प्रकृति और “विकास” की उड़ान 

प्रकृति के अस्तित्व से कोई भी इंसान इंकार नहीं कर सकता है. प्रकृति से ही हमारा अस्तित्व है. प्रकृति के नजदीक जाने से सुकून मिलता है. शरीर में 80 प्रतिशत पानी है, यही कारण है कि नदी, झरना, झील व समुद्र के किनारे बैठने से हमारा रिश्ता उनसे जुड़ जाता है. वही स्थिति मन की है. वह स्थिर रह ही नहीं सकता. चंचलता उसका स्वभाव है. उसे विचरण करने दीजिए. शरीर से आप विस्तर पर भले आराम कर रहे हों लेकिन मन से विभिन्न शहरों की यात्रा करते रहिए.

दर्शन शास्त्र में कुछ लोग “आत्मा” के सिद्धांत को मानते हैं और कुछ इससे इंकार करते हैं. लेकिन “मन” तो है, चेतन और अचेतन..! मन की उड़ान से आप उन स्थानों पर भी पहुंच जाते हैं, जहां वर्षों पहले घूमने गए थे. किसी भी शहर में आप जा सकते हैं. सिर्फ शरीर से ही नहीं बल्कि “मन” की उड़ान से भी घूमते रहिए. कभी-कभी नींद आने से पहले पुरानी स्मृतियों में मन खुद ही विचरण करने लगता है.

सबका अपना अलग स्वभाव होता है. हम अपनी तरह सोचने वाले लोगों की तलाश करते रहते हैं. दरअसल यह काम “मन” का है. आप उसे समझने के लिए “आत्मा” भी कह सकते हैं जो अपने स्वभाव के अनुकूल व्यक्तियों की तलाश में भटकती रहती हैं. यह यात्रा कभी पूरी हो जाती है और कभी अधूरी ही रह जाती है. जिंदगी की आपाधापी में जो भी आपसे मिलते हैं, कोई जरूरी नहीं की उनसे आपकी लगातार मुलाकातें होती रहेंगी. चलते-चलते रास्ते में अलगाव भी हो सकता है. इसका आधार है “सोच”..! सोचने का तरीका बदलते ही व्यक्ति का व्यवहार भी बदलने लगता है.

अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि जो लगातार अपनी पहल पर आपसे बातें करते हैं, वह खुद दूरी बनाने लगते हैं. उपेक्षा..! ऐसा हो तो चिंतित होने की जरूरत नहीं है. यह परिवेश और लक्ष्य पर निर्भर करता है कि कौन, कब और क्यों आपसे मिलता है. बस..! साक्षी भाव से बदलाव की इस यात्रा को देखते रहिए. आप कुछ कर भी नहीं सकते हैं.

जब तक दो व्यक्तियों की रूचि व स्वभाव आपस में मिलता है, तभी तक वे साथ हैं. सफलता प्राप्त करने की सबको जल्दी है और इस दौड़ में वह शामिल हैं. लेकिन आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक परिवेश अब वह नहीं है जो चार दशक पहले था. फिलहाल इसे समझने में चुक का परिणाम है, सोच व व्यवहार में बदलाव और ऊहापोह..! यह रहेगा. क्योंकि व्यक्ति अब उस मुहाने पर खड़ा है, जहां उसे लगता है कि जो कुछ उसके हाथ में था वह भी अब धीरे-धीरे निकल रहा है.

पूँजी का खेल

यह “पूंजी” का खेल है. पूंजीपति तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की तैयारी में हैं. कर भी रहे हैं. उन्हीं के लिए जंगल काटे जा रहे हैं. पहाड़ तोड़े जा रहे हैं. नदियों की धारा बदली जा रही है. प्रकृति की दुश्मन बन गई हैं, इंसान की इच्छाएं. उसे इसकी चिंता ही नहीं है कि हवा-पानी जहरीला हो रहा है. यह धरती अब इंसान के रहने के लायक नहीं रह गई है. अपनी प्रजाति को बचाने के लिए, जल्दी ही उसे किसी दूसरे ग्रह की तलाश करनी पड़ेगी.

कभी धरती पर सबसे शक्तिशाली जीव डायनासोर था जो विलुप्त हो गया. भोजन के अभाव में..! वर्तमान में उसकी जगह इंसान ने ले लिया है. प्राकृतिक संसाधनों का दोहन व उयोग सबसे अधिक वही करता है तो इसका परिणाम भी उसी को भुगतना है. हवा और पानी प्रकृति के ऐसे हथियार हैं, जिससे वह बदला लेती है. अब उसके बदला लेने का समय नजदीक आ गया है और इसका कारण इंसान की बढ़ती इच्छाएं हैं. देखते चलिए हम जिस भविष्य की संरचना में लिप्त हैं, उसका स्वाद चखने के लिए तैयार रहिए. यह “विकास” की उड़ान है.


■ सुरेश प्रताप, वरिष्ठ पत्रकार, वाराणसी

सुरेश प्रताप, वरिष्ठ पत्रकार, वाराणसी

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