चिकित्सा विज्ञान के खोज और प्रयोग के प्रणेता भगवान धनवंतरि

भारतीय सभ्यता में स्वास्थ्य के देवता के रूप भगवान धनवंतरि को माना गया है

आयुर्वेद के प्रथम उपदेश कर्ता ब्रह्मा को माना जाता है, परन्तु भगवान धनवंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है। पुराणों में तीन धनवंतरि का उल्लेख मिलता है। दोनो का ही चिकित्सा विज्ञान से संबंध है। पहले धनवंतरि का अवतरण समुद्र मंथन से होता है। आज धनवंतरि जयंती पर आइए, जानें इनके बारे में…

डॉ. आर.अचल


मानव सभ्यता का विकास, मानव जीवन के संघर्षों का गाथा मिथकों के रूप में सुरक्षित है। मानव जीवन के निरंतरता में सबसे बड़ी बाधा स्वास्थ्य है। इसलिए दुनियाँ की प्रत्येक सभ्यता में स्वास्थ्य देवता की कल्पना की है। इस क्रम में भारतीय सभ्यता में स्वास्थ्य के देवता के रूप भगवान धनवंतरि को माना हैं. हालांकि आयुर्वेद के प्रथम उपदेश कर्ता ब्रह्मा को माना जाता है, परन्तु भगवान धनवंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है। पुराणों में तीन धनवंतरि का उल्लेख मिलता है। दोनो का ही चिकित्सा विज्ञान से संबंध है। पहले धनवंतरि का अवतरण समुद्र मंथन से होता है।

अग्नि व कूर्म पुराण की कथा के अनुसार मन्दराचल पर्वत व वासुकी नाग के सहयोग से देव-दानवों नें मिलकर समुद्र मंथन किया। जिसे कालकूट विष, कामधेनु, उच्चश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी, चन्द्रमा आदि के साथ कार्तिक त्रयोदशी के दिन तीनों लोगो में व्याप्त रोग, शोक का हरण करने के लिए अमृत कलश व वनौषधि धारण कर धनवंतरि प्रकट हुए। इन्हें भगवान विष्णु का अवतार भी माना जाता है।

समुद्रमंथन की मिथकीय कथा का व्याख्या करने पर ऐसा लगता है कि है, सभ्यता के विकास क्रम में मानव जीवन का सबसे बड़ा संकट उसका स्वास्थ्य रहा है, जिसके लिए आदि कालीन मनुष्य ने भी अपने अनुभवों का प्रयोग करता रहा होगा, परन्तु जब विकास क्रम में मनुष्य अत्यधिक व्याधियों महामारियों से त्रस्त हुआ होगा तो देव-दानव, नाग, पर्वत, मानव जातियाँ के कबीले एक साथ बैठ कर वैचारिक, प्रायोगिक, शोध विमर्श किया होगा.

चूँकि यह विमर्श और प्रयोग काफी श्रमसाध्य कार्य रहा होगा, इसलिए व्यंजनात्मक भाषा इसे समुद्र मंथन कहा गया होगा। इस मंथन मे चौदह रत्नों के साथ विष निकलने बात भी कही गयी है। इसको इस तरह देख सकते है कि किसी भी अनुसंधान में अपद्रव्य भी प्राप्त होते है, जैसे वाहन के ईंधन जलने से ऊर्जा के साथ कार्बन का उत्सर्जन भी होता है। जो वातावरण को विषाक्त करता है, इसके लिए भगवान शिव की तकनीक से नाग जाति ने विष को निष्कृय करने की विधि खोजी होगी। शिव के विषपान का मिथक यही संकेत करता है। इस प्रकार समुद्र मंथन एक संयुक्तवृहत्तर वैज्ञानिक प्रयोग लगता है जिससे वाहन अमृत, मद्य, चिकत्सा विज्ञान आदि के रूप में सुख ऐश्वर्य के संसाधन प्राप्त होते हैं. अंततः इस ऐश्वर्य का प्रतीक लक्ष्मी भी निकलती है चिकित्सा विज्ञान के प्रतीक धनवंतरि है। इसीलिए इस पर्व में धन, धनवंतरी और लक्ष्मी एक साथ जुड़ जाते है।

भगवान धनवन्तरि के अवतरण एक अन्य कथा महाभारत में भी मिलती है, जिसके अनुसार गालव ऋषि जब प्यास से व्याकुल हो वन में भटकर रहे थे तो कहीं से घड़े में पानी लेकर जा रही वीरभद्रा नाम की एक कन्या ने उनकी प्यास बुझायी। इससे प्रसन्न होकर गालव ऋषि ने आशीर्वाद दिया कि तुम योग्य पुत्र की मां बनोगी। लेकिन जब वीरभद्रा ने कहा कि वे तो एक वेश्याव है तो ऋषि उसे लेकर आश्रम गए और उन्होंने वहां कुश की पुष्पाकृति आदि बनाकर उसके गोद में रख दी और वेद मंत्रों से अभिमंत्रित कर प्रतिष्ठित कर दी वही धन्वंतरि कहलाए।

ब्रह्मपुराण व विष्णु पुराण के अनुसार भगवान धनवन्तरि अवतरण की तीसरी कथा में काशी के राजवंश में धन्व नाम के एक राजा ने उपासना करके अज्ज देव को प्रसन्न किया, जिनके वरदान से धन्वंतरि नामक पुत्र का जन्म हुआ। धन्व काशी नगरी के संस्थापक काश के पुत्र थे।

काशी वंश परंपरा में दो वंश परंपरा मिलती है। हरिवंश पुराण के अनुसार काश से दीर्घतपा, दीर्घतपा से धन्व, धन्व से धन्वंतरि, धन्वंतरि से केतुमान, केतुमान से भीमरथ, भीमरथ से दिवोदास हुए जबकि विष्णु पुराण के अनुसार काश से काशेय, काशेय से राष्ट्र, राष्ट्र से दीर्घतपा, दीर्घतपा से धन्वंतरि, धन्वंतरि से केतुमान, केतुमान से भीमरथ और भीमरथ से दिवोदास हुए। यह कथा धनवन्तरि के मानवीय स्वरूप का संकेत देती है। इसमें दिवोदास धनवन्तरि ने धन्वंतरि संहिता की रचना की, जिसमे शल्य चिकित्सा की प्रमुखता है। इनके शिष्य सुश्रुत हुए जिन्होंने महान शल्य; सर्जरी ग्रंथ सुश्रुत संहिता लिखी जो आज भी आयुर्वेद पाठ्यक्रम प्रमुख ग्रंथ है।इस ग्रंथ को आधुनिक विज्ञान ने भी सर्जरी का प्रथम ग्रंथ तथा आचार्य सुश्रुत को प्रथन सर्जन के रुप में स्वीकार किया है।

प्राचीन काल में आयुर्वेद के शल्य चिकित्सक; सर्जनद्ध को धनवन्तरि की उपाधि दी जाती थी। शल्य शाखा को धानवन्तरि शाखा कहा जाता है।

प्राचीन काल में आयुर्वेद के शल्य चिकित्सक; सर्जनद्ध को धनवन्तरि की उपाधि दी जाती थी। शल्य शाखा को धानवन्तरि शाखा कहा जाता है। इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि चूँकि दिवोदास राजपुरुष थेएजिससे युद्ध में घायल सैनिको की चिकित्सा की आवश्यकता पड़ती है। आवश्यता आविष्कार की जननी होती है। इसलिए दिवोदास धनवन्तरि ने शल्या विधा का विकास किया होगा।

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चिकित्सा के देवता धनवन्तरि की बात यही खत्म नहीं होती है। दक्षिण के द्रविण चिकित्सा विज्ञान सिद्ध में धनवन्तरि, सिद्धार तन्वंतरियार बन जाते हैं, जो द्रविण चिकित्सा के आदि उपदेश करता भगवान शिव के मानस पुत्र है। कालान्तर में इनका जन्म वैतिश्वरम नामक स्थान पर कुरुक्कल समुदाय मे हुआ, जो रसशास्त्र व सर्जरी के आचार्य बनें। इसी तरह तिब्बती चिकित्सा विज्ञान में बुद्ध के अवतार के रुप मेनला हाथ में धनवन्तरि की ही तरह हाथ में अमृत कलश व संजीवनी बूटी लेकर समुद्र के बजाय बर्फ से अवतरित होते है। इधर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के आदिवासी चिकित्सक बैगा भी धानो की उपासना कर चिकित्सा कार्य करते है।

इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक रुपों में रोग. शोक हरण के लिए खोज और प्रयोग के देवता धनवन्तरि उपास्य है, परन्तु विडम्बना यह है कि धनवंतरी जयंती को बाजार ने बर्तन, आभूषण खरीदने की परम्परा बना दिया है और जो शेष बचे वे पूजन कर खोज व प्रयोग से बच जाते है। यही कारण है आज भगवान धनवंतरि के रहते हुए भी रोग-शोक से हारते रहते है।

(लेखक आयुर्वेद चिकित्सक, संयोजक सदस्य, वर्ल्ड आयुर्वेद कांग्रेस, संपादक-ईस्टर्न साइंटिस्ट शोध पत्रिका लेखक, विचारक हैं)

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