पटाखों पर पाबंदी क्यों ज़रूरी?

दीपावली भारत का त्योहार है और पटाखों का निर्माण व चलन चीन से

वर्ल्ड पोल्यूशन लिस्ट और WHO के अनुसार भारत दुनिया का सबसे गंदा, गंदगी-सडांध से भरा प्रदूषित देश है. वहीं दुनिया में सबसे अधिक कुपोषित और अति प्रदूषित जल पीने वाला देश भी है.

दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषित दर्जनों शहर भी भारत में ही हैं. इस समय भारत भयंकर व विकराल रूप से प्रदूषण और कुपोषण का शिकार है.

पचास करोड़ से अधिक महिलाएँ लो इम्यूनिटीज़ से ग्रसित होते हुए भी यहां भारी संकट में हैं. स्वच्छ व साफ़ पानी व वायु के अभाव के चलते भी इस देश के वासी साफ़ साँसों तक के लिए तड़प रहे हैं.

प्रदूषण की ज़बरदस्त मार और उससे उत्पन्नज़हरीले हालातों से हो रही भयंकर बीमारियों से हर वर्ष भारत में प्रदूषण से बीस से तीस लाख तक लोग मर रहे हैं. इससे होने वाले कैंसर से तीस लाख लोग, कुपोषण से पचास लाख बच्चे मौत के मुँह में समा जाते हैं और करोड़ों लोग इसी तरह प्रदूषण के अन्य भयानक प्रभावों से ग्रसित हो नाना प्रकार की बीमारियों से तड़पते और जीवन मृत्यु के बीच झूलते रहते हैं.

साँस, दमा, फेफड़े, किडनी, टी०बी०, हृदयरोग से त्रस्त होने के साथ ही जीने वाले लोगों के प्राणों पर इस प्रदूषण का संकट ख़तरनाक रूप से मंडराता रहता है. पूरी दुनिया में साल भर में जितने पटाखे छोड़े जाते हैं, उससे कई गुणा यानि हज़ारों ही नहीं, लाखों टन पटाखे-बारूद दीपावली के दिनों में देश में फोड़े जाते हैं.

दुनिया के 250 से अधिक देशों में जितने लोग प्रदूषण के शिकार हैं, उससे कहीं अधिक लोग हमारे देश में एक ही दिन में पटाखों-बारूदों के अति ज़हरीले व विषैले धुओं, गैसों व नाना विकिरणों से बेमौत मरने को बाध्य किए जा रहे हैं. पटाखे हमारे जीवन, पर्यावरण, प्रकृति, सभी के लिए अति ख़तरनाक हैं. ये इंसान व मानवता लिए भी ख़तरा हैं और प्रकृति के लिए दैत्य से कम नहीं हैं.

पूरी दुनिया में लोग पटाखे, बारूद, ज़हरीली हवा, गैस, धुआं, पानी से बचने के लिए धीरे धीरे इस पर अब पूर्णतया प्रतिबंध की ओर बढ़ रहे हैं मग़र हमारे देश में तो हर वर्ष इसमें असाधारण रूप से इजफ़ा ही हो रहा है. हमारे देश में सबसे बड़ा, सबसे महत्वपूर्ण व सबसे बड़ा हिंदू त्योहार दीपावली ही है और इसे पूरी तरह से पटाखों के साथ जोड़ दिया है.

देश में जब जब पटाखों पर प्रतिबंध की माँग होती है तब तब कुछ संगठन व एक दो राजनीतिक पार्टियाँ इसके ख़िलाफ़ अंगद वाला पाँव रखकर और दीवार बनकर इन फ़ैसलों को उल्टाने के लिए हंगामा व कोहराम मचाकर फ़ैसला लेने वालों को धर्मद्रोही घोषित कर उसका जीना हराम कर देते हैं.

दो वर्ष पहले ही दिल्ली की केजरीवाल सरकार क़ो इसी चुनौती से गुजरना पड़ा मग़र यह जबाब देने को कोई तैयार नहीं है कि दीपावली का पटाखों से क्या नाता है?

दीपावली भारत का त्योहार है और पटाखों का निर्माण व चलन चीन से हुआ है. प्राचीन काल में पटाखे छोड़ने का क़ोई रिवाज ही नहीं था. न देश में पटाखे बनते थे, न छोड़े जाते थे. देश में पटाखों का चलन मुग़ल काल से हुआ. नव वर्ष के नाम पर अंग्रेजों ने इसे बढ़ाया. मग़र अब इस देश ने ऐसी मन, मानस और मानसिकता क्यों बना ली है कि पटाखों पर पाबंदी लगाना किसी धर्म विशेष पर भारी कुठाराघात है.

पटाखे हमारी साँसों व प्राणों के काल व यमराज हैं. पटाखों से करोड़ों करोड़ जीवों की हिंसा का घमासान व क़त्लेआम होता है. कई पर्यावरण संस्थान व प्रकृतिप्रेमी संगठन कई वर्षों से पटाखों का बहिष्कार करने व उस पर कड़े से अति कड़े प्रतिबंध की माँग करते आ रहे हैं.

देश में प्रदूषण के चलते चहुँ ओर ऐसे विषम हालत हो गये हैं कि सर्वोच्च न्यायालय, नेशनल ग्रीन ट्रिबुनल व पोलुशन कंट्रोल बोर्ड एक साथ एक स्वर से निकल बाहर आए और कहा कि इस दिवाली चाहे कुछ भी हो मग़र पटाखे नहीं छोड़े जाएँगे.

जो शहर प्रदूषित, वहाँ पूर्ण प्रतिबंध, जहाँ प्रदूषण कम वहाँ सिर्फ़ ग्रीन पटाखे ही छोड़े जा सकेंगे. अब हमें समझना होगा कि हमने ये शख़्तकदम नहीं उठाए तो पूरा देश व उसकी हवा ज़हरीली हो जाएगी. पूरा देश गैस चेम्बर ही बन जाएगा. लाखों टन पटाखों का धुआं, गैस, विस्फोटक क़िरणें, करोड़ों करोड़ जीवों का घमासान अन्य जिंदगियों पर घातक होगा. इसीलिए अब काल व समय क़ी पुकार है कि विषमता से भरे हालातों के अनुसार मानवता, इंसानियत, प्रकृति, पर्यावरण, जीवों व प्राणियों के प्राणों व साँसों को बचाने के लिए पटाखों का सर्वतया त्याग, तिलांजली और सम्पूर्ण बहिष्कार ज़रूरी व परम आवश्यक है.

(सोहन मेहता, जोधपुर की कलम से.)

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