बनारस में एक शाम बिरजू महाराज और मैं

बृजमोहन मिश्र उर्फ बिरजू महाराज।कथक के भीतर प्रकृति और जीवन के सम्भव नए आयामों को घोलने वाले लय सारथी।

हां!शाम ही थी।
गोबर और मिट्टी से बने जंगली देवता के सम्मुख वे भी थे और नेमी प्रेमी भी।
छवि और स्वर दोनों को लय में घटित होना था। फिर उन सुघट लमहों को स्मृति और कल्पना की लहरों में बदलकर पीछा करना था। एक ऐसी इच्छा का जो संगीत नृत्य की न्यून अभ्यासी है। उसे पंडित हो जाना था कला गुरु की छवि भंगिमा और संकेतक के लोक प्रशिक्षण से।
वह ऐसी ही शाम थी जो सदा के लिए हर शाम में बदल गई है। हवाओं को काटकर शून्य में चित्रित होती हुई। रोशनी को भेदकर भंगिमा रचती हुई। अंधेरे के विराट कैनवास पर दमक की किरणों से रेखाएं बनाती हुई।सूरन बेचते ठग्गुन की स्वर लहरी से शंख मुख को वायु रेत से भरते फूंकन पंडे तक। चौरो पत्तेल की पान पर दौड़ती अंगुलियों की लहरी से लेकर पोई की चाफी का लय संयोजन।हर जगह सुर और छवि आंदोलन ही तो है।हर शाम मेरे लिए नृत्य करती हुई शाम। खुल गए आखिरी बंध अचेतन के, कला गुरु हुए जब कुछ पल इस केतन के।
नृत्य लहरी से पहले संकटमोचन के अद्वितीय मंच से एक पहाड़ी बूढ़ी नदी जवानी से ज्यादा नशीली भाषा में लय व नृत्य के शास्त्र को नग्न कर रही थी-वत्सो!सुर और लय हर जगह है। नन्हीं चींटी से लेकर हाथी तक। चिड़िया की चोंच में सुर और पंख में लय की लहर है।हवाओं की लय की कितनी अदाएं हैं!हवाओं की लय से जुड़कर फूल नाचते हैं,पत्तियां नाचती हैं,शाखें और सबकुछ।मुझे तो नदी,झरने,बादल, चांद,सितारे,पतंगे,मधुमक्खियां,ऋतुएं सब में संगीत नृत्य दिखाई देता है।मुझे तो सृष्टि की हर चीज में लय और स्वर दिखाई देता है…और मैं भीड़ के बंधन से बाहर लय और स्वर की लहर पर सवार अनंत में खो गया था।
पहली बार लगा कि जीवन लय है और लय जीवन। लय का जन्म ही बिग बैंग और लय का बिखराव ही ब्लैक होल है।कला गुरु ने जैसे मेरे बनारस प्रवास की माया को लीला में बदल दिया।अब तो सारे रसों पर भारी मेरा बनारस।
वे समझते हैं कि रामाज्ञा काशी की आवारगी में चीजों,जिंसों,स्थलों की खोज करता है।सच तो यह है कि यह अलमस्त सिर्फ आसपास की लय को स्व लय से मिलाने और ऊर्जा से लबरेज होने की सफल असफल यात्रा करता है।सतही व स्थूल वाक नहीं,समय और स्थान को अतिक्रमित करती हुई लयकारी अंतर्यात्रा।
मेरे कला गुरु कोई और नहीं, बिरजू महाराज हैं। बृजमोहन मिश्र उर्फ बिरजू महाराज।कथक के भीतर प्रकृति और जीवन के सम्भव नए आयामों को घोलने वाले लय सारथी। हमारे समय की लयहीन दुनिया के मैदान में लय के हजारों शार्दूलों पर सवार मेरे कला गुरु!
कोरोना के अनगिन वायरसों ने दो सप्ताह से मुझे लय से काटकर सुरंग में धकेल दिया है।शब्द जैसे सूख गए थे।आपके जाने से आंसू की तरह चू गए!
बनारस की लय वाली धरती पर आपके घुंघरू बनकर
हम सब बोलते रहेंगे।हम जो लय वाले हैं!
रामाज्ञा शशिधर,बनारस

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