संतों की शरण में जीवन ग्रंथ पढ़ने का अवसर

गीता प्रवचन चौथा अध्याय

संत विनोबा गीता पर प्रवचन करते हुए कहते हैं कि अंग्रेजी में हर साल कोई दस हजार नयी किताबें तैयार होती है| यही हाल दूसरी भाषाओं का है| ज्ञान का इतना प्रसार होते हुए भी मनुष्य का दिमाग अब तक खोखला ही कैसे बना हुआ है? कोई कहता है, स्मरणशक्ति कमजोर हो गयी है| कोई कहता है, एकाग्रता नहीं सधती| कोई कहता है, जो भी पढ़ते है सच ही मालूम होता है| कोई कहता है, अजी, विचार करने को फुरसत ही नहीं मिलती!

श्रीकृष्ण कहते है –“ अर्जुन, बहुत कुछ सुन-सुनकर चक्कर में पड़ी तेरी बुद्धि जबतक स्थिर नहीं होगी, तबतक तुझे योगप्राप्ति नहीं हो सकती| सुनना और पढ़ना अब बंद करके संतों की शरण ले| वहाँ जीवन-ग्रंथ पढ़ने को मिलेगा| वहाँ का ‘मौन व्याख्यान’ सुनकर तू ‘छिन्न-संशय’ हो जायेगा| वहाँ जाने से तुझे मालूम हो जायेगा कि लगातार सेवा-कर्म करते हुए भी हम अत्यंत शांत कैसे रहें; और बाहर से कर्म का जोर रहते हुए भी हृदय में अखंड की सितार कैसे बजती रहे|”

*क्रमश*:

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