कोरोना जैसी महामारी का मानव सभ्यता पर गहरा प्रभाव

मानव सभ्यता और महामारियों का इतिहास-1

     

दुनिया में कोरोना जैसी महामारियाँ प्राचीन काल से आती रही है,जिससे लाखों लोग प्रभावित होते रहें है।महामारियों का मानव सभ्यता पर गहरा प्रभाव पड़ता है।वर्तमान में कोरोना काविड महामारी को समझने के लिए महामारियों का इतिहास पर नजर डालनी आवश्यक है। देवरिया से वैद्य   डॉ.आर.अचल .

डा आर अचल
डा आर अचल

ऐसा नहीं है कि विश्व मानव समुदाय पहली बार किसी महामारी का सामना कर रहा है।मानव सभ्यता आदिकाल सें ही कोरोना जैसी विभिन्न महामारियों का सामना करती आ रही है।इसलिए महामारियों का एक लम्बा इतिहास है।जब एक ही समय में किसी एक ही रोग से बहुत सारे लोग पीड़ित होने लगते है,या मृत्यु होने लगती है तो उसे महामारी कहा जाता है। सामान्यतः ऐसा एक क्षेत्र विशेष में होता है।इस स्थिति में इसे क्षेत्रीय महामारी (Endemic)कहा जाता है।जब इसका विस्तार एक बड़े क्षेत्र में हो जाता है तो इसे इपिडेमिक कहा जाता है।पूरे विश्व में प्रसार होने पर पेन्डेमिक कहलाता है।सामान्यतः इसकी शुरुआत किसी एक व्यक्ति या परिवार से होकर  समुदायिक स्तर पर फैल जाता है,जैसे-जैसे सम्पर्क का विस्तार होता है वैसे-वैसे रोग का विस्तार होता है।मानव सभ्यता के इतिहास में हैजा,चेचक और प्लेग सबसे पुरानी महामारियाँ मानी जाती है।

इनकी प्राचीनता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि लोकमानस में इन्हे देवता का स्थान प्राप्त है।प्राचीन साहित्य वेदों,पुराणों में भी हैजा व चेचक का उल्लेख मिलता है।हालाँकि वर्तमान में आधुनिक वैज्ञानिक विधियों से इन्हे नियंत्रित किया जा चुका है।प्रमाणिकरुप से महामारियों के इतिहास में ईसा पूर्व मौर्यकाल में दुर्भिक्ष का उल्लेख मिलता है जब हैजा,चेचक आदि कई बीमारियों नें महामारी का रुप धारण कर लिया था।जिन्हे आचार्य नागार्जुन ने धातु-खनिजों से औषधियों का निर्माण कर नियंत्रित किया था।

प्लेग से महाविनाश

इसके पश्चात वैश्विक रुप में प्लेग के महाविनाश का उल्लेख मिलता है।इसे भारत मे ताउन,तावनि तथा पश्चिम में ब्लैक डेथ कहा गया। यह रोग कितना पुराना है इसका अंदाज इससे किया जा सकता है कि एफीरस के ट्रॉजन युग का चिकित्सक रूफुस ने प्लेग के ब्यूबों का जिक्र करते हुए लिखा है कि ईसा पूर्व काल में 41 महामारियों के अभिलेख मिलते हैं।

ईसाकाल में सन् 1500 तक महामारियाँ का संख्या 109 हो गयी। 6वीं शताब्दी में पचास वर्षों तक यूरोप में इसका एक इसका तांडव चलता रहा।इसी काल में बलशाली सम्राट जस्टीन का रोम साम्राज्य ध्वस्त हो गया। समूचे रोमन साम्राज्य में प्लेग बदंरगाहों से आरंभ होकर दूरवर्ती नगरों की ओर फैला गया जिसका प्रभाव 7वीं शताब्दी में 664 से 680 तक बना रहा।

इसके बाद 7 सौ साल पूरी दुनियाँ मे कमोबेस प्लेग का प्रभाव बना रहा,परन्तु 14 वीं शताब्दी में विकराल रुप धारण कर लिया।जिसमें चीन के यिंग साम्राज्य का निगल लिया। इतिहासकारों के अनुसार इस काल में चीन की 90प्रतिशत आबादी मारी गयी थी।यूरोप और एशिया में इसकी मारकता ऐसी थी कि इसे ब्लैकडेथ कहा गया।

इस दौर में यूरोप के अनेक नगरों की दो तिहाई-तीन चौथाई आबादी मारी गयी।कहा जाता हैं, कि इस चक्र में यूरोप में ढाई करोड़ (अर्थात् कुल आबादी के चौथाई) व्यक्ति मारे गए।1664-65 में इतिहासप्रसिद्ध “ग्रेट प्लेग” का लंदन नगर पर आक्रमण हुआ। लंदन की आबादी साढ़े चार लाख थी, जिसमें से दो तिहाई लोग डरकर भाग गए और बचे लोगों में से 68,596 प्लेग का शिकार हो गए।

कहते हैं।सन् 1675 से 1684 तक उत्तरी अफ्रीका, तुर्की, पोलैंड, हंगरी, जर्मनी, आस्ट्रिया में प्लेग का एक नया दौर हुआ, जिसमें सन् 1675 में माल्टा में 11,000, सन् 1679 में विएना में 76,000 और सन् 1681 में प्राग में 83,000 लोगो की बलि ले लिया। इस चक्र की भीषणता की कल्पना इससे की जा सकती है कि 10,000 की आबादीवाले ड्रेस्डेन नगर में 4,397 नागरिक इसके शिकार हो गए।

इसके बाद सन् 1720 में प्लेग का एक ही साथ पूरी दुनियाँ में संक्रमण हुआ।जिसमे मार्सेई में 87,500 लोगो की जान गयी।इस समय तक प्लेग यह वैश्विक महामारी (Pandemics) बन चुका था। दुनियाँ के किसी न किसी कोने मे इसका छिटफुट आक्रमण होने लगा। सन् 1894 में हांगकांग में प्लेग का पुनः व्यापक संक्रमण हुआ,जो जापान, भारत, तुर्की होते हुए सन् 1896 में रूस जा पहुँचा, सन् 1898 में अरब, फारस, ऑस्ट्रिया, अफ्रीका, दक्षिणी अमरीका और हवाई द्वीप तथा सन् 1900 में इंग्लैंड, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में इसने तांडव मचा दिया।

सन् 1898 से 1918 तक भारत में प्लेग से एक करोड़ मारे गये।सन् 1833 से 1845 तक मिश्र में प्लेग का तांडव होता रहा।इस भयानक महामारी के प्रभाव में यूरोप में एक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ।आस्थावान लोग उभरते हुए ईसाई धर्म के शरण चले गये,दूसरा वर्ग नास्तिक होकर विज्ञान व अनुसंधान की ओर चल पड़ा। जिसके प्रभाव में मिश्र में प्लेग का पहली बार अध्ययन शुरु हुआ।जिसमें वैज्ञानिकों ने पाया कि वास्तव में जितना बताया जाता है यह प्लेग उतना मारक रोग नहीं है। प्लेग ने लम्बे समय तक अरब, मेसोपोटामिया, कुमाऊँ, हूनान (चीन) पूर्वी तथा मध्य अफ्रीका बना रहा। वैश्विक इतिहास में प्लेग राजनैतिक,वैचारिक परिवर्तनो का कारक बनता रहा।

प्लेग के बाद फ़्लू

प्लेग के पश्चात दुनियाँ की सबसे भयावह महामारी फ्लू को माना जाता है।जो श्वासनतंत्र को प्रभावित करने वाला प्राचीन एपिडेमिक रोग है।वर्तमान कोरोना कोविड-19 भी इसी का एक प्रकार है।ऐसे रोग पहले एक-दो लोगो से शुरु होते है।जिससे कुछ ही समय 2 से 20 प्रतिशत लोग संक्रमित हो जाते है।क्रमशः पूरी बस्ती-नगर-जनपद,देश,दुनियाँ अर्थात जहाँ तक संक्रमित लोगो का आवागमन-संपर्क होता है वहाँ तक फैलता जाता है।

कोविड – 19

वर्तमान में आवागमन के सहज संसाधनों की सुविधा के कारण कोरोना या कोविड-19 वैश्विक महामारी(Pandemic) बन गया है।सामान्यतः देखा गया है कि 20-30-50-100 वर्षो में कोई न कोई रोग एपिडेमिक या पेन्डेमिक जरूर हो जाता है।प्रमाणिक इतिहास अनुसार 1510ई.के बाद इन्फ्लूएंजा की गणना 30 विश्वव्यापी रोगो में किया जाता है,जो क्रमशः 1847, 1848, 1889-90, 1892, 1918, 1919,1957 में वैश्विक रुप में फैला था।प्रत्येक काल में इसके स्वरूप व लक्षण बदलते रहे है।विषाणु विज्ञान के विकास के बाद पता चला कि रोगकारक विषाणुओं(Virus) की संरचना में बदलाव के कारण लक्षणों में बदलाव होता रहा है।

सन् 1889 ई. में यह महामारी अपने लक्षणों में कुछ बदलाव के साथ तीन बार फैली थी ,जिसमें दूसरी बार सबसे भयानक रुप में मारक बन गयी।जिसमें शिशओं व वृद्धो की अधिक मृत्यु हुई थी।सामान्यतः इसके विषाणु शरीर में सुषुप्त होकर रह जाते है जो अनुकूल अवसर पाकर भयानक रुप धारण कर लेते है।सन् 1918ई में कुछ महीनों के अन्तर से तीन बार फैली थी।जिसमे दुनियाँ 50 करोड़ लोक संक्रमित हुए थे।इसबार 1.5 करोड़ लोगो का संहार हुआ था।इस काल में युवाओं की अधिक मृत्यु हुई थी।इसकी शुरुआत स्पेन से हुई थी, इस लिए इसे स्पेनिश फ्लू के नाम से जाना जाता है। सन् 1933ई. में सर एन्ड्रयू,स्मिथ व लेडलाव ने इसके वायरस की पहचान कर वायरस-ए नामकरण किया।आगे चलकर ए-1,ए-2 प्रकार के वायरस पहचाने गये।

फ़्लू का संक्रमण

सन् 1889,1918,1947ई. में ए-1 का संक्रमण हुआ था।परन्तु सन् 1957 व 1968ई. में फ्लू ए-2 का संक्रमण हुआ था।इस बार एशिया सबसे अधिक प्रभावित हुआ था।इसलिए इसे एशियन फ्लू भी कहा जाता है। 1940ई मे एक अन्य प्रकार के वायरस से अमेरिका प्रभावित हुआ था।सन् 1949 ई में सर टायलोर मे ‘जी’ वायरस का पता लगया था। सन् 1954ई में बी-1,बी-2 प्रकार के वायरस का पता चला।

इसका पता लगाने के लिए बिल्ली,चूहों,पक्षियों को प्रयोग का माध्यम बनाया गया।इसका आकार 100मिलीमाइक्रान मापा गया।ये वायरस खाँसने, छींकने, थूकने से प्रसारित होते है।ये विषाणु रक्त में प्रवेश नहीं करते है,इनका संक्रमण नाक,गले से लेकर फेंफड़ो तक ही होता है।फेफड़ो में पहुँच कर न्यूमोनियाँ में बदल कर मृत्युकारक बन जाते है।

सन् 1966ई. में यह हांगकांग से शुरु हुआ था,इसलिए इसका नाम हांगकांग फ्लू दिया गया था। सन् 1970ई.मे पूरे यूरोप महाद्वीप में उग्ररुप में फ्लू का आक्रमण हुआ था।इसके पश्चात स्थानीय रुप से कई बार फ्लू को विविध रुप को देखा गया।

2009 में स्वाईन फ्लू 12013 में बर्डफ्लू,2014 में ईबोला,2018 मे निपाह का संक्रमण हुआ।इसके पश्चात अब कोरोना कोविड-19 का संक्रमण हुआ है जिसकी मारकता अन्य की अपेक्षा कम होते हुए भी अधिक चिन्ता जनक स्थिति बन गयी है।जिसका कारण इससे निपटने का व्यावसायिक तौर-तरीका भी हो सकता है।

 डा आर अचल , सम्पादक-ईस्टर्न साइंटिस्ट जर्नल,संयोजक सदस्य-वर्ल्ड आयुर्वेद कांग्रेस

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