पौधे भी समझते हैं

पौधे यह समझते हैं कि आप क्या सोच रहे हैं ? आपका इरादा क्या है ? अपनी भाषा में वे सामने वाले से संवाद स्थापित कर लेते हैं. पौधे ही नहीं बल्कि पहाड़, झरना व नदियां भी संवाद करने की भाषा जानती हैं. जिस अणु से इंसान के शरीर की संरचना हुई है, वही इनमें भी है. आसमान भी आप जो कुछ सोचते हैं, उसे तत्काल जान जाते हैं.

एक छुईमुई का पौधा होता है, वह इतना शर्मिला व संवेदनशील होता है कि हाथ से छूने पर उसकी पत्तियां आपस में चिपक जाती हैं. कुछ देर बाद पुन: अलग हो जाती हैं. बचपन में अक्सर हम लोग उसे छूते रहते थे. यानी स्पर्श की भाषा सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि पेड़-पौधे भी समझते हैं.

हां, इंसान के अंदर जो चालाकियां होती हैं, वह पौधों भी नहीं होती है. मूर्खता सिर्फ इंसान के पास होती है, जंगल, पहाड़, झरना, नदियां व समुद्र इस कला से वंचित होते हैं. जाहिर सी बात है कि उन्हें इंसान की इस मूर्खता पर हंसी आती होगी. जब प्रकृति का विनाश करके इंसान अपनी क्षमता पर गर्वान्वित होता है, तो पेड़-पौधे शायद उसकी इस मूर्खता पर मुस्कराते हैं. जब पेड़ ही नहीं रहेंगे तो सांस लेने के लिए ऑक्सीजन कैसे मिलेगी ?

यह डिजर्ट रोज यानी रेगिस्तानी गुलाब का पौधा है. एक साल से अधिक समय से छत पर था और पानी नहीं मिलने का कारण तेज धूप में सूख गया था. इसमें पत्तियां नहीं थीं और डंठल भी सिकुड़ गया था. बीस दिन पहले इसे नीचे लाए और पहले पानी से इसके डंठल को स्नान कराए. गमले में भी पानी डाले. यह प्रक्रिया लगातार चलती रही और धीरे-धीरे हरी पत्तियां उसमें निकलने लगीं.

ठीक उसी तरह यह पौधा कोमा में चला गया था, जैसे कोई इंसान बीमार पड़ने पर अस्पताल के आईसीयू में भर्ती हो जाता है. फिर डाॅक्टरों की सलाह और दवाई से धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाता है. डिजर्ट रोज के इस पौधे के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. सिर्फ “जल चिकित्सा” से इसका इलाज मैंने शुरू किया और यह पौधा अब पूर्णत: स्वस्थ है.

कुछ मित्रों की सलाह थी की अडेनियम प्रजाति के इस पौधे को पानी कम देना चाहिए और इसे पर्याप्त धूप मिलनी चाहिए. इस सलाह का भी मैंने ख्याल रखा लेकिन मैं जानता था कि तेज धूप में पानी नहीं मिलने के कारण ही यह कोमा में चला गया था और सूख रहा था. अत: पानी को इसकी जरूरत थी.

हां, इलाज के दौरान ही मैंने देखा कि इसकी पत्तियां जो सूख कर आपस में चिपक गई थीं, वही धीरे-धीरे पानी मिलने से हरी होने लगीं और फिर दस दिन के अंदर खिलखिला कर मुस्कराने लगीं. अद्भुत..! अब बारिश के मौसम में मैं ख्याल रखूंगा कि इसे अधिक पानी नहीं मिले. इस पौधे को जल्दी ही दूसरे गमले में खाद-पानी मिलाकर लगाऊंगा, क्योंकि फिलहाल उसका गमला छोटा है.

जब भी मैं डिजर्ट रोज के इस पौधे के पास जाकर खड़ा होता हूं, तब मुझे लगता है कि मेरे आने की खबर उसे मिल गई है. उसकी पत्तियां चहचहा उठती हैं. अपनी भाषा में वह संवाद स्थापित करती हैं. कुछ कहती हैं. 

इसके अंदर जीने की जिजीविषा थी और मैंने उसके लिए उचित परिवेश उपलब्ध कराने की कोशिश की. अब इसमें फूल भी आएंगे. इसके फूल सुर्ख लाल रंग के होते हैं. एक साल पहले इसमें फूल खिले थे और बीज में आए थे. तो मैं यह कह रहा था कि पेड़-पौधे भी अपनी भाषा में संवाद स्थापित करते हैं और आपकी भावनाओं को अच्छी तरह महसूस करते हैं. एक बार उनसे संवाद स्थापित करके तो देखिए. अच्छा लगेगा.

सुरेश प्रताप, वरिष्ठ पत्रकार, वाराणसी

■ सुरेश प्रताप, वाराणसी

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