Depression अवसाद में आयुर्वेद चिकित्सा कितनी कारगर!

चंद्र प्रकाश झा
चंद्र प्रकाश झावरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

उत्तर आधुनिक समाज में और खास कर दुनिया भर में पसरी कोरोना कोविड महामारी के मौजूदा हालात में लोगों का अवसादग्रस्त Depressed होना असामान्य नहीं है.लेकिन इसके बारे में भारत जैसे देश में पर्याप्त जागरूकता नहीं है. लोग उत्तरोत्तर जटिल होते जीवन में कैसे अवसाद Depression से घिर जाते हैं, उन्हें खुद पता ही नहीं चलता. अवसाद ,मनोदैहिक विकार माना जाता है. संयुक्त राष्ट्र के विश्व स्वास्थ्य संगठन आदि के आंकड़ों के हवाले से कुछ विश्लेषकों का दावा है इस महामारी के पहले भारत में अनुमानित 5 से 10 करोड़ लोग अवसाद से ग्रस्त थे.

इस महामारी के हमारे बीच एक बरस से अधिक के अर्से में यह संख्या निश्चय ही घटी नहीं होगी बल्कि कई गुणा ज्यादा बढ़ी ही होगी. लेकिन इस बारे में प्रामाणिक आंकड़े तत्काल उपलब्ध नहीं हैं. फिर भी माना जा सकता है कि इस दौर में कोई भी व्यक्ति बहुत ज्यादा समय पूर्ण रूप से सामान्य मनःस्थिति में नहीं रह सकता है.

भारत , एंटीडिप्रेसेंट Anti-dpresent यानि अवसाद दूर करने वाली दवाओं का दुनिया के बड़े बाजार में शामिल है.भारत में इन दवाओं की खपत पिछले दो दशक में तेजी से बढ़ी है.फार्मास्युटिकल मार्केट रिसर्च संगठन के अनुसार 2001 में इसका बाजार 136 करोड़ रुपए था. अब यह औसतन 12 फीसद वार्षिक वृद्धि के साथ 855 करोड़ रुपए का हो गया है.लेकिन भारत में सुप्रशिक्षित मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों की बहुत कमी है.

भारत , एंटीडिप्रेसेंट Anti-dpresent यानि अवसाद दूर करने वाली दवाओं का दुनिया के बड़े बाजार में शामिल है.भारत में इन दवाओं की खपत पिछले दो दशक में तेजी से बढ़ी है.फार्मास्युटिकल मार्केट रिसर्च संगठन के अनुसार 2001 में इसका बाजार 136 करोड़ रुपए था. अब यह औसतन 12 फीसद वार्षिक वृद्धि के साथ 855 करोड़ रुपए का हो गया है.लेकिन भारत में सुप्रशिक्षित मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों की बहुत कमी है.


माना जाता है कि जो लोग लंबे समय से एंटीडिप्रेसेंट दवाएं ले रहे हैं, ये दवाएं उनके तंत्रिका तंत्र को शिथिल कर देती हैं. चिंता से बचने के लिए ली गई दवा जिंदगी को और भी कष्टकारी बना सकती हैं. साइकोथेरेपी एंड साइकोमैटिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध रिपोर्ट के अनुसार ऐसी दवाओं का सेवन करने वालों में अन्य व्याधियों की संभावना बढ़ जाती है. जो व्यक्ति अवसाद से ग्रसित रहता है, उनमें आत्महत्या करने तथा हृदयाघात और पक्षाघात होने की आशंका काफी रहती है.अचानक बहुत खुश या दुखी होना भी मानसिक बीमारी कही जाती है.

सेरोटोनिन के प्रभाव


वैज्ञानिक तथ्य है कि मस्तिष्क में सेरोटोनिन के प्रभाव से *मूड * बनता-बिगड़ता है.अवसाद से बचने के लिए सामान्य रूप से ऐसी दवा ली जाती है, जो न्यूरॉन के माध्यम से सेरोटोनिन को अवशोषित कर अवसाद के प्रभाव को रोक देती है. आम लोगों को जानकारी नहीं है कि सेरोटोनिन हमारे शरीर के प्रमुख अंग जैसे,  हृदय, फेफड़े, गुर्दे और यकृत में खून को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अवसाद से बचने के लिए ली गई दवा इन अंगों में सेरोटोनिन के अवशोषण को रोक देती है. इस कारण इन अंगों के कार्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।


सभी लोग कभी न कभी थोड़े समय के लिए नाख़ुश होते हैं. मगर अवसाद उससे कहीं ज़्यादा गहरा, लंबा और दुखद होता है. इसकी वजह से लोगों की ज़िंदगी से रुचि ख़त्म होने लगती है.उनका रोज़मर्रा के कामकाज से मन उचट जाता है. 
मगर अवसाद क्या है अभी तक स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा सका है. अवसाद किस वजह से होता है यह भी अंतिम तौर पर नहीं कहा जा सकता है. माना जाता है कि इसमें कई चीज़ों की अहम भूमिका होती है. ज़िंदग़ी के कई अहम पड़ाव जैसे-किसी नज़दीक़ी की मौत , नौकरी नहीं मिलना या खत्म हो जाना  , वैवाहिक सम्बंध नहीं होना या टूट जाना  आम तौर पर अवसाद के कारण बनते हैं. अगर मन में हर समय कुछ बुरा होने की आशंका रहती है तो अवसाद ग्रस्त हो जाने का ख़तरा रहता है. इस स्थिति में व्यक्ति सोचता रहता है कि वह हर चीज़ में विफल है. कुछेक मेडिकल कारणों से भी अवसाद होता है. इनमें शरीर में थायरॉयड की सक्रियता में कमी भी है. कुछ दवाओं के साइड इफ़ेक्ट्स से भी अवसाद हो सकता है. इनमें ब्लड प्रेशर कम करने के लिए इस्तेमाल की जाने  वाली कुछ दवाएँ शामिल हैं.

नकारात्मक सोच घेर लेती है


साफ है कि अवसाद की अवस्था सामान्य उदासी से अलग होती है.अवसाद ग्रस्त व्यक्ति को नकारात्मक सोच घेर लेती है. उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता है.किसी बात से कोई खुशी न हो , गम तक का भी अहसास न हो ये सब अवसाद के लक्ष्ण हैं.हर वक़्त नकारात्मक सोच होना, नींद न आना या बहुत नींद आना, रात को दो-तीन बजे नींद का खुलना आदि दो सप्ताह से अधिक चले तो वे अवसाद की निशानी है. अवसाद बिन किसी निश्चित कारण के भी हो सकता है. ये धीरे-धीरे व्यक्ति को घेर लेता है.इस बात पर आम सहमति  है कि अवसाद सिर्फ़ दिमाग़ में किसी तरह के असंतुलन की वजह से ही नहीं होता.अवसाद किसी को भी हो सकता है. इसके पीछे कोई आनुवांशिक वजह भी हो सकती है.लोग जब चुनौती से घिर जाते हैं तो उनके अवसादग्रस्त हो जाने की आशंका बढ जाती है. जिनके परिवार में अवसाद का इतिहास रहा हो उनके  अवसाद ग्रस्त होने की आशंका ज़्यादा होती है. कुछ आनुवांशिकीय कारणों से भी अवसाद हो सकता है.लोगो के दिमाग़ में रसायन जिस तरह काम करता है उसे एंटी-डिप्रेसेंट्स प्रभावित करता है. मगर इन रसायनों की अवसाद में क्या भूमिका होती है ये पूरी तरह समझी नहीं जा सकी है.

एंटी-डिप्रेसेंट्स


एंटी-डिप्रेसेंट्स सबके लिए काम नहीं करते हैं.दिमाग़ में न्यूरोट्रांसमिटर जिस तरह काम करते हैं उसका संतुलन भी अवसाद के चलते बिगड़ जाता है. ये रासायनिक संदेशवाहक होते हैं जो कि न्यूरॉन्स यानी दिमाग़ की कोशिकाओं के बीच संपर्क क़ायम करते हैं. नींद को नियमित रखना , अच्छा खाना , समय पर खाना, ऐसा विचार रखना कि इसे कैसे कम रखना है , महत्वाकांक्षा को उतना ही रखना जितना हासिल करना संभव हो , परिवार के साथ जुड़े रहना,  अपने कार्य में व्यस्त और मस्त रहना वे उपाय हैं जिनसे अवसाद कम होता है.
शरीर में न्यूरोट्रांसमिटर जो संदेश भेजते हैं उन्हें अगले न्यूरॉन में लगे रेसेप्टर ग्रहण करते हैं.कुछ रेसेप्टर किसी ख़ास न्यूरोट्रांसमिटर के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो सकते हैं या फिर असंवेदनशील हो सकते हैं. एंटी-डिप्रेसेंट्स, मूड बदलने वाले न्यूरोट्रांसमिटर्स का स्तर धीरे-धीरे करके बढ़ाते हैं.सेरोटॉनिन, नॉरपाइनफ़्राइन और डोपामाइन जैसे न्यूरोट्रांसमिटर्स इसमें शामिल हैं.यही वजह है कि अधिकतर लोगों को ये दवाएँ कुछ हफ़्तों तक लेनी पड़ती हैं और उसके बाद ही इसका असर दिखना शुरू होता है.

अवसाद में निराशा घेर लेती है

एंटी डिप्रेसेंट दवाएँ सबसे पहले 1950 में बनी थीं. कुल चार तरह के एंटी-डिप्रेसेंट्स हैं.ये रसायन मस्तिष्क को कुछ अलग तरीक़ों से प्रभावित करते हैं.आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला एंटी-डिप्रेसेंट सेरोटॉनिन का स्तर दिमाग़ में बढ़ा देता है.इसके अलावा सेरोटॉनिन और नॉरएड्रीनेलिन रीअपटेक इनहिबिटर्स नए एंटी-डिप्रेसेंट हैं जो नॉरपाइनफ़्राइन को निशाना बनाते हैं. ट्राइसाइक्लिक एंटीडिप्रेसेंट्स और मोनोएमाइन-ऑक्सिडेज़ इनहिबिटर्स पुराने एंटी डिप्रेसेंट्स हैं जो आम तौर पर इस्तेमाल नहीं किये जाते हैं क्योंकि उनमें साइट इफ़ेक्ट्स भी होते हैं. एंटी डिप्रेसेंट्स अवसाद के कुछ लक्षणों में तो आराम पहुँचाते हैं मगर वे उसकी मूल वजह पर असर नहीं करते.यही वजह है कि ये बाक़ी उपचारों के साथ इस्तेमाल होते हैं अकेले नहीं.

आयुर्वेद में मानसिक रोग


आयुर्वेद में अवसाद को मानसिक रोग की श्रेणी में रखा जाता है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं.जैसे बहुत अधिक तनाव, लंबे समय तक कोई रोग, कमजोरी, बहुत अधिक दवाओं का सेवन, वात दोष , मस्तिष्क एवं नर्वस सिस्टम की कार्यप्रणाली ,आदि। आयुर्वेद में अवसाद से उपचार तीन बातों को ध्यान में रखकर किया जाता है। 


अवसादग्रस्त व्यक्ति को उसकी शक्ति व क्षमताओं का बोध कराना, दूसरी- व्यक्ति जो देख या समझ रहा है वह असलियत में भी वही है या नहीं इसका बोध कराना और उसकी स्मृति को मजबूत बनाना जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़े और अवसाद दूर हटे. आयुर्वेद में अवसाद से उपचार के लिए कुछ औषधियों और ब्रेन टॉनिक्स को किसी चिकित्सक के परामर्श से लिया जाए तो कम समय में इसे दूर करना संभव है.ब्राह्मी, मंडूक पुष्पि, स्वर्ण भस्म आदि से मस्तिष्क को बल मिलता है और मन को शांति. इनका उपयोग अवसाद के उपचार में किया जाता है। खानपान में भी बदलाव करने पर बल दिया जाता है. रोगी को हल्का और सुपाच्य भोजन खाने चाहिए. खट्टी चीजों से परहेज जरूरी है. मांसाहार नहीं करने की सलाह दी जाती है।

शिरोधारा


आयुर्वेद में अवसाद से छुटकारे के लिए प्रभावी उपचार संभव है. उनमें एक शिरोधारा है जो करीब 5,000 वर्ष पुरानी आरोग्य विधि है. शिरो का अर्थ है सिर और धारा का अर्थ है प्रवाह. विश्रांति की इस प्रक्रिया में व्यक्ति के सिर की त्वचा तथा मस्तिष्क पर गुनगुने औषधीय तेल की एक पतली सी धार प्रवाहित की जाती है, जिसके फलस्वरूप तनाव शैथिल्य होता है और शांति मिलती है. यह व्यक्ति के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को सुधारती है. इसका प्रयोग आँखों के रोग, सायनासाइटिस और स्मृति लोप आदि की परिस्थितियों में किया जा सकता है. 

आयुर्वेद के अनुसार, वात एवं पित्त के असंतुलन से पीड़ित व्यक्तियों के लिए शिरोधारा लाभदायक है. जब वात असंतुलित होता है तो व्यक्ति में भय, असुरक्षा की भावना, चिंता या पलायनवादी विचार जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. जब पित्त असंतुलित होता है तो व्यक्ति में क्रोध, चिड़चिड़ाहट, कुण्ठा और गलत निर्णय लेना आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं. शिरोधारा में प्रयोग किए जाने वाले तरल पदार्थ की विधि तथा गुण, मनुष्य के शरीर के दोषों को संतुलित करते हैं. शिरोधारा का द्रव व्यक्ति के मस्तिष्क, सिर की त्वचा तथा तंत्रिका तंत्र को आराम तथा पोषण प्रदान करता है तथा दोषों को संतुलित करता है.


शिरोधारा के दौरान, मस्तक पर गिरने वाले तेल की धार से एक निश्चित मात्रा में दवाब एवं कंपन पैदा होता है.अग्र अस्थि में उपस्थित खोखले सायनस से यह कंपन और अधिक तीव्र हो जाता है.इसके पश्चात प्रमस्तिष्क मेरु द्रव के तरल माध्यम से यह कंपन भीतर की ओर संचारित हो जाते हैं.यह कंपन थोड़े से तापमान के साथ थेलेमस तथा प्रमस्तिष्क के अग्रभाग को सक्रिय करता है जिससे सेरोटोनिन तथा केथेकोलामाइन की मात्रा सामान्य स्तर पर आ जाती है. लंबे समय तक सतत रूप से औषधीय द्रव डालने से पड़ने वाला दवाब मन को शांति प्रदान करता है।

इसके लिए एक ऐसा बर्तन लिया जाता है जिसके तल में छेद हो.इस छेद को एक बाती से बंद किया जाता है.इस बर्तन को उस व्यक्ति के मस्तक के ऊपर लटकाया जाता है जो उपचार शैया पर लेटा हुआ हो.  औषधीय तेल या औषधीय दूध के रूप में औषधीय द्रव को बर्तन में भरा जाता है.इसके पश्चात इस द्रव को व्यक्ति के मस्तिष्क पर धार के साथ डाला जाता है.  रोगी की आँखों में तेल न जाए इसके लिए उसके सिर तौलिया बाँध दिया जाता है.यह उपचार एक दिन में लगभग 45 मिनट तक दिया जाता है.इस चिकित्सा से व्यक्ति की तंत्रिकाओं को आराम मिलता है, व्यक्ति की कुण्ठित भावनाएँ बाहर आती हैं, मस्तिष्क शुद्ध होता है, थकान मिटती है, चिंता, अनिद्रा, पुराने सिरदर्द, घबराहट आदि से मुक्ति मिलती है. तंत्रिका तंत्र को स्थायित्व देता है. अनिद्रा दूर करता है. माइग्रेन के कारण होने वाले सिरदर्द में आराम पहुँचाता है. मानसिक एकाग्रचित्तता बढ़ाता है.उच्च रक्तचाप कम करता है.थकान कम करता है.तनाव कम करता है।

पंचकर्म


पंचकर्म से भी अवसाद के उपचार में सहायता मिलती है. शिरोधारा, शिरोबस्ती, शिरो अभ्यंग और नस्य जैसे पंचकर्म अवसाद से मुक्ति दिलाने में मददगार हैं.लेकिन इन्हें किसी प्रशिक्षित विशेषज्ञ के परामर्श से करना ही ठीक माना जाता है.अवसाद से निजात के लिए आयुर्वेद में मसाज थेरेपी का भी सहारा लेते हैं. चंदनबला, लाच्छादि तेल , ब्राह्मि तेल, अश्वगंधा, बला तेल आदि से मसाज की सलाह दी जाती है जो तनाव दूर करते हैं और अवसाद से मुक्ति दिलाते हैं.


 डिप्रेशन से निपटने में मसालेदार भोजन और जंक फूड से परहेज रखने की सलाह दी जाती है. ऐसी डाइट जिसमें कार्बोहाइड्रेट के साथ प्रोटीन और मिनरल भी भरपूर हों मददगार होती है. ओट्स, गेहूं आदि अनाज, अंडे, दूध-दही, पनीर, बीन्स, पालक, मटर, मेथी आदि हरी सब्जियां और मौसमी फल, एंटी-ऑक्सिडेंट और विटामिन-सी वाली चीजें, जैसे कि ब्रोकली, सीताफल, पालक, अखरोट, किशमिश, शकरकंद, जामुन, ब्लूबेरी, कीवी, संतरा,  फ्लैक्ससीड्स (अलसी के बीज), नट्स, कनोला, सोयाबीन आदि मददगार मानी जाती है.

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