भाजपा की चुनौतियां

पिछले साल कृषि सुधार अध्यादेशों के प्रारूप को मंत्रिमंडल की बैठक में समर्थन देने के बावजूद संसद में कानून बनने के बाद अकाली दल ने भाजपा नीत गठबंधन से नाता तोड़ लिया।

गत वर्षों में कर्नाटक और महाराष्ट्र में बिना बहुमत सुनिश्चित किए सरकार बनाने व तुरंत बाद त्यागपत्र देने के प्रकरणों ने भाजपा की a party with difference की बहुप्रचारित छवि को क्षति पहुंचाई है। दोनों मौकों पर भाजपा के लिए जनमानस में अपने लिए सहानुभूति जुटाने का अवसर था जिसे अकारण गंवा दिया गया। कर्नाटक में आपसी अंतर्विरोध के कारण जद-एस नीत सरकार गिरने पर भाजपा को सरकार बनाने का पुनः अवसर मिला। महाराष्ट्र में यदि भाजपा शांत भाव से विपक्ष में बैठती, तो सत्ता में वापसी के आसार बन सकते थे। अभी भी इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार पिछले साल कृषि सुधार अध्यादेशों के प्रारूप को मंत्रिमंडल की बैठक में समर्थन देने के बावजूद संसद में कानून बनने के बाद अकाली दल ने भाजपा नीत गठबंधन से नाता तोड़ लिया।

उप्र सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव निकट हैं। पिछले विधानसभा सभा चुनावों में सहयोगी रही सुहेलदेव राजभर पार्टी भाजपा से काफी पहले संबंध तोड़ चुकी है और कई दलों से गठबंधन की बातचीत के बाद शायद स पा से बात बनती नजर आ रही है।

पिछले कुछ सालों में भाजपा के कई सहयोगी दल उससे अलग हो चुके हैं, जिनमें सबसे पुराने सहयोगी अकाली दल व महाराष्ट्र में शिव सेना के अलावा आंध्र प्रदेश में तेलगू देशम पार्टी,बिहार में चिराग पासवान वाली लोक जनशक्ति पार्टी, उड़ीसा में बीजू जनता दल, आदि प्रमुख हैं। यहां उल्लेखनीय है कि वाजपेयी जी के जमाने में राजग 32 छोटे-बड़े दलों का महागठबंधन हुआ करता था।
उल्लेखनीय यह भी है कि तेलगू देशम पार्टी दो बार चुनाव जीत कर सत्ता में आई है और दोनों ही अवसरों पर वह भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल थी। इसी प्रकार उ प्र में रालोद को भी लोकसभा व विधानसभा में सबसे ज्यादा सीटें भाजपा के साथ गठबंधन करने पर ही मिली हैं। ओमप्रकाश राजभर तो पहली बार भाजपा के समर्थन से ही विधायक बन सके हैं।

फिलहाल आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा का अनुप्रिया पटेल और संजय निषाद के दलों के साथ गठबंधन लगभग पक्का है तथा कुछ अन्य छोटे दल भी साथ आ सकते हैं। फिलहाल भाजपा का जोर दूसरे दलों से गठबंधन के बजाय अन्य दलों के महत्वपूर्ण नेताओं को शामिल कराने पर ज्यादा है।

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लेकिन नीतिगत तौर पर भाजपा को यह तय करना ही पड़ेगा कि किन दलों व नेताओं को साथ लेना है और किन्हें नहीं ताकि बाद में अप्रिय स्थिति न उत्पन्न हो।अतीत में बसपा से निष्कासित एनआरएचएम घोटाला के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा और हाल ही में अयोध्या जिले के एक बाहुबली को पार्टी मे शामिल कराने के बाद फजीहत होने पर निकाल देने के प्रकरणों से पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठे हैं।

यद्यपि विभिन्न चुनाव पूर्व आकलन, मीडिया और सोशल मीडिया के स्रोत उप्र के आगामी विधानसभा चुनाव में योगी आदित्य नाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने की संभावना प्रकट कर रहें लेकिन जिस तरह छोटे दल सपा से गठबंधन करने के लिए लालायित हैं, उससे स्पष्ट है कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में योगी जी को कड़ी चुनौती मिलने जा रही है।

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