देश उजाड़ने वाली महामारी आख़िर फैलती कैसे है?

कोविड- 19 वायु प्रलय भाग 2

लेख के पहले भाग में वरिष्ठ पत्रकार और बीबीसी के पूर्व संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी ने आयुर्वेद ग्रंथ चरक संहिता का विस्तृत उद्धरण  देते हुए बताया कि कोरोना वायरस से होने वाली विश्व महामारी कोविड 19 एक तरह से वायु प्रलय है. राम दत्त त्रिपाठी पिछले तीन दशक से अधिक समय से पर्यावरण प्रदूषण पर अध्ययन, भ्रमण और लेखन कर रहे हैं. राम दत्त त्रिपाठी ने लेख के इस दूसरे भाग में बताया कि आख़िर इतनी जानलेवा देश उजाड़ने वाली महामारी फैलती कैसे है? 

राम दत्त त्रिपाठी

भयंकर पर्यावरण प्रदूषण से अनाज, फल सब्ज़ियों और औषधीय वनस्पतियों के गुण  क्षीण हो जाते हैं . इससे मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है. फिर तमाम बैक्टिरिया और वायरस प्रदूषित वायु के साथ महामारी लाते हैं.चरक संहिता के अनुसार विद्वान महर्षि अत्रेय ने पांचाल जनपद की राजधानी कम्पिल में गंगा के किनारे अग्निवेश एवं अन्य शिष्यों को आसमान की तरफ़ इशारा करते हुए बताया कि प्रदूषण कितना भयावह हो गया है और शीघ्र ऐसी महामारी  आने वाली है जिससे देश के देश उजड़ जाते हैं. 

मगर मूल प्रश्न यही था कि शरीर की अलग – अलग प्रकृति वाले लोग, अच्छी दिनचर्या और खानपान वाले तपस्वी ऋषि मुनि क्यों एक जैसी बीमारी का शिकार होते हैं. 

लोग बीमार पड़ते क्यों हैं?

सबकी जिज्ञासा शांत करते हुए महर्षि अत्रेय ने कहा यद्यपि लोगों के शरीर के गुण प्रकृति भिन्न है, तथापि कई अन्य कारण हैं जिनके गड़बड़ा जाने से एक ही समय में लोगों को एक जैसी बीमारी होने लगती हैं और पूरा समुदाय नष्ट हो जाता है. ये समान  तत्व हैं – वायु, जल, स्थान और काल अथवा समय. 

मतलब जिन मूल तत्वों से शरीर बना है और जिनसे पोषण होता है जिस देश और काल में वही सब गड़बड़ा जाएँगे तो फिर सभी महामारी के चंगुल में आएँगे. 

जिज्ञासा इतने से शांत नहीं हुई. फिर सवाल आया कि मिट्टी, पानी, हवा, आकाश आदि में इतना ज़हर घोलता कौन है या इस भयंकर प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार कौन है? 

जड़ में है भ्रष्टाचार और जानबूझकर अपराध

उस जमाने में ऋषि मुनि राजा से नहीं डरते थे कि सच बोलने पर वह जेल भेज देगा. एक बौद्धिक ईमानदारी थी और समाज के प्रति दायित्व बोध. इसलिए महर्षि अत्रेय ने खरा – खरा दो टूक उत्तर दिया. कहा अधर्म अर्थात् नियम विरुद्ध आचरण और प्रज्ञापराध यानी जानबूझकर किए गए अपराध. बौद्धिक बेईमानी. 

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब देश, नगर , गिल्ड यानी महासंघ और स्थानीय शासन निकायों  के प्रमुख लोग ईमान का रास्ता छोड़कर लोगों से बेईमानी  से पेश आते हैं तब उनके अधिकारी, कर्मचारी, नगर और समुदाय के लोग और व्यापारी इस भ्रष्टाचार को और आगे बढ़ाते हैं. 

जिस  तरह खोटे  सिक्के असली सिक्के को बाहर कर देते हैं, उसी तरह यह बेईमान लोग  बलपूर्वक ईमानदार सदाचारी लोगों को नष्ट कर देते हैं. जिस देश को  सदाचारी लोग छोड़ देते हैं वहाँ से देवता लोग भी चले जाते हैं. हम पंच महाभूतों को भी देवता मान  सकते हैं. 

परिणाम स्वरूप जब समाज से सदाचार, नियम – क़ानून ईमानदारी ग़ायब हो जाती है और बेईमानी का बोलबाला हो जाता है और देवता लोग उस स्थान को छोड़ देते हैं तो ऋतुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

 इस कारण समय से वर्षा नहीं होती, सूखा पड़ जाता है अथवा अनियमित और अपर्याप्त वर्षा होती है. हवा ठीक से नहीं बहती. इसका प्रभाव ज़मीन की उर्वरा शक्ति पर पड़ता है. जलाशय सूख  जाते हैं. और तब वनस्पतियाँ अपना स्वाभाविक गुण धर्म छोड़ देती हैं यानी उनमें पोषक तत्व नहीं रह जाते और वह बीमार या रुग्ण हो जाती हैं. 

इस तरह बीमार वनस्पतियों और खाद्य पदार्थों से महामारी का विस्फोट होता है. 

महर्षि अत्रेय ने तीन  हज़ार साल पहले जो कहा है उसे आज के संदर्भ में देखें तो आज प्रदूषण से बढ़ी गरमी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र में सुनामी आ रही है, नदियाँ सूखकर विलुप्त या प्रदूषित हो रही हैं, हवा में ज़हर घोला जा रहा है, मिट्टी बीमार हो रही है. आकाश की तरंगों  के साथ भी भयंकर छेड़छाहम कैसे सोच सकते हैं कि हमें जो खा पी रहे हैं उनसे पोषक  तत्व मिलेंगे या औषधीय वनस्पतियों में मौलिक रसायन होंगे. 

सरकार और मुनाफ़ाखोर व्यापारियों का खेल

यह सरकार और मुनाफ़ाखोर व्यापारियों का खेल पूरी दुनिया का पर्यावरण बर्बाद कर रहा है. चौड़ी सड़कों, नए शहरों और खनिज पदार्थों के लिए करोड़ों की संख्या में पेड़ और जंगल काटे जा रहे हैं. नदियाँ और दूसरे जल स्रोत बर्बाद किए जा रहे हैं. कोयला, पेट्रोल, डीज़ल, प्लास्टिक, फ़ोम, लोहा, सीमेंट, गिट्टी, बालू, मोरंग, सीसा का प्रयोग बढ़ता जा रहा है. 

कोरोना वायरस की वर्तमान प्रलयकारी त्रासदी से निबटने के लिए एम्बुलेंस, अस्पताल, आक्सीजन, वेंटिलेटर, डाक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ़ की व्यवस्था युद्ध स्तर पर ज़रूरी है. लेकिन केवल फ़ायर फ़ाइटिंग से भी कम नहीं चलेगा.

पक्ष विपक्ष में बैठे, वर्तमान और भूतपूर्व सभी नीति निर्माताओं को अपनी सारी योजनाओं, शासन तंत्र और क़ानून क़ायदों की समीक्षा करने के साथ आत्म निरीक्षण भी करना होगा कि औद्योगिक, शहरी और कृषि क्षेत्र की हरित क्रांति में चूक कहाँ हुई.

कोरोनावायरस के प्रकोप से दुनिया भर में लाखों लोगों के मरने के बाद भी नीतियाँ बनाने वालों की तरफ़ से अगले सौ सालों के लिए कृषि, उद्योग अर्थ व्यवस्था, रोज़गार और स्वास्थ्य आदि के बारे में नया चिंतन नहीं शुरू हो रहा. जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अब भी विकसित देशों में टालमटोल चल रही है.

अब अगले सौ सालों के लिए विकास का ऐसा माडल ढूँढना होगा जो जीवन के पंच महाभूतों मिट्टी, हवा, जल और आकाश से तालमेल बिठाकर चले. उन्हें नष्ट न करे. प्राकृतिक संसाधन समाज की धरोहर हैं इसलिए उन पर समुदाय का नियंत्रण हो ताकि ताकि केंद्र या प्रदेश की सरकार खनिज पदार्थों, कोयला, पेट्रोल आदि के दोहन के लिए पूँजीपतियों के हवाले न कर दें. अंधाधुंध शहरीकरण और गाँवों को उजाड़ने का  काम बंद किया जाए. जल, जंगल, ज़मीन, हवा और आसमान को प्रदूषण मुक्त किया जाए. गाँव और क़स्बों में शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था मज़बूत की जाए. 

अब अगले सौ सालों के लिए विकास का ऐसा माडल ढूँढना होगा जो जीवन के पंच महाभूतों मिट्टी, हवा, जल और आकाश से तालमेल बिठाकर चले. उन्हें नष्ट न करे. प्राकृतिक संसाधन समाज की धरोहर हैं इसलिए उन पर समुदाय का नियंत्रण हो ताकि ताकि केंद्र या प्रदेश की सरकार खनिज पदार्थों, कोयला, पेट्रोल आदि के दोहन के लिए पूँजीपतियों के हवाले न कर दें. अंधाधुंध शहरीकरण और गाँवों को उजाड़ने का  काम बंद किया जाए. जल, जंगल, ज़मीन, हवा और आसमान को प्रदूषण मुक्त किया जाए. गाँव और क़स्बों में शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था मज़बूत की जाए. हमें समाज में सदाचार और श्रम को भी प्रतिष्ठित करना होगा.

हमें समाज में सदाचार और श्रम को भी प्रतिष्ठित करना होगा.  

हमारा राजनीतिक सिस्टम, शासन तंत्र और न्यायिक व्यवस्था पथ भ्रष्ट है, इसलिए इन सबके लिए पहल समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी को करनी होगी. 

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