जब कोई पहली मुलाक़ात में ही अच्छा लगा हो ….

कमाल ख़ान (Kamal Khan) से पहली मुलाक़ात में ऐसा ही हुआ। यह किसी की असल शख़्सियत की ताक़त होती है

नवीन चंद्र तिवारी

कमाल ख़ान (Kamal Khan) से पहली मुलाक़ात में ऐसा ही हुआ। यह किसी की असल शख़्सियत की ताक़त होती है जो हमारे मन के पूर्वग्रहों या संशय को एक अद्रश्य दीवार की तरह मन में आने से रोक देती है और साथ ही साथ के ऐसे भाव को प्रवाह देती है जो आपके ह्रदय के दरवाज़े खोलकर सहज सम्बन्ध स्थापित कर देता है। आप उस शख़्स को जानने से पहले ही उसे पहचान लेते हैं।

फिर कोई कुछ कहे या न कहें किसी बात का फ़र्क़ नहीं पड़ता है । शायद ये पहचान दोतरफ़ा होती है इसीलिये एक स्थायी भाव जन्म लेता है ।
कमाल से ऐसा ही सम्बन्ध रहा । हम पिछले बीस वर्षों में बहुत नहीं मिले लेकिन मन में हमेशा यही इच्छा रहती कि फिर मिलेंगे और जल्दी ही मिलेंगे। ये जानते बूझते हुए कि समय क्रूर है और जीवन अनिश्चित बार बार हम यूँ अपने आपको धोखे में रखते हैं। किसी ने बहुत सही कहा कि कुछ लोगों का जाना ऐसा ही लगता है जैसे हमारा भी एक हिस्सा चला गया हो।

कमाल के जाने से ऐसा ही लगा। ज़ाहिर है कि सिर्फ़ हमको ही नहीं बल्कि अनेक लोगों को ऐसा लगा होगा। यही उनके व्यक्तित्व की विशेषता है। कमाल न सिर्फ़ कुछ नैतिक और मानवीय मूल्यों के संरक्षक थे बल्कि सामाजिक हितों और देश की समस्याओं से सरोकार रखते थे। किसी आपाधापी या अंधी दौड़ में कभी नहीं दिखे। कभी किसी नेता या नौकरशाह को साधते या किसी पूँजीपति की पैरवी करते नहीं दिखे। निहायत मर्यादित ढंग से पत्रकारिता करते हुए वो वर्तमान समय मे अपवाद स्वरूप ही थे।

भाषा और व्यवहार की शालीनता बनाये रखते हुए भी अपने अनूठे ढंग से कड़वी सच्चाई भरी पैनी टिप्पणियाँ करने से नहीं चूकते । किसी तरह के दक्षिण या वाम से तटस्थ और समान भाव से हर सम्भव तरीक़े से सच उजागर करने की कोशिश ही उनको विशेष बनाती थी ।
कमाल की निश्छल मुस्कराहट उनकी ईमानदारी का प्रतिबिंब थी।

मुझे नहीं मालूम की कमाल मूलत: लखनऊ के थे या नहीं लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि लखनऊ जिस तहज़ीब के लिये जाना जाता था उस तहज़ीब के वे चलते फिरते नुमाइंदे थे । उनका असमय चले जाना न सिर्फ़ मीडिया जगत का बल्कि लखनऊ शहर का भी नुक़सान है। इस शहर की तस्वीर थोड़ी और धुंधली हो गई और इसकी लुप्त होती तहज़ीब को एक और धक्का लग गया है ।
टेलीविज़न पर हो रहे शोर शराबे और चीख पुकार भरे वाद विवाद और वितंडा के बीच संयत , निस्पृह , तर्कसंगत और बेबाक़ कमाल ख़ान हमारी आवाज़ थे ।

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