“मोहन से महात्मा” पुतुलनाट्य के पन्द्रह वर्ष

‘मोहन से महात्मा’ कठपुतली नाट्य का सफर पिछले पंद्रह सालों से सतत जारी है. यह एक मिसाल है. साथ ही शुभ सूचक भी कि इस कला में अब भी बहुत सम्भावना है.

  • जयदेव दास

आज भी विश्व के अनेक देश भारत को ‘बापू’ के नाम से ही पहचानते हैं. भारत से गया व्यक्ति अपना परिचय देते हुए जब यह बताता है कि वह उस देश से आ रहा है, जिस देश में गांधी जी ने जन्म लिया था तो उनमें से बहुतेरे उस व्यक्ति को स्पर्श कर ही अपनी आस मिटा लेता है और यह अविश्वसनीय घटना आज भी घटती है. बापू के व्यक्तित्व की यह आभा है.

पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बापू को अपने ही देश में बिसराने की कवायद चल रही है. कहीं कहीं तो उन्हें बच्चों के पाठ्यक्रम से ही हटा दिया गया है या हटाने के लिए प्रयासरत हैं. पर यह आसान नहीं होगा उन लोगों के लिए क्योंकि आज भी गांधी के विचारों को अपने जीवन में स्थान देने वालों की एक लंबी फेहरिस्त देखने को मिलती है.

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष रह चुके स्वर्गीय सुनील गंगोपाध्याय जी से एक बार किसी सज्जन ने कहा कि मान लीजिए कवि गुरु रविन्द्र नाथ ठाकुर की सारी रचनायें नष्ट हो जाये तो क्या होगा. इसके उत्तर में उन्होंने जो कहा वो विचारणीय है. उन्होंने कहा कि हम सब मिलकर पुनः लिख लेंगे क्योंकि हम बांग्लाभाषियों में ज्यादातर लोगों को उनकी रचनायें कंठस्थ हैं.

वैसे ही बापू के विचार या उनके जीवन पद्धतियों को गांधीवादी विचारधारा के लोग आत्मसात कर चुके हैं. और वो बापू के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में भी लगे हुए हैं. ऐसे ही विशिष्ट जनों में से एक हैं काशी में रहने वाले मिथिलेश दुबे.

मिथिलेश दुबे भारत के जाने-माने कठपुतली नाट्य विशेषज्ञ हैं. ‘मोहन से महात्मा’ कठपुतली नाट्य उनकी एक मानीखेज प्रस्तुति है. पिछले पन्द्रह सालों से लगातार इसकी प्रस्तुति वो देश के कोने कोने में जाकर करते रहे हैं. उन्होंने देश के लगभग हर प्रतिष्ठित मंच पर इसकी प्रस्तुति की है. उनसे जब ‘मोहन से महात्मा’ के सफर के बारे में हमने जानने की उत्सुकता जताई तो उन्होंने इससे अवगत कराया.

2 अक्टूबर 2006 यानी गांधी जयंती के दिन ‘मोहन से महात्मा’ की पहली प्रस्तुति जयपुर के प्राकृतिक चिकित्सालय प्रांगण में, विनोबा ज्ञान मंदिर और राजस्थान समग्र सेवा संघ के तत्वावधान में किया गया था. पर इसकी रचना प्रक्रिया इससे बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी. नारायण भाई देशाई (पुत्र महादेव भाई देशाई) की ‘गाँधीकथा’ का आयोजन जयपुर में हुआ था, जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, गांधीवादी विचारधारा के विशिष्ट अतिथिगण और सर्वोदय के कार्यकर्ता भारी मात्रा में उपस्थित थे.

कार्यक्रम के समापन के बाद जब नारायण भाई से चिंता व्यक्त किया गया कि बापू के विचारधारा का प्रसार कैसे हो? या ऐसे कार्यक्रमों को आगे कैसे बढ़ाएं? तब उन्होंने बहुत ही सहजता से कहा कि मैं जो कर सकता हूं, कर रहा हूं. अब आपको सोचना है कि क्या और कैसे करना है. जल्द ही एक बैठकी का आयोजन गांधीवादियों और सर्वोदय के कार्यकर्ताओं ने किया. जहां यह तय हुआ कि बापू के विचारों को बच्चों में ले जाया जाए तो ज्यादा प्रभावी रहेगा.

अब माध्यम की तलाश की जाने लगी. किसी ने कहा नाटक करते हैं तो किसी ने कुछ और उपाय सुझाए. अन्ततः सभी कठपुतली कला को बच्चों के लिए उपयुक्त माध्यम के रूप में पाया. इसी के माध्यम से बच्चों के बीच में गांधी के विचारों को ले जाने की बात तय की गई. साथ ही इस काम की जिम्मेदारी सर्वोदय के कार्यकर्ता द्वय यानी बिंदु सिंह और मिथिलेश दुबे को सौंपी गई. शोधपरक कार्य आरम्भ हुआ. गांधी जी से सम्बंधित पुस्तकों का संग्रह और उनका मूल्यांकन कर एक रूप रेखा का निर्माण किया जाने लगा. साथ ही गांधी जी के संसर्ग में रहे महानुभावों से राय मशविरा भी लिया जाने लगा, जिनमें प्रमुख रूप से सिद्ध राज ढढा, ठाकुर दास बंग, पंचम भाई, नारायण भाई देशाई आदि अनेक व्यक्तित्व से सम्पर्क साधा गया.

इसके बाद भारतवर्ष के उन स्थानों का भी भ्रमण किया गया, जहां-जहां गांधी जी ने अपने सेवाकार्य से उसे विशेष दर्जा दिलाया था. पोरबंदर, साबरमती आश्रम, आगा खां पैलेस, सेवाग्राम जैसी विभिन्न जगहों पर जा-जाकर जानकारियों को इकट्ठा किया गया. सारी जानकारियों को इकट्ठा करने के बाद अब बारी थी नाट्यालेख को तैयार करने की.

सूचनाओं को दृश्य देना एक अलग शिल्प है. उससे पहले इसे एक कथारूप में ढालना ज्यादा जरूरी था. जहां घटनाओं को एक सूत्र में पिरोना किसी चुनौती से कम न था. साथ ही गाँधीजी जैसे व्यक्तित्व के जीवन से जुड़ी किन घटनाओं को रखा जाय और किसे छोड़ा जाय, यह तय करना बहुत ही दुरूह कार्य रहा. इसमें मदद मिला वरिष्ठ गांधी विचारधारा के लोगों का, जिनके सलाह व मार्गदर्शन से गाँधीजी के जीवन से जुड़ी प्रमुख-प्रमुख घटनाओं को चुना गया और नाटक में शामिल किया गया. इसमें बचपन से लेकर उनके शहीद होने तक कि घटनाओं को समायोजित किया गया.

नाट्यलेखन तैयार होने के बाद बारी थी कठपुतली कला में प्रशिक्षित होने की.  कठपुतली निर्माण करने की विधि जानने के लिए ‘तिलोनिया संस्था और प्रौढ़ शिक्षा समिति के प्रयास से दल के साथियों को प्रशिक्षण दिया गया. नाटक के चरित्रों के अनुरूप कठपुतली निर्माण कार्य आरम्भ किया गया. चरित्र के अनुसार वेशभूषा तैयार किया गया. सेट, प्रॉप्स का निर्माण किया गया, जिसमें गांधी जी का चरखा, मेज, कुर्सी, पलंग, बकरी आदि तो हैं ही, साथ ही कारागार, आश्रम, कुटिया, स्कूल बोर्ड जैसी अनेक सामग्रियों का निर्माण किया गया.

सामग्रियों के निर्माण प्रक्रिया को पूर्ण करने के बाद अब बारी थी पूर्वाभ्यास (रिहर्सल) की. असली परेशानी अब समझ आने लगी. जहां केवल धैर्य ही एक मात्र सम्बल रहा. कठपुतली नाट्य प्रस्तुति की शैली अलग-अलग होती है, जिनमें डोरी से चलने वाली कठपुतली, छड़ से संचालित होने वाली कठपुतली, छाया द्वारा दिखाया जाने वाला खेल और हाथों में पुतुलों को बांध कर उनका संचालन किया जाता है.

‘मोहन से महात्मा’ में हाथ द्वारा संचालित विधि को अपनाया गया है. यह विधि थोड़ी कठिन भी इसलिए हो जाती है कि संचालक को अपने दोनों हाथों को सिर के ऊपर कर कठपुतली थामना होता है. केवल थामना ही नहीं बल्कि उनके संवादों के अनुरूप संचालन भी करना होता है. अतः कुछ ही पलों में दोनों हाथ भर जाते हैं, ज्यादा देर ऊपर रखना मुश्किल हो जाता है. इसके अलावा सभी साथी नए थे, दिक्कत ज्यादा थी पर हिम्मत नहीं हारे, उत्साह बना रहा.

मोहन से महात्मा’ पुतुल नाट्य में एक सौ पचास कठपुतलियों का प्रयोग होता है. अतः शुरू से लेकर आखिर तक के दृश्यों के अनुरूप उन्हें ऐसे सजाकर रखना होता है कि दृश्य दर दृश्य करने में रुकावट या उलझन न हो. चूंकि पूरा नाटक रेकॉर्डेड चलता है इसलिए सावधानी और सतर्कता की जरूरत अधिक रहती है. किसी भी कारण से कोई दृश्य या एक पल भी चूक हुई, तो नाटक संभालना टेड़ी खीर हो जाता है.

मिथिलेश जी आगे जोड़ते हैं कि इस विशेष और गम्भीर कार्य के तैयारी की भनक मीडिया को भी लग गई थी. अतः वो भी इसकी सूचना पाने और अपनी पत्रिका में पहले-पहल स्थान देने को लालायित थे. सभी अपने स्तर पर कोशिश करते रहे पर सर्वोदय के सदस्य चाहते थे कि तैयारी पूरी होने के बाद ही इसका खुलासा किया जाए.

अथक प्रयास के बाद जब ‘मोहन से महात्मा’ तैयार हो गई, तब दिन तय हुआ और पहली प्रस्तुति गांधी जयंती के दिन की गई। इसकी प्रस्तुति होते ही लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। क्योंकि गांधी जी के जीवन या यूं कहें कि किसी विशेष व्यक्तित्व के जीवन की घटनाओं को कठपुतली के माध्यम से दिखाए जाने की उक्त घटना पहली बार घट रही थी.

बच्चों को तो यह भायेगा ही, साथ ही बुजुर्गों का भी यह कहना रहा है कि गांधी जी का जीवन जितना सहज सरल था, प्रस्तुति भी उतनी ही सहज रूप से आंखों के सामने बहती है. किसी भी प्रकार के आडम्बर से मिथिलेश दुबे इस प्रस्तुति को बचाकर प्रस्तुत करते हैं. पर इसकी विशेषता यह है कि इसे बड़े से बड़े हॉल में अत्याधुनिक लाइट या और भी तकनीकी के सहारे भी खेला जा सकता है.

वहीं सुदूर गाँव के मैदान में जहां केवल प्रकाश सूरज या रात को मशाल की व्यवस्था हो, वहां भी दिखाया जा सकता है. यही इस प्रस्तुति की खूबी है, और विशेषता भी. इसी वजह से यह प्रस्तुति पिछले डेढ़ दशक से लगातार लोगों के बीच खेली जा रही है. अब तक लगभग आधा भारतवर्ष (लगभग 350 जिलों के लोग) इस नाटक को देख चुके हैं.

मिथिलेश जी इस नाट्यप्रदर्शन को देश के हर जिले, हर गांव तक ले जाने के लिए प्रयासरत हैं. यह जैसे उनके जीवन का ध्येय भी है. उनका कहना है कि पिछले दो सालों में वो भी लॉकडाउन के कारण कारवाँ की गति थोड़ी मद्धिम हुई जरूर हुई है पर रुकी नहीं और न ही रोकने का उनका मन है.

पिछले दिनों के हालात ने कला से जुड़े हर कलाकार को औंधे मुंह ला खड़ा किया है. कठपुतली कला का हाल तो और भी बेहाल है. ऐसे में ‘मोहन से महात्मा’ कठपुतली नाट्य का सफर पिछले पंद्रह सालों से सतत जारी है. यह एक मिसाल है. साथ ही शुभ सूचक भी कि इस कला में अब भी बहुत सम्भावना है. सबसे अच्छी बात यह है कि वर्तमान में लग रहा है कि बच्चों से उनका बचपन लोप पा रहा है. उन्हें हम कठपुतलियों के जगत में पुनः ले जाकर उनका बचपन उन्हें सौंप सकते हैं. क्यों न ‘मोहन से महात्मा’ उसका पाथेय हो!

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