कर्मयोगी के कर्म से समाज को मिलता है आदर्श

गीता प्रवचन तीसरा अध्याय

संत विनोबा गीता प्रवचन में कहते हैं कि कर्मयोगी के कर्म से एक और भी उत्तम फल मिलता है और वह है, समाज को एक आदर्श प्राप्त हो जाता है।

समाज में यह भेद तो है ही कि यह पहले जनमा है यह बाद में। जिनका जन्म पहले हुआ है, उनके जिम्मे बाद में पैदा होनेवालों के लिए उदाहरण बन जाने का काम रहता है।

बड़े भाई पर छोटे भाई को, माँ-बाप पर बेटा-बेटी को, नेता पर अनुयायियों का, गुरु पर शिष्य को, अपनी कृति के द्वारा उदाहरण पेश करने की जिम्मेदारी है।

ऐसा उदाहरण कर्मयोगी के सिवा कौन उपस्थित कर सकता है ?

कर्मयोगी सदैव कर्म-रत रहता है; क्योंकि कर्म में ही उसे आनंद मालूम होता है।

इससे समाज में दंभ नहीं बढ़ता| कर्मयोगी स्वयंतृप्त होता है, तो भी कर्म किये बिना उससे रहा नहीं जाता।

तुकाराम कहते हैं – “भजन से भगवान् मिल गया, तो क्या इसलिए मैं भजन छोड़ दूँ? भजन तो अब हमारा सहज धर्म हो गया।”

*आधीं होता संतसंग | तुका झाला पांडुरंग* |

*त्याचें भजन राहीना | मूळस्वभाव जाईना* ||

-पहले संतसंग था, जिससे तुकाराम पांडुरंग बन गया। लेकिन उसके भजन का तार अब टूटता नहीं। भला मूल स्वभाव भी कहीं छूटता है?’ क्रमश:

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