लाल क़िले पर उपद्रव : दिल्ली पुलिस की असफलता

दिल्ली में जो हुआ, वह हर एक हिंदुस्तानी के लिए क्षोभ का मसला है।

26 जनवरी 2021 को देश की राजधानी में जो कुछ हुआ, यह असफलता तो दिल्ली पुलिस की ही है, जिसका दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सा दुनिया के सामने हैं और हर भारतीय को इस पर गुस्सा भी है, शर्म भी है। लेकिन यह बहुत कडवा सच है कि मीडिया के माध्यम से जो कुछ सोरे संसार में पहुंचा वह एक सिक्के के दूसरे पहलु पर लगा एक छोटा सा बदनुमा दाग था। साठ दिन से कड़ाके की ठंड, घनघोर बरसात और कई अन्य विपदाओं के साथ खुले में बैठे वे किसान अपने सौ से अधिक साथी आंदोलन पर आहुत कर चुके लाखों किसानों की सारी मेहनत, संयम और तपस्या को कुछ लोगों ने मिट्टी में मिला दिया।

किसान आंदोलन अब ट्रैक्टर रैली के बाद क्या
किसान आंदोलन

दिल्ली की सीमा पर कोई एक लाख ट्रेक्टर, जिनमें कोई बीस हजार महिलाएं व बच्चे भी सवार थे, सात घंटे तक निर्धारित रास्तों पर चक्कर लगाते रहे। उनका कई जगह पुष्प वर्षा से स्वागत हुआ, यह पूरी खबर समूचे मीडिया से ब्लेक आउट थी। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे गहरी साजिश तो है ही और उसका खुलासा होना संभव होगा नहीं, लेकिन यह तय है कि यदि कुछ सौ लोग , गणतंत्र दिवस के दिन, संसद-इंडिया गेट से डेढ किलोमीटर दूर आ कर कई घंटों तक उत्पात कर सकते हैं,
तो सुरक्षा तंत्र के असहाय दिखने का सारा दोष दिल्ली पुलिस पर ही जाएगा।

खुद को दुनिया का ‘बेस्ट काप’ कहने वाली दिल्ली पुलिस के बीते कुछ साल बेहत असफलता और असहाय जैसे रहे हैं। जेएनयू से एक छात्र नजीब गायब हो जाता है और उसका पता नहीं लगता। जेएनयू में ही कुछ लोग टुकड़े-टुकड़े वाले नारे लगा कर भाग जाते हैं, उनका खुलासा नहीं होता। बीते दिसंबर को उस घटना के एक साल हो गए जिसमें कुछ बाहरी लोग हथियार ले कर जेएनयू में घुसे थे और होस्टल में रहने वालों को पीट कर चले गए थे। उस घटना के कई वीडियो सामने आए लेकिन अभी तक कोई गिरफ्तारी हुई नहीं।

यदि बीते साल के उत्तर-पूर्वी दिल्ली में घटित भयानक दंगों की दिल्ली पुलिस की कहानी, जो कि 17 हजार पेज की चार्ज शीट में कैद है, को पूरी तरह सच मान लें तो भी वह दिल्ली पुलिस का नाकामी की ही कहानी है। देश में अमेरिका के राष्ट्रपति आने वाले थे, गणतंत्र दिवस के रंग में राजधानी थी, राज्य के चुनावों की तैयारी चल रही थी, ऐसे में संसद से महज 12 किलोमीटर दूर पांच दिन तक दंगे हुए, लोग मारे जाते रहे व संपत्ति नष्ट होती रही। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल को खुद दंगाग्रस्त इलाकों की गलियों में जाना पड़ा, जाहिर है कि ऐसा सिस्टम के पूरी तरह फैल होने पर ही होता है।

चार्ज शीट के मुताबकि दिसंबर से साजिश चल रही थी, वह भी व्हाट्सएप समूह पर, पैसे का लेनदेन हो रहा था और दंगा भउ़क जाने तक खुफिया तंत्र को खबर ही नहीं मिली। सनद रहे उन दिनों दिल्ली में सीएए आंदोलन चल रहा था व हर तरह की सुरक्षा एजंसी अलर्ट पर थी।

असफलता तो दिल्ली पुलिस की ही है…

यहां जानना जरूरी है कि दिल्ली पुलिस में कोई 83 हजार जवान हैं। ये स्पेशल सेल, एटीएस, एंटी व्हीकल थेप्ट, क्राईम ब्रांच जैसे अलग-अलग हिस्सों में असीम निरंकुश अधिकारों के साथ काम करती है। वाहन-हथियार, मुखबिर नेटवर्क पर खर्च आदि सबकुछ सुविधांए, फोन टेप करने
से ले कर किसी के भी हर पल का ब्यौरा रखने के वैध-अवैध साफ्टवेयर व उपकरणों से सुसज्जित इस बल के खुफिया तंत्र का राजनीतिक रसूख भी तगड़ा है। चूंकि मामला देश की राजधानी का है तो दिल्ली पुलिस के खुफिया तंत्र के साथ-साथ आईबी, मिलेट्री इंटेलीजेंस, अर्धसुरक्षा बलों के खुफिया तंत्र व कई बाहरी देशों की एजेंसिया भी यहां काम करती हैं व एक दूसरे से सूचनांए साझा करती हैं।

किसान आंदोलन के सिंघु बार्डर, टीकरी सीमा और गाजीपुर पर हर समय दो हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी हर समय रहते हैं जबकि औसतन दो सौ से तीन सौ खुफिया फोर्स किसानों के बीच नारे लगाती, वहीं खाना खाती टिकी हुई है। 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च निकले, उसका निर्णय लेने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को ही दिया और दिल्ली पुलिस ने उसकी अनुमति दी। जाहिर है कि टेªक्टर रैली का संचालन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार ही था। यह बात खुले में थी कि किसानी आंदोलन के सभी धड़े आपस में कुछ ना कुछ असहमति रखते हैं।

लेकिन सभी इस बात से सहमत थे कि खालिस्तान समर्थक ‘सिख फार जस्टिस’ जैसे आर्गेनाइजेशन को मंच से दूर रखा जाएगा। जब दो महीने पहले पंजाब से दिल्ली आते समय अंबाला के करीब शंभु बार्डर पर पहली बार पुलिस से बैरिकेड तोडे गए थे, तब दीप सिद्धू का नाम सामने आया था। सन 1984 में पैदा यह पंजाबी फिल्म का अभिनेता, धर्मेद के परिवार के करीब रहा हे। इसकी एक फिल्म भी धर्मेंद्र के प्रोडक्शनसे थी और बीते लोकसभा चुनाव में गुरदासपुर में सन्नी देओल के प्रचार का जिम्मा इसके हाथों था। हालांकि शंभ्ं – बाडर पर हुए बवाल के बाद सनी देओल ने ट्वीट कर बता दिया था कि अब उनका दीप से कोई ताल्लुक नहीं है। उस घटना के बाद सभी किसानी संगतों ने दीप को अलग कर दिया था।यहां तक कि वह अपना अलग टैंट लगा कर बैठता था।

बीते साठ दिनों में कभी भी सिंघु बार्डर के मंच पर दीप सिद्धू या सिख फार जस्टिस के लोगों को मंच पर चढने नहीं मिला। दिल्ली पुलिस से सहमति मिलने के बाद प्रमुख किसानी धड़े अपनी रैली को आकर्षक बनाने, सुरक्षा वालेंटियर तैयार करने, जल्दी सुबह सभी का लंगर तैयार करने जैसे कार्यों में लगे थे और इसी का लाभ उठा कर 25 जनवरी की रात बारह बजे के बाद दीप व उसके लोगों ने खाली पड़े मंच पर कब्जा किया व भाषण दिए। इन लोगों ने निहंग सिखों के एक छोटे से धड़े को अपने साथ मिलाया।

कृषि क़ानून राज्यों पर छोड़ देना चाहिए(Opens in a new browser tab)

जब 26 जनवरी की सुबह साढे आठ बजे ही टीकरी सीमा पर कुछ लोग पुलिस का पहरा तोड़ कर दिल्ली में घुसे थे और उसके बाद सिंघु सीमा पर भी कुछ सौ लोगों के पुलिस से टकराव हुए थे तभी पुलिस को ट्रैक्टर रैली के रास्तों को दुरुस्त करना था। दिल्ली पुलिस के मुताबिक 26 जनवरी
को उनके कुल पचास हजार जवान डयटी पर थे जिनमें से बीस हजार केवल रैली के रूट पर । इसके अलावा सीआरपीएफ की पचास कंपनियां, बीएसएफ की 25 और आईटीबीपी की 17 कंपनियां भी थीं। एक कंपनी में 75 जवान।

आम किसानों का जत्था तो दिल्ली की बाहरी सीमा पर अपने ट्रैक्टर ले कर डटा थ तभी गाजीपुर की तरह से बामुश्किल 20 और आउटर रिंग रोड़ से 50 टैक्टर केंद्रीय दिल्ली में घुसे। इन उपद्रवियों की संख्या होगी कोई 1500। यह बात सुरक्षा बलों को पता था कि किसानो के ट्रैक्टर सड़क रोकने के लिए इस्तेमाल कंक्रीट के बड़े टुकड़ों को पलक झपकते खिसका देते हैं तो ऐसे में नाजुक कही
जाने वाली लो फ्लेर बस, जिसकी कीमत चालीस लाख है, उसे रास्ते में लगाने की कोशिश बहुत हास्यास्पद लगी या यों कहं कि वह केवल मीडिया को शूटिंग का अवसर देने को थी। गणतंत्र दिवस की क्वीक रिसपांस टीम उस समय दिखी नीहं जब आईटीओ पर उत्पात काट कर उपद्रवी दो किलोमीटर दूर लाल किले में घुस गए।

आज पूरे देश में अनुशासित , शांत और अपने हक के लिए आवाज उठाने वाले एक लाख ट्रेक्टर सवारों की कोई चर्चा नहीं है, मीडिया के लाड़ले वे चंद उत्पाती हैं, टेलीविजन स्क्रीन ने चरस बो दी और जो लोग दिल्ली का भूगोल जानते नहीं, जिन्हें यह नहीं पता कि उत्पात की जगह से एक लाख ट्रैक्टर वाली रैली की जगह चालीस किलोमीटर दूर है, वे भी अब किसानों को कोस रहे हैं।
यह उस समय हो रहा है जब तीन दिन पहले ही दिल्ली की एक अदालत ने मीडिया की रिर्पोटिंग करने के सलीके पर तल्ख टिप्पणी की थी।

दिल्ली में जो हुआ, वह हर एक हिंदुस्तानी के लिए क्षोभ का मसला है।

आज जरूरत है कि दिल्ली पुलिस भीड प्रबंधन या उपद्रव के दौरान असफल क्यों होती है या उसका खुफिया तंत्र इतना मोथरा क्यों है? इसकी निष्पक्ष जांच के लिए किसी रिटायर्ड जज व पूर्व आला अफसरों के नेतृत्व में जांच आयोग का गठन हो। यह आयोग यह भी पता लगाए कि पुलिस द्वार इस तरह की चुनौती से जूझने में राजनीतिक दखल का कितना असर होता है।

पंकज चतुर्वेदी
support media swaraj

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

two × 3 =

Related Articles

Back to top button