डेंगू का इतिहास और आयुर्वेदिक चिकित्सा

मादा मच्छरों से फैलने वाला वायरस जनित बुखार है डेंगू

डॉ. आर.अचल

डेंगू एडिस ईजिप्टाई प्रजाति के मादा मच्छरों से फैलने वाला एक वायरस जनित बुखार है, जो बरसात में मच्छरों की अधिकता के कारण तेजी से संक्रमित करता है, इसे आयुर्वेद में दण्डक ज्वर, अस्थिशूलक ज्वर कहा गया है। आम भाषा में इसे हड्डीतोड़ बुखार कहा गया है।

डेंगू एडिस ईजिप्टाई प्रजाति के मादा मच्छरों से फैलने वाला एक वायरस जनित बुखार है, जो बरसात में मच्छरों की अधिकता के कारण तेजी से लोगों में संक्रमित होता है, इसे आयुर्वेद में दण्डक ज्वर, अस्थिशूलक ज्वर कहा गया है। डेंगू को आम भाषा में हड्डी तोड़ बुखार भी कहते हैं। इसमें सिर तथा हड्डियों में टूटने जैसा तेज दर्द होता है।

डेंगू संक्रमण होने पर रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से गिरने लगती है। 5-7 दिनों में उचित चिकित्सा व्यवस्था न होने पर आंतरिक-वाह्य रक्त स्राव होने से रोगी गंभीर स्थिति में पहुँच जाते हैं, परन्तु शुरुआत में इसका संदेह होते ही शरीर का बल बनाये रखने तथा आयुर्वेदिक ज्वर चिकित्सा से आसानी से नियंत्रण किया जा सकता है।

पिछले कुछ सालों से बरसात के मौसम में डेंगू बुखार आतंक का पर्याय बना जाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में कोई सटीक ईलाज न होने के कारण, डेंगू का पता चलते ही लोग भयभीत हो जाते हैं, हालांकि अब आयुर्वेद के हर्बल दवाओं के सहयोग से आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में सफल प्रबंधन किया जाना संभव हुआ है।

इतिहास

वास्तव में डेंगू कोई नयी बीमारी नहीं है. इसके संक्रमण का इतिहास काफी पुराना है। ईसा पूर्व 265 से 420 के बीच चीनी चिकित्सकों द्वारा डेंगू के लक्षणों वाले रोग की पहचान का उल्लेख मिलता है।प्राचीन भारतीय आयुर्विज्ञान आयुर्वेद में भी डेंगू के लक्षणों वाले ज्वर का वातश्लेष्मिक ज्वर के रूप में वर्णन है. माधव निदान में इसे दण्डक व अस्थिशूलक ज्वर कहा गया है। परन्तु 1779-80 ई. में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा इसके लक्षणों की पहचान की कर, एशिया, अफ्रिका, उत्तरी अमेरिका में महामारी के रूप में देखा गया। सन् 1906-07 ई. में जॉन बर्टन क्लेलैंड तथा जोसेफ फ्रैंकलिन सिलर ने एक वायरस; विषाणु को डेंगू का कारण बताया।

इस बुखार को डेंगू क्यों कहा गया, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है, कुछ लोगों का मानना है कि स्पेनिश शब्द डींगा से डेंगू लिया गया है, जिसका तात्पर्य सावधान रहना है। अर्थात सावधान रहना ही इससे बचने का उपाय है। आयुर्वेद में इसे दण्डक नाम दिया गया जिसका अर्थ दण्डे से मारने जैसा दर्द होता है।
फिलहाल द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद डेंगू वैश्विक महामारी बन गयी। यूरोप अर्थात ठंडे प्रदेशों के अलावा पूरी दुनिया में डेंगू का प्रकोप होता रहता है। विश्वस्वास्थ्य संगठन के एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल दो करोड़ लोग डेंगू से संक्रमित होते हैं।

लक्षण

फिलहाल लक्षणों के आधार पर यह एक पुराना संक्रामक रोग है, जो पर्यावरणीय परिवर्तनों के साथ बदलता रहता है, अभी तक इसके तीन प्रकार के वायरसेज की पहचान की गयी है।

साधारण प्रकार में अचानक ठंड लगकर, तेज दर्द के साथ बुखार होता है। आँखों के पीछे तेज दर्द होता है, मुँह का स्वाद खराब लगता है, अधिक कमजोरी, मिचली का अनुभव होता है। गले में दर्द, थकान होती है। शरीर का तापक्रम 102 से 105 डिग्री होता है। तीसरे दिन त्वचा पर लाल दिदोरे, रेशेजद्ध होने लगते हैं, जो पूरे शरीर में फैल जाते हैं। यह 5.7 दिन में ठीक होता है।

दूसरे प्रकार में डेंगू के उपरोक्त सभी लक्षणों के साथ नाक, मुँह, शौच, या उल्टी में खून आने लगता है।त्वचा पर गहरे लाल या काले रंग​ के धब्बे पड़ने लगते हैं। इसे हेमरेजिक डेंगू, डीएचएफ; रक्तस्रावी दंडक ज्वर कहा जाता है। इस स्थिति में रक्त में प्लेटलेट्स तेजी से घट कर नीचे आ जाती है। रक्त पतला होकर, सूक्ष्म वाहिकाओं से बहने लगता है। यह एक खतरनाक स्थिति होती है।

तीसरे को शाक्ड सिंड्रोम डेंगू, डीएसएस कहते हैं। इसमें उपरोक्त दोनो स्थितियों के लक्षणों के साथ रोगी को बेचैनी या बेहोशी होने लगती है। ब्लडप्रेसर गिरने लगता है। इसमें रोगी के जान को खतरा होता है।
आयुर्वेद में इसके लक्षणों के अनुसार चिकित्सा व्यवस्था दी गयी है। हालांकि 1996 ई. में डेंगू दिल्ली सहित समूचे उत्तर भारत में महामारी बन गया था। चूँकि पहली बार अधिक लोगों में संक्रमण के कारण चिकित्सा व्यवस्था नहीं हो सकी थी, जिससे बहुत से लोग मारे गये परन्तु धीरे-धीरे अध्ययन और प्रयोग कर, इसका प्रबंधन किया जाना संभव हो गया है, जिससे इसकी भयावहता काफी कम हो चुकी है।

बचाव

डेंगू से बचने के लिए मच्छरों से बचा जाना चाहिए।डेंगू मच्छर दिन में समान्यतः हाथ या पैरों में काटते हैं। इससे खास सावधानी उस समय बरतनी चाहिए, जब आपके शहर या गाँव में किसी को डेंगू की पहचान हो गयी हो। इस समय मच्छरों के अनुकूल सभी स्थानों जैसे गढ्ढों, टायर, डिब्बों, गमलों, पानी की टंकी, कूलर आदि में मच्छर नाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।

चिकित्सा

जैसा कि सर्वविदित है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में वायरस; विषाणु के कारण होने वाले किसी भी रोग की कोई सटीक दवा नहीं होती है, क्योंकि वायरस को मारा नहीं जा सकता है। वायरस जनित रोगों का एक निश्चित संक्रमण काल होता है। इस काल में वायरस की प्रजजन दर बढ़ती रहती है। एक निश्चित समय बाद प्रजनन दर स्वतः रुक जाती है।

इसलिए ऐसे रोगों की चिकित्सा में शरीर को जीवित रखने का प्रबंधन किया जाता है। संक्रमण काल खत्म होने पर रोगी स्वतः ठीक होने लगता है। इस प्रकार कोरोना, चेचक आदि की तरह डेंगू में भी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिट) महत्वपूर्ण होती है।इसके लिए प्राथमिक लक्षण मिलने पर ही शरीर में लवण व जल की कमी नहीं होने देना चाहिए। नारियल का पानी, मठ्ठा, छाछ, दाल का पानी, ग्लूकोज, लेक्ट्राल, फलों का जूस देते रहना चाहिए।102 से अधिक तापक्रम होने पर शिर पर बर्फ या पानी की पट्टी देनी चाहिए। आयुर्वेद में पीपीते का पत्ते के स्वरस का उल्लेख तो नहीं है परन्तु इसका स्वरस भी प्रभावी पाया गया है।

आयुर्वेद चिकित्सा

जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में कहा गया है कि डेंगू के लक्षण, आयुर्वेद में वातश्लेमिक ज्वर के होते हैं।वर्तमान में आयुर्वेद चिकित्सालयों, चिकित्सकों द्वारा वातश्लेमिक ज्वर की चिकित्सा के माध्यम से सहजता से डेंगू का सफल उपचार किया जा रहा है।

दण्डक ज्वर अर्थात डेंगू के लक्षणों की पहचान होते ही रोगी को तरल पदार्थों जैसे नारियल का पानी, छाछ, फलों का रस, गिलोय, घृतकुमारी, एलोवेरा, स्वरस या जौ, चिरायता, दारुहरिद्रा, सुदर्शन का काढ़ा दिन में दो-तीन बार देना शुरू कर देना चाहिए।उल्टी या मिचली होने पर एक ग्राम छोटी इलाइची का चूर्ण देना चाहिए।

आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से मृत्युंजय रस, विषमज्वरांतकलौह, प्रवालपिष्टी, लक्ष्मी विलासरस नारदीय, गोदंतीभस्म, गिलोय सत्व, सुदर्शन कषाय या वटी लेने पर जल्द ही डेंगू के लक्षण नियंत्रित होने लगते हैं। प्लेटलेट्स का गिरना रुक जाता है।रक्तस्राव के लक्षण आने पर त्रिदोष चिकित्सा की जाती है। इस समय उपरोक्त दवाओं के साथ रक्तपित्तांतक लौह, कामदुग्धारस मोतीयुक्त, कहरवापिष्टी, बोलपर्टटी आदि दवायें तत्काल रुप से प्रभावी होती हैं। इसलिए डेंगू की पहचान होने पर घबराने के बजाय आयुर्वेद चिकित्सकों, आयुर्वेद संस्थानों से अवश्य परामर्श करना चाहिए।

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(लेखक आयुर्वेद चिकित्सक, संयोजक सदस्य, वर्ल्ड आयुर्वेद कांग्रेस, संपादक-ईस्टर्न साइंटिस्ट शोध पत्रिका लेखक, विचारक हैं)

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