वाराणसी में गंगा की दुर्गति पर समाजसेवी और स्वयंसेवी संगठन सामने आये.

वाराणसी में गंगा नदी पार रेत में खनन और नदी धारा, जल प्रदूषण, घाटों की संरचना आदि पर पड़ने वाले प्रभावों के सन्दर्भ में बृहस्पतिवार 10 जून को ‘साझा संस्कृति मंच’ की ओर से जिलाधिकारी को सम्बोधित ज्ञापन पत्र एडीएम सिटी वाराणसी को सौंपा गया।

जागृति राही


   साझा सांस्कृतिक मंच की जागृति राही ने बताया , “वाराणसी शहर में पिछले कई सप्ताह से गंगा उस पार रेत में जेसीबी और अन्य बड़ी ड्रेजिंग मशीन खनन करती हूई दिखाई दे रही हैं। परिणामतः उक्त कार्य से बहाव बंटा है और एक पूरी समानांतर जल धारा , नहर के रूप में बन गयी है। गंगा घाट किनारे शैवाल ( काई ) की मात्रा बढ़ रही है ,जल का रंग हरा हो रहा है।

नदी विज्ञानी प्रो0 यू के चौधरी, महंत संकटमोचन प्रो विशम्भर नाथ मिश्रा आदि ने भी नहर निर्माण और हरे रंग की दुर्घटना पर पर्यावरणीय और अन्य संरचागत भौतिक सन्दर्भ में चिंता प्रकट की है।

गंगा के उद्गम से ही तमाम स्थलों पर बाँध के द्वारा गंगा नदी को पहले से ही बाधित किया हुआ है जिसके कारण नदी की अविरलता बुरी तरह से बाधित है। इसके साथ साथ गंगा जल परिवहन योजना के भी काम हो रहे हैं।

बनारस ललिता घाट पर रुकावट
बनारस गंगा ललिता घाट रुकावट

जानकारों का कहना है कि वाराणसी में रामनगर , राजघाट ,कैथी में जल परिवहन के स्टेशन आदि के काम नदी पर्यावरण और संरचना पर स्थायी प्रतिकुल प्रभाव डालने वाले हैं।

मणिकर्णिका घाट पर विश्वनाथ धाम परियोजना से लगायत खनन मलबा, जेटी सदृश ढांचा , बालू की पाईप आदि काम भी घाट संरचना, जल पर्यावरण को नुकसान पंहुचा रहे है।

इस पृष्ठभूमि में साझा संस्कृति मंच ने कल दिनांक 10 जून 2021 को जिलाधिकारी, वाराणसी को सम्बोधित ज्ञापन पत्र उनकी अनुपस्थिति में एडीएम सिटी को सौंपा है।     ज्ञापन के माध्यम से मांग की गयी है कि गंगा नदी में हो रहे कामो के सम्बन्ध में निम्नलिखित बिंदुओं पर स्पष्ट सूचना सार्वजनिक करते हुए यथोचित कार्यवाही करें :-

1 – नदी पार नहर निर्माण और ड्रेजिंग कार्यक्रम का पूर्ण विवरण वाराणसी की अधिकृत वेबसाइट और समाचार पत्रों के माध्यम से साझा करें। 

गंगा की रेती पर बन रही समानांतर नहर


2 – उक्त नहर निर्माण कार्य पर पर्यावरणविद नदी वैज्ञानिको ने जो आशंका व्यक्त की है , उसको संज्ञान में लेते हुए पर्यावरणीय कुप्रभावों के आंकलन की रिपोर्ट सार्वजनिक करें। यदि रिपोर्ट किसी वजह से न उपलब्ध हो तो एक विशेषज्ञों की समिति बनाकर तत्काल उक्त जांच हो , और तब तक के लिए कार्य स्थगित रखा जाए। 
3. नदी के पर्यावरणीय-आर्थिक सर्वे  के लिए बनाए जा रहे विषेशज्ञ समिति में स्थानीय नाविक-मल्लाह बिरादरी के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए।
4. रामनगर, राजघाट और कैथी में जल परिवहन कार्यक्रम के तहत प्रस्तावित और प्रचलित कामों के भी प्रभावों का आंकलन करती हुई रिपोर्ट सार्वजनिक करें। जलीय जीवन के व्यापक हित को देखते हुए यदि उक्त रिपोर्ट किसी वजह से नहीं बनी हो तो उसे बनवावें। 


5. मणिकर्णिका घाट पर निर्माणाधीन विश्वनाथ धाम परियोजना के विस्तार क्षेत्र में भी पर्यावरणीय कुप्रभावों के आंकलन की रिपोर्ट सार्वजनिक करें। यदि रिपोर्ट किसी वजह से न उपलब्ध हो तो एक विशेषज्ञों की समिति बनाकर तत्काल उक्त कार्यवाही हो ,और तब तक के लिए कार्य स्थगित रखा जाए। उपरोक्त आशय की मांग रखते हुए मन्च के प्रतिनिधियों ने एडीएम सिटी महोदय को ध्यान दिलाया कि वाराणसी शहर पीने के पानी के लिए गंगा नदी और भूमिगत जल पर निर्भर है। विशेषकर घाट से लगी सघन आबादी को उपलब्ध भूमिगत जल भी गंगा की धारा पर ही निर्भर है । साथ ही पूरे शहर को पीने का पानी गंगा ही उपलब्ध कराती है। नदी की धारा पर पड़ रहे इस प्रतिकूल प्रभाव का शहर में पीने के पानी की वयवस्था पर भी क्या और कितनी प्रभाव पड़ेगा इसका समग्र आकलन भी करना जरूरी होगा। 


6. उक्त बिंदु 2 ( गंगा में ड्रेजिंग द्वारा नहर निर्माण ), 4 ( जल परिवहन परियोजना ),  और 5 ( विश्वनाथ धाम ) कार्यक्रमों के द्वारा सामाजिक आर्थिक प्रभावों के आंकलन की रपट भी सार्वजनिक करें। ऐसी आशंका है कि उक्त स्थलों से जुड़े हुए छोटे मझोले असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले हजारों परिवारों की आजीविका बाधित हो रही है , विस्थापन की भी स्थिति हो सकती है। ऐसे में सोशियो इकोनॉमिकल सर्वे से स्थिति को समझकर कार्यवाही की जाए।  

 साझा संस्कृति मंच के प्रतिनिधि मंडल ने नदी के बदलते वर्त्तमान स्वरुप को  एडवोकेट सौरभ तिवारी द्वारा National Green Tribunal NGT के संज्ञान में लाने के प्रयास का भी स्वागत किया और इससे नदी पर मंडरा रहे खतरों पर हो रही बहस अधिक सारगर्भित और ठोस दिशा में बढ़ पाएगी ऐसी सम्भावना व्यक्त की है.


साझा संस्कृति मंच के प्रतिनिधि मंडल में प्रमुख रूप से वरिष्ठ गांधीवादी रामधीरज भाई, वल्लभाचार्य पांडेय, फादर आनंद, संजीव सिंह, जागृति राही, डॉ अनूप श्रमिक, रवि शेखर , मुकेश और धनञ्जय आदि शामिल रहे।
गंगा की दुर्गति का प्रश्न सत्ता, विपक्ष या प्रशासन की समस्या नहीं है, यहाँ विषय प्रकृति – विकृत और नैतिक मानवीय मूल्यों का है.       

  

 शिवेन्द्र प्रताप सिंह     

  शोधार्थी- सामाजिक विज्ञान संकाय       

   वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार   

   E-mail – Shivendrasinghrana@gmail.

कृपया इसे भी पढ़ें

support media swaraj

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

3 × three =

Related Articles

Back to top button