साबरमती सत्याग्रह आश्रम महात्मा गांधी जी की धरोहर , स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत

यह चित्र आश्रम की शुचिता शांति प्रसन्नता  देश के नवनिर्माण की झलक प्रस्तुत करते हैं

साबरमती सत्याग्रह आश्रम महात्मा गांधी जी की धरोहर है। गांधीजी के इस साबरमती आश्रम को टूरिस्ट सेंटर बनाने के खिलाफ सेवाग्राम से चली वाहन यात्रा  24 अक्टूबर को साबरमती आश्रम पहुंच कर प्रार्थना करने वाली है। यह प्रार्थना आश्रम का मौलिक स्वरूप क़ायम रखने के लिए होगी।

साबरमती आश्रम महात्मा गांधी जी की धरोहर और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत रही है।इस धरोहर को , इस विरासत को चित्रकार-शिल्पकार श्री दत्ता महा ( अब दिवंगत ) इन्होंने 1946 मेंअपने चित्रों द्वारा चित्रित किया था।

इन चित्रों ( स्केचेस ) का अल्बम ” गांधीजी की तपोभूमि ” शीर्षक से 1953 में आश्रम स्मारक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया था। गणेश वासुदेव मावलंकर ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। एल्बम में कुल 18 स्केचेस हैं। चित्र के नीचे के कैप्शन काका कालेलकर जी ने लिखे हैं। अल्बम की प्रस्तावना में लिखा है कि यह चित्र गांधीजी के जीवन कार्य की झांकी उपस्थित करते हैं।

अल्बम के यह चित्र आश्रम की शुचिता , शांति , प्रसन्नता  , देश के नवनिर्माण की झलक प्रस्तुत करते हैं। 

नीचे उसमें के गिने चुने चित्र दिए हैं:

पुराना इमली का पेड़
पुराना इमली का पेड़

सर्व साक्षी इमली का पेड़ अब रहा नहीं । हवा से  गिर गया। इसी वॄक्ष से दांडी मार्च निकाला था। इसलिए इसे सर्व  साक्षी इमली कहा गया। यह केवल वृक्ष नही था तो इसके साथ आश्रम के लोगों के जीवन के तार जुड़े थे। यह वृक्ष गिरने के बाद उसकी डंठल चित्रकार दत्ता महा के घर पर मैंने कई सालों तक फूलदानी में देखी है।

हृदय  कुंज गांधी जी का निवासस्थान था।

हृदय  कुंज गांधी जी का निवासस्थान था।

उपासना स्थान यानी  प्रार्थना भूमि

उपासना स्थान यानी प्रार्थना भूमि।चार दिशाएँ जिसकी दीवारें  हैं और आकाश जिसका गुंबद है ऐसा भव्य मंदिर आज तक किसी ने बांधा नही और न कोई बांध सकेगा। 

1946 और आज है सन 2021 !

मूल्य शाश्वत

सब बदल रहा है। लेकिन मूल्य शाश्वत हैं। इन मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता होनी चाहिए।

दत्ता महा साबरमती आश्रम के स्कूल में शिक्षक थे। शिल्पकार थे। उन्होंने बनाये तीन बंदरों की मूर्ति आश्रम के संग्रहालय के सामने आज भी आपको देखने मिलेगी। उनका पूरा जीवन साबरमती आश्रम परिसर में ही बीता।

दत्ता महा मेरे  मामा थे। 

— जयंत , 22-10-21

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