यूनेस्को विश्व धरोहर धोलावीरा की अहमियत

अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता के

 

यूनेस्को विश्व धरोहर धोलावीरा सिंधु सभ्यता का प्रमुख शहर है. धोलावीरा के विशाल और विस्मयकारी खंडहर के प्रत्यक्षदर्शी वरिष्ठ पत्रकार शम्भूनाथ शुक्ल के संस्मरण.

शंभूनाथ शुक्ल

यूनेस्को विश्व धरोहर धोलवीरा सिन्धु सभ्यता के पाँच प्रमुख शहरों में से हैं. इनमे  मोहनजोदरो, हरप्पा एवं गनवेरीवाला सभी पकिस्तान में, एवं धोलावीरा तथा राखीगढ़ी भारत में।लोथल, कालीबंगा बनावली आदि कुछ अन्य पुरास्थल है।  धोलावीरा की खोज बाद में हुई, इसलिए उसका अस्तित्त्व बाद में पता चला। लेकिन धोलावीरा की खुदाई में जो कुछ मिला है, वह अनमोल है। जल्द ही पुरातत्त्व-विद इस सभ्यता की लिपि पढ़ लेंगे, तब बहुत कुछ नया जानने को मिलसकेगा। 

यूनेस्को विश्व धरोहर धोलावीरा  भी मोअनजदडो और हरप्पा संस्कृति की समकालीन है, लेकिन चूंकि मोअनजदडो और हरप्पा की खुदाई अंग्रेजों के समय हुई थी, इसलिए वह अधूरी रही। जहां मोअनजदडो और हरप्पा में हमें शहर की बसावट डो स्तर पर मिलती है। सबसे ऊपर राज-पुरुषों (मुखिया) की बस्ती और उसके नीचे आम जनता की बस्ती। 

हालाँकि यूनेस्को ने इसकी जानकारी मिलने और खुदाई शुरू होने के बाद ही धोलावीरा को अस्थायी स्मारक मान लिया था। पर 2014 में भारतीय पुरातात्त्विक सर्वे (एएसआई) के महा निदेशक राकेश तिवारी ने इसे विश्व धरोहर बनाने की कोशिशें भी शुरू कर दी थीं। 

जनवरी 2020 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने इस अभियान को और गति दी।यूनेस्को विश्व धरोहर  धोलावीरा दक्षिण एशिया की बहुत पुरानी नगरीय सभ्यता थी, ईसा से कोई 2500 और 3000 हज़ार वर्ष पूर्व की। हड़प्पा, मोअनजोदड़ो, राखीगढ़ी और गनवेरी वाला(आकार के क्रम में) की तरह यहाँ भी खुदाई से उसी पुरानी सिंधु सभ्यता केअवशेष मिले हैं। यह साइट कच्छ के रन में खदिर द्वीप में है। इसके उत्तर की तरफ़ मनसर और दक्षिण में मनहर नाम के दो मौसमी नाले हैं।

मकानों की बनावट

क़रीब 60 हेक्टेयर में फैले इन यूनेस्को विश्व धरोहर धोलावीरा के  अवशेषों में इस सभ्यता के मकानों की बनावट(राज प्रासाद, उप प्रसाद, मध्य नगर और निचले नगर) का पता चला है।पत्थर के स्तंभ मिले हैं तथा शहर से बाहर व्यापार हेतु आने-जाने के रास्तों कापता चला है। यहाँ जल निकासी हेतु नालियाँ हैं, कुएँ हैं तथा पत्थरों को घेरकर तालाब की शक्ल में बनाए गए स्नानागार भी। एक और उपलब्धि है, कियहाँ शवाधान पद्धति के प्रमाण भी मिले हैं। इससे इसके एक उन्नत सभ्यताहोने की पुष्टि होती है। राज प्रासाद के उत्तरी गेट से दस अक्षरों वाला एक अभिलेख  मिला है। इसके अलावा हड़प्पा सभ्यता की तरह यहाँ भी मुहरें, मुद्रण, मनके, मिट्टी के बर्तन भी प्राप्त हुए हैं।

धोलावीरां में मकानों की बनावट

सात बार उत्थान और पतन 

पुरातत्त्व विशेषज्ञों के अनुसार इस यूनेस्को विश्व धरोहर धोलावीरा  ने 3000 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्वतक सात बार उत्थान और पतन को देखा। चौथे और पाँचवें चरण में यहअपने चरमोत्कर्ष पर था। फिर यह नगर सिकुड़ने लगा और 1900 ईसा पूर्वके आस-पास यह एक छोटा-सा नगर रह गया और फिर गांव का रूप लेते-लेते विलुप्त हो गया।

धोलावीरा का सात बार उत्थान - पतन

 1967 के आसपास पुरातत्त्वविद जगतपति जोशी ने इस सभ्यता के अवशेषों का पता लगाया। वे बाद में एएसआई (ASI) के महा निदेशक (डीजी) भी रहे। वर्ष 1989 में पुरातत्त्वविद पद्मश्री डॉक्टर रवींद्र सिंह बिष्ट की देखरेख में यहाँ पर खुदाई शुरू हुई। उनके साथ यदुवीर सिंहरावत रहे और सर्वाधिक लंबे समय तक कोई 13 सत्रों में इन लोगों ने यहाँखुदाई करवाई। वर्ष 1991 से 1994 के बीच अनिल तिवारी ने यहाँ के उत्खनन कार्य में भाग लिया। यदुवीर सिंह रावत गुजरात स्टेट पुरातत्त्व विभागके प्रमुख भी रहे। बिष्ट जी ने यहाँ काफ़ी वक्त तक डेरा डाला और कुछ मज़दूरों को लेकर पूरे जुनून के साथ जुट गए। उनके साथ ही यहाँ के उत्खननमें लगे श्रमिक जयमल भाई आज भी यहाँ हैं। वे अब इस साइट औरएएसआई के गेस्ट हाउस की देख-भाल करते हैं। प्रधानमंत्री ने इस साइट कोविश्व धरोहर में शामिल किए जाने पर हर्ष जताया है।

पुरातत्त्वविदों को कितना संघर्ष करना पड़ा होगा

मैं कोरोना काल के कुछ पहले 2019 में इस 5000 साल पुरानी  धोलावीरा सिंधु सभ्यता के खंडहर देखने गया था। इस तरह शायद मैं आख़िरी सिविलियन रहा, जो इनअवशेषों को देखने वहाँ पहुँच पाया क्योंकि इसके बाद कोरोना के चलते इस साइट पर एएसआई के विशेषज्ञों के अलावा किसी और के जाने पर रोकलगा दी गई। मैं अपने परिवार के साथ साइट पर एएसआई के गेस्ट हाउस में रुका था। जहां न बिजली थी न भोजन का इंतज़ाम। सोचिए, इस सभ्यता केअवशेषों की खुदाई कराने वाले पुरातत्त्वविदों को कितना संघर्ष करना पड़ा होगा। मुझे तब एएसआई की गुजरात इकाई के प्रमुख अनिल तिवारी ने जयमल भाई का ही नम्बर दिया था।

उस समय कच्छ के सफ़ेद रन में अंधेरे के सन्नाटे को चीरती हुई हमारी गाड़ी नमक के समंदर के बीच से गुजरी पतली-सी डामर रोड को पार कर आखिर रात आठ बजे पत्थरों से बनी एक प्राचीर के पास जाकर जब रुकी थी तबउस सन्नाटे से मुझे भी सिहरन हुई थी। यहाँ आकर सड़क ख़त्म हो जाती थी।घुप्प अंधेरा था। कुछ देर बाद दो लोग मेरे समीप आए। एक सज्जन बोले- शुक्ला जी? मैंने कहा- जी आप जयमल भाई हो? बोले- हाँ! और गले से लगगए। 

जयमल भाई पिछले 28 वर्षों से इस खंडहर की रखवाली कर रहे थे।एक टीले की खुदाई के वक़्त से लेकर आज ढाई सौ एकड़ में फैले धोलावीराके खंडहर का एक-एक पत्थर जयमल भाई का दोस्त है। वे पूरा दिन औरकभी-कभी रात को भी इस प्राचीर के अंदर जा कर 5000 साल से अधिक पहले की इस सभ्यता से रूबरू होते हैं। उसे जितना ही जानने का वे प्रयत्न करते हैं, उतना ही उसमें डूबते जाते हैं। कहते हैं कि यहाँ का हर पत्थर उनसे बात करता है। यह पूरा इलाका भारतीय पुरातत्त्व विभाग की देख-रेख में है।

फौरन हमारे लिए एएसआई गेस्ट हाउस के तीन रूम खुलवाए गए, साफ-सुथरे और करीने से सज़े हुए। कुछ देर के लिए जेनरेटर चलाया गया, तोबिजली की रोशनी से सब कुछ क्लीयर दिखने लगा। लगभग दो एकड़ मेंगेस्ट हाउस और उससे लगा हुआ 100 हेक्टेयर यानी 250 एकड़ काएएसआई प्रोटेक्टेड एरिया। जयमल भाई हमारे लिए भोजन का इंतजामकरने पड़ोस में स्थित अपने गाँव धोलावीरा चले गए।

हम भी कोई 425 किमीकी यात्रा कर बुरी तरह थक चुके थे। जूते उतारे और हवाई चप्पल पहन लीं।थोड़ा रिलैक्स मूड में हम सब गेस्ट हाउस के बीच में बने विशाल लान में पड़ीबेंच पर बैठ गए। उनका सहायक चाय ले आया। चाय पीते-पीते मूड बना किखुदाई वाले परिसर में जाया जाए। जयमल भाई का सहायक भी उनके जैसा ही जुनूनी। फौरन राज़ी हो गया। एक बड़ी-सी टॉर्च ले आया और हम सबउसके पीछे चल दिए। प्रोटेक्टेड एरिया की प्राचीर का फाटक खोलते हुए, उसने चेतावनी दी कि आप लोग सँभाल कर चलिएगा, क्योंकि यहाँ साँप औरबिच्छू बहुत हैं। यह सुनते ही हमें थोड़ा भय लगा और हम सब ने अपने-अपनेमोबाइल के टॉर्च जला लिए। बहुत सँभल-सँभल कर पाँव रखने लगे। बच्चोंको गोद में उठा लिया गया।

हौज़ और टीले ही टीले

करीब दो सौ मीटर चलने पर एक हौज़ दिखा। लगभग 200 फीट लंबा और 100 फीट चौड़ा। इसकी गहराई कोई 20 फीट रही होगी। इसके बाद टीले ही टीले। हम लोग अब अधिक दूर नहीं जा सकते थे। इसलिए लौट आए।धोलावीरा के अवशेषों के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। मेरे समय कोर्स में बस मोअनजोदड़ो तथा हड़प्पा को ही पढ़ाया गया था।

 लेकिन सीबीएसई की आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले मेरे नाती ने बताया कि उसे यूनेस्को विश्व धरोहर शहर धोलावीरा के बारे में पढ़ाया जाता है। यह इंडस वैली सिविलिजेशन (सिंधुघाटी सभ्यता) है, जो मोअनजोदड़ो के बाद डेवलप हुई। इसके बारे में कहागया है कि यह 2000 से 3000 ईसा पूर्व की सभ्यता है। मुझे लगा कि यदिऐसा है, तो इसका मतलब कि आर्य सभ्यता के पहले यह विकसित हुईहोगी। कहाँ से आए होंगे, यहाँ बसे लोग? मनुष्य तो लगातार इधर से उधर घूमता ही रहा है। और कहाँ विलुप्त हो गए ये लोग? यही सोचते-सोचते हमलोग वापस लौट आए। जयमल भाई ने हाल के अंदर डाइनिंग टेबल पर डिनर जमा दिया। प्योर कच्छी भोजन। लेकिन मैंने तो सिर्फ खिचड़ी और कढ़ी हीखाई। भोजन के बाद हम फिर लान में आ कर बैठ गए।

घुप्प अंधेरा, साफ़ आसमान में तारे

अब जेनरेटर बंद कर दिया गया था। घुप्प अंधेरा था। बहुत दिनों बाद ऐसा आसमान देखा, जिसका एक-एक तारा साफ दिख रहा था। सप्तऋषि भी और ध्रुवतारा भी। मैंने बच्चों को ये तारे दिखाए। गेस्ट हाउस एक गोलाकार मैदान में बना था, जिसके चारो तरफ चार फुट ऊंची पत्थर की दीवार थी।यह दीवार बीच-बीच में टूटी भी थी। यहाँ कोई हिंसक जानवर तो नहीं था, लेकिन भेड़िये आ जाते थे। उनकी सूचना देने के लिए कई कुत्ते गेस्ट हाउस मेंपले थे। चोरी का कोई खतरा नहीं था, लेकिन एक तो कमरों के बाहर कीज़मीन ऊबड़-खाबड़ थी, दूसरे साँप-बिच्छू को तो कोई रोक-टोक नहीं थी।जयमल भाई हमें बताने लगे कि यहाँ खुदाई कई बार हुई, आखिरी बार डॉ. आरएस बिष्ट ने कराई थी, और मैं उनके साथ रहा। यह बात 1989-90 कीहै। यहाँ जो अवशेष मिले हैं, उनसे यह तो लगता ही है कि यहाँ की सभ्यताबहुत उन्नत रही होगी। पर इससे ज्यादा वे नहीं बता सके। यह तय हुआ किअगले रोज़ हम इन अवशेषों को देखने चलेंगे।

कैसी रही होगी, वह सभ्यता?

जयमल भाई के जाने के बाद सब लोग सोने चले गए। मैं वहीं बैठा सोचता रहा कि कैसी रही होगी, वह सभ्यता? आज का हौज़ देख कर यह एहसास तोहो ही गया कि उस समय लोगों को जल संरक्षण का ज्ञान तो रहा ही होगा, वर्ना इस इलाके में जहां नमक का रन है, लोग क्यों कर बसे होंगे? यह भी होसकता है कि इस रेगिस्तान में मीठे पानी का स्रोत रहा हो। क्योंकि सभ्यताका विकास वहीं हो पाएगा, जहां पानी हो और लोगों को आग को संरक्षितकरने का ज्ञान हो। इन दोनों चीजों के बगैर कोई सभ्यता विकसित नहीं होसकती। मुझे प्रतीत होने लगा कि ये पत्थर उसी समय के हैं और मुझे बता रहे हैं कि प्रकृति की क्रूरता से कैसे हम उजड़ गए। अचानक किसी कुत्ते के रोनेकी आवाज़ आई, मुझे लग गया कि यह भेड़िये के बाबत चेतावनी देने कीकाल है। घड़ी देखी, बारह बज़ रहे थे। मैं उठ कर कमरे में आ गया।

 पूरी रात मुझे नींद नहीं आई

लेकिन पूरी रात मुझे नींद नहीं आई। बार-बार लगे कि कोई फुसफुसा कर मुझे बुला रहा है, टॉर्च जलाओ तो कहीं कोई नहीं। एकाध बार पलक झपकी तो लगा कि मेरा कमरा कोई हिला रहा है। पर पलक खुली तो सब गायब।यह सब कोई मेरे मन का भ्रम नहीं, दरअसल मैं खुद इस सिंधु घाटी कीकल्पनाओं में इतना गुम हो गया कि मुझे वह सभ्यता साक्षात दिखने लगी।मुझे बेकरारी से इंतज़ार था सुबह का। जयमल भाई कह गए थे, कि सुबहपौने सात पर हम यहाँ से आठ किमी दूर फासिल जाएंगे, वहाँ से सूर्योदयदेखेंगे। और दूर-दूर तक फैले व्हाइट रन को देखेंगे तथा लाखों वर्ष से पड़ेउल्का-पिंडों को भी। जयमल भाई ने यह भी बताया कि बीएसएफ कीआखिरी पोस्ट भी कुछ ही दूरी पर है, उसके आगे रन और इस रन के बीच सेही पाकिस्तान का बार्डर। इसलिए इंतज़ार था, तो बस सुबह का।

धोलावीरा के क़रीब फ़ासिल पार्क

प्रकृति की अजीब लीला है

प्रकृति की भी अजीब लीला है। वह जहाँ जितनी अनुदार होती है, वहां बसेलोग उतने ही परिश्रमी और दृढ-निश्चयी होते हैं। वे प्रकृति के अनुरूप अपनेको ढाल लेते हैं। और यह सब ऐसे ही स्थानों पर आकार पता चलता है।इतने कष्टप्रद स्थान पर दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक सिंधु-सभ्यता विकसित हुई।

 धौलावीरा शब्द का शाब्दिक अर्थ है- धौला यानीसफ़ेद और वीरा अर्थात कुआं। अर्थात सफ़ेद नमक का कुआं। यह वह जगह है जहाँ सैकड़ों मील तक सिर्फ नमक ही नमक है। दूर-दूर तक हरियाली नहीं, यहाँ तक कि हिंसक थलचर भी नहीं दिखते। जहाँ तक नज़र जाती है, बस सफ़ेद परती धरती। यहाँ कुओं में इतना खारा पानी है, जैसे वहां भी नमकघोल दिया गया हो। फिर भी मनुष्य यहाँ है, और हैं उसके चिर-कालीन संगी कुत्ते। कुत्ता ही मनुष्य का वह साथी है, जो धर्मराज युधिष्ठिर के साथ सुमेरपर्वत की हर बाधा को पार करते हुए, सशरीर उनके साथ स्वर्ग तक गया था।जबकि उनकी स्त्री, चारों भाई एक-एक कर साथ छोड़ते गए।

 कुत्ते के अलावा जो जीव यहाँ मौजूद हैं, वे हैं धरती के भीतर बसने वाले बिच्छू, साँप, चूहे, कछुए और अन्य रेप्टाइल. अक्सर धरती यहाँ धक-धक करने लगती है, तो येसारे जीव बिलबिला कर बाहर आ जाते हैं। और तब परस्पर सहमति से एक-दूसरे के अस्त्तित्त्व को स्वीकार करते हैं।

जयमल भाई

खुद जयमल भाई इसके एक उदाहरण हैं। वे पुरातत्त्व-विद नहीं हैं, न ही उन्होंने इतिहास पढ़ा, न ही अँग्रेजी, हिन्दी आदि आधुनिक भाषाएँ। वे ठेठदेहाती हैं। उनका गाँव धोलावीरा है। 1989 में जब इस स्थान की खुदाई शुरूहुई तब, उनकी उम्र अधिक नहीं थी। और कच्छियों जैसी सहजता के साथ वेयहाँ उस टीले की खुदाई देखने लगा, जिसके भीतर कुछ था, पर क्या था, यह पता नहीं। पुरातत्त्व-विद डॉ. आरएस बिष्ट और डॉ. यदुवीर सिंह रावत, यहाँपर खुदाई करवा रहे थे। दोनों ही उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र (मौजूदाउत्तराखंड) के मूल निवासी हैं, और क्रमशः लखनऊ विश्वविद्यालय तथागढ़वाल विश्वविद्यालय में पढ़े हैं। इनकी संगत में जयमल भाई भी यहाँमज़दूरी करने लगे। वे भले कोई पुरातत्त्व के मर्मज्ञ नहीं हों, मगर वे खुदाई में ऐसे रम गए, कि हर पत्थर उनसे बतियाने लगा। वे बताते हैं कि फावड़ाचलाते ही पत्थर उन्हें बता देता था, कि हौले से जयमल भाई! यहाँ पाँच हज़ारसाल पुराना खजाना है। और इसी बूते वे पत्थरों को खोद कर टेराकोटा केभाँड तथा प्रतिमाएँ निकाल सके। यह जमाल भाई की लगन थी।

जयमल भाई
जयमल भाई

ऐसे नायाब जयमल भाई ने हमें बताया कि वे रन में मीलों दौड़े हैं पर इसका छोर पता नहीं कर सके। यह रन बरसात में दलदली हो जाता है और गर्मी मेंसूखा। तब यहाँ इस नमकीन रेत के थपेड़े उड़ते हैं, लेकिन सर्दी में यहाँ बड़ासुहाना हो जाता है।

आज जब इस साइट को विश्व धरोहर में शामिल कर लिया गया है, तो पुरातत्त्वविदों के चेहरे खिल गए हैं। जो लोग दिन-रात यहाँ लगे रहे उन विशेषज्ञों को लगता है, उनका श्रम सार्थक हुआ। ये प्राचीन सभ्यताएँ कोई मिथक नहीं बल्कि हक़ीक़त हैं। इनका पता चलने से प्राचीन इतिहास के वे बंद पट खुलने लगते हैं जिनके बंद रहने से हम अंधेरे में कल्पना के घोड़ेदौड़ाते हैं और हमारे हाथ कुछ अविश्वसनीय कहानियाँ ही लगती हैं, जिनकाकोई ओर-छोर नहीं होता। लेकिन जब वे पट खुलते हैं तब इतिहास की कड़ियाँ जुड़ने लगती हैं।

अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता के

भारतीय भू-भाग में जो भी मानव-सभ्यता के अवशेष मिले हैं, वे सिंधु घाटी के हैं। यानी अधिक से अधिक पाँच हज़ार वर्ष पहले के। तब तक मनुष्य समुद्र के जरिये एक स्थान से दूसरे स्थान जाने लगा था। सबसे पहले मनुष्यों नेदूरगामी यात्राओं के लिए समुद्री मार्ग ही चुना था। उसके लिए लंबी पैदल यात्रा सुगम न थी। क्योंकि वह दो पैरों से चलता था और इसलिए कुदान भरना और बिजली की गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाना, उसके लिए आसान नहीं था। दूसरे धीरे-धीरे सजने-धजने तथा आराम-तलबीने उसकी शारीरिक क्षमताएँ कम कर दीं।

 अब न तो वह तेजी से भाग सकता था, न पेड़ों पर चढ़ सकता था, न ही तैर सकता था। लेकिन बुद्धि से उसनेआग की खोज कर ली, पत्थरों को परस्पर टकरा कर। आग को आँच और लौ देना भी। उसने सूखी लकड़ी, फूस आदि के प्रयोग से आग को सहेजना भीसमझ लिया। मछली पकड़ने के लिए मनुष्यों ने नाव बना ली, क्योंकि मछलीकच्ची भी खाई जा सकती थी और उसे पकड़ना भी आसान था। नाव से वह अपनी यात्रा लंबी करता गया। और जिस समुद्र को वह अतल और अपार समझता था, उसकी थाह और उसके पार को उसने देख लिया। घोड़े को पालतू बना कर उस पर सवारी करना, गधे और ऊंट से माल ढुलाई भी उसे समझ आ गई। एक जगह से दूसरी जगह जाना, एक परिवार बना कर रहना और दूसरे परिवार पर हमला कर उसकी संपत्ति छीनना भी उसे आ गया।

 यह लूट, छिनताई और हिंसक वृत्ति ने उसे घुमक्कड़ बनाया, एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन सिखाया। ये सब बातें आज भले ही अराजक लगें, लेकिन आज के समाज और आज की सभ्यता तक पहुँचने के लिए यह लूट, हिंसाऔर छिनताई आवश्यक थी।

लेखक शनभूनाथ शुक्ल धोलावीरा में
लेखक शनभूनाथ शुक्ल धोलावीरा में

शंभूनाथ शुक्ल, 45 वर्षों से पत्रकारिता में। जनसत्ता के चण्डीगढ़ और कोलकाता संस्करणों के संपादक रहे। अमर उजाला में संपादक रहे।

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