादी को लोग पसंद कर रहे हैं। आज उनकी संस्था दो सौ ग्रामोद्योगी उत्पादन बनाती है।
उन्होंने कहा कि उद्योगपतियों को खेती की जमीन दी जा रही है। इसे रोकने के लिए आंदोलन की जरूरत है।
कनाड़ा की सुश्री जिल हैरिस ने जयजगत विचार पर प्रकाश डाला।
संचालन श्री संजय सिंह ने किया। आभार श्री रमेश भैया ने माना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles