अफ़ग़ानिस्तान: फ़िर ज़ोर, ज़बरदस्ती, ज़ुल्म का राज!

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

अफ़गानिस्तान में जो कुछ हो रहा है उससे पूरी दुनिया स्तब्ध है। हालाँकि ताज़ा सूचनाओं के अनुसार उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने कहा है कि वे क़ाबुल में हैं, देश के वैध कार्यवाहक राष्ट्रपति हैं और अपने नागरिकों तथा देश की रक्षा करेंगे लेकिन सभी जानते हैं कि यह सब कैसे होगा? राष्ट्रपति रहे अशरफ़ गनी रविवार को ही देश से भाग चुके हैं और अब ख़बर है कि वे ओमान पहुँच गये हैं। इससे अधिकतर अफ़गानी नागरिकों में ज़बरदस्त खौफ है।

देश में अब भी रह रहे हज़ारों विदेशी नागरिकों समेत शान्तिप्रिय अफ़गानी सुरक्षा के प्रति चिन्तित होकर इधर-उधर भाग रहे हैं। उन्हें तालिबान की बर्बरता का भय सता रहा है जो क़ाबुल को कब्ज़ाने के बाद अब अपनी हुकूमत की औपचारिक घोषणा करने के दौर में है। ख़बरें तो यहाँ तक हैं कि उसकी अमरुल्लाह सालेह के साथ प्रारम्भिक बातचीत भी हो चुकी है। ऐसे में सालेह का कथन अपनी बचत के उपाय के रूप में देखा जा रहा है।


संसार के विभिन्न देशों में अन्दरूनी हालात कैसे भी हों, अब सर्वत्र लोकतंत्र का ही डङ्का है। 240 देशों में बँटे विश्व में स्वाधीन माने जाने वाले देशों की तादाद महज़ 195 है। इनमें से केवल 56 देशों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पूरी तरह से पालन किया जाता है। फ़िर भी लोकतंत्र की क़द्र विश्वव्यापी है। भले ही विश्व सङ्गठन (संयुक्त राष्ट्र) से जुड़े कोई डेढ़ दर्ज़न (18) देश ग़रीबी और दूसरे कारणों से या तो गृहयुद्ध की चपेट में हैं, अथवा आन्तरिक लड़ाई जैसी गम्भीर स्थिति से जूझ रहे हैं। इनमें पड़ोसी पाकिस्तान, म्यांमार, सीरिया, लीबिया, इराक़, यमन और कोलम्बियाई सङ्घर्ष प्रमुख हैं। बावज़ूद इसके, अन्य देशों के आन्तरिक सङ्घर्षों ने अपनी तरफ़ कभी दुनिया का बहुत ध्यान नहीं खींचा।


गृहयुद्ध या आन्तरिक असन्तोष वाले देशों के विपरीत अफ़गानिस्तान से निकल रही ख़बरों ने न केवल अफ़गानियों तथा वहाँ रह रहे विदेशियों बल्कि दुनिया में अमनपसन्द लोगों को भी एक अनकही आशंका से ग्रस्त कर दिया है। इनमें कम से कम 1,000 (एक हज़ार) हिन्दू हैं। वहाँ आतंकवादियों का सबसे सशक्त समूह समझे जाने वाले तालिबान ने सत्ता लगभग कब्ज़ा ली है। कई देशों ने तो तालिबान को मान्यता तक का ऐलान कर दिया है और अमेरिका ने भी कुछ ऐसे ही सङ्केत दिये हैं। अलबत्ता इस्लामी जगत अफ़गान की हालत पर मौन साधे है। यह अवश्य है कि कई स्तरों पर इसे ‘रक्तहीन सत्ता हस्तान्तरण’ कहते/बताते हुए तालिबान की पीठ थपथपायी जा रही है।

तालिबान की हुकूमत आ धमकने से सारे अफ़गानी, ख़ासकर महिलाएँ बेहद डरी हुई हैं। उनकी आँखों में 20 साल से पहले की तस्वीरें बार-बार और लगातार घूम रही हैं। जब इस्लामी शरिया की कथित रोशनी में रोज़ाना ज़ोर, ज़बरदस्ती और ज़ुल्म होते थे। अभी तालिबान ने अपनी सत्ता पूरी तरह स्थापित हो जाने के बाद महिलाओं को पढ़ाई और नौकरी जैसी कुछ छूट देने की बात कही है लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि उन्हें सर से लेकर पैर तक शरीर को ढँककर ही रहना होगा!
पाकिस्तान के तीन-चौथाई भाग (6,61,434 वर्ग किमी) से भी छोटे अफ़गानिस्तान (क्षेत्रफल 6,52,860 वर्ग किमी) की आबादी (2019 की गणना के अनुसार) क़रीब 3,80,0000 (तीन करोड़, 80 लाख) है। इनमें एक करोड़, 70 लाख से अधिक महिलाएँ हैं। अफ़गानिस्तान में 2001 के पहले भी तालिबानी राज हुआ करता था।

“9/11” के बर्बर हमले के बाद अलक़ायदा की सफाई के नाम पर अफ़गानिस्तान पहुँचे अमेरिका के प्रयासों से बाद में वहाँ लोकतांत्रिक सत्ता स्थापित हुई और बहुत से आतंकवादियों के बाद 2011 में ओसामा बिन लादेन को मार गिराने के बाद भी अमेरिका क़रीब दो दशक तक क़ाबुल समेत अफ़गानिस्तान के विभिन्न शहरों में फौज़ी डेरा जमाये रहा। पर तालिबान को परास्त या, पस्त कर पाने में बुरी तरह विफल रहा। अब उसने यह कहते हुए अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया है कि जब अफ़गानी सैनिक ही तैयार नहीं तो अमेरिका उनका युद्ध क्यों लड़े। कूटनयिक क्षेत्रों में इसे मुँहजोरी कहा जा रहा है।
उल्लेख्य है कि 20 वर्ष पूर्व पहली बार अमेरिकी फ़ौजों के कन्धार में उतरने के बाद से अमेरिका ने आतंकवादियों तथा तालिबानियों से लड़ाई में अपने 2,500 से ज़ियादा सैनिक खोये। हालाँकि अमेरिकी विदेश मंत्रालय यह संख्या सिर्फ़ 2,300 ही बताता है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार अक्टूबर 2001 से सितम्बर 2019 तक ही 778 अरब डॉलर ख़र्च हुए। कुछ सूत्रों ने 6 लाख, 60 हज़ार करोड़ से अधिक बताया है। दिसम्बर 2020 तक अफ़गानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 4,000 रह गयी थी। उल्लेख्य है कि अफ़गानिस्तान की अनुपस्थिति में 2019 के हुए ‘दोहा करार’ में ही तय हुआ था कि 14 महीनों के बाद के बाद ही अमेरिका और ‘नाटो’ की फ़ौजें लौट जाएँगी। यह अवधि 31 मई तक पूरी हो रही थी। उसे बाद में कम मानते हुए अवधि को बढ़ाया गया ताकि इसे “9/11” की घटना से जोड़ा जा सके। दोहा करार को रूस, चीन और अरब जगत का समर्थन था।
अमेरिकी फ़ौजों की वापसी से बनी स्थिति और लोगों को भी समस्या होगी लेकिन अफ़गानिस्तान के ताज़ा हालात भारत के लिए सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। इसकी वज़ह नज़दीकी दुश्मन का रवैया, आतंकवाद बढ़ने के ख़तरे और चीन और ईरान भी हैं। आतंकवाद विश्वव्यापी समस्या है। इसकी चपेट में अनेक बड़े-छोटे देश आये या, आते रहे हैं। लेकिन आतंकवाद को लेकर सभी देश अपने अलग नज़रिये के चलते विभाजित हैं।

पिछले कुछ दशकों से भारत सहित अनेक देश आतंकवाद के बुरी तरह से शिकार रहे अथवा, इससे लड़ रहे हैं। परन्तु पिछले कुछ महीनों में अफ़गानिस्तान में जो बुरे हालात उभरे, उसके अमली तरीक़े ने पूरी दुनिया को चौंकाया है। यद्यपि इसकी परिस्थिति तभी पैदा होने लगी थी जब अफ़गानियों को ढर्रे पर न आता देख उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सितम्बर, 2018 में ही तालिबानी प्रतिनिधियों से बातचीत एकदम से बन्द करने और एक निश्चित समयावधि में अपनी सेना वहाँ से लौटा लेने का ऐलान कर दिया था।
ध्यातव्य है कि तालिबान ने देश की लोकतांत्रिक हुकूमत पर अपना दबाव तभी अचानक तेज़ कर दिया था जब ट्रम्प ने अमेरिकी सेनाओं को वापस लेने का फ़ैसला किया था और ज्यों-ज्यों अमेरिकी सेनाओं की वापसी होती गयी वह 34 प्रान्तों वाले अफ़गानिस्तान में एक के बाद एक शहर पर आसानी से क़ब्ज़ा करता चला गया। साधारण हथियारों वाले तालिबानियों को कहीं किसी ख़ास प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि अफ़गानी सैनिक ख़ुद ही तालिबान लड़ाकों से जा मिले या हथियार डालते गये।
यों तो दुनिया में कुल देशों की संख्या 240 है। इनमें इस समय 195 ऐसे हैं जिन्हें स्वतंत्र माना जाता है। इनमें भी ताइवान और वैटिकन सिटी को छोड़कर 193 देशों को ही संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता दी हुई है। बाकी के 45 छोटे देश किसी सार्वभौमिक स्वरूप से च्युत हैं और वे अलग-अलग देशों के अधीन हैं। लेकिन आज अधिकतर देश अफ़गानिस्तान की हालत को लेकर संज़ीदा हुए हैं तो इसकी वज़ह आतंकवाद है। तालिबान भले इसका जनक नहीं रहा लेकिन वह कट्टरपन्थी इस्लाम और शरिया-सोच की उपज है। इससे सर्वाधिक परेशानी महिलाओं को होती है। उनकी ज़िन्दगी नर्क से भी बदतर बन जाती है। इन कट्टरपन्थियों के नज़रिये में महिलाएँ भोग के लिए होती हैं लिहाज़ा उन्हें दूसरे मामलों से बावस्ता नहीं होना चाहिए! यही कारण है कि अफ़गानिस्तान में एक बार फ़िर से बेहद गम्भीर हुई “जुल्मी शासन” की स्थिति से सभी अफ़गानी न सिर्फ़ ग़मगीन बल्कि बेहद आशंकित हैं।
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