क्या हमारी नदियाँ ज़हर बन चुकी हैं? क्रोमियम प्रदूषण से बढ़ता कैंसर संकट

(राम दत्त त्रिपाठी) 

लखनऊ की एक शांत शाम को , शहर के एक साधारण से घर में बैठकर जब लखनऊ विश्वविद्यालय में जंतु विभाग के प्रोफेसर सुधीर पंवार से बातचीत शुरू होती है, तो यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि आगे जो खुलासे होने वाले हैं, वे केवल पर्यावरण की कहानी नहीं, बल्कि हमारे शरीर के भीतर फैलती एक खामोश आपदा की कहानी हैं।

मैं उनसे हाल ही में आई आरएमएल मेडिकल इंस्टिट्यूट लखनऊ की उस रिपोर्ट के बारे में पूछता हूँ, जिसमें कानपुर के आसपास रहने वाले लोगों के खून में क्रोमियम पाए जाने की पुष्टि हुई है। यह जांच नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देश पर हुई थी। सवाल सीधा था—क्या यह स्थिति अचानक पैदा हुई है, या हम लंबे समय से एक खतरे की तरफ बढ़ रहे थे?

प्रोफेसर पंवार थोड़ी देर रुककर जवाब देते हैं। उनकी आवाज़ में चिंता साफ झलकती है। वे कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है। पिछले कई दशकों से वैज्ञानिक इस खतरे की ओर इशारा करते रहे हैं। फर्क बस इतना है कि जो समस्या पहले प्रयोगशालाओं और शोधपत्रों तक सीमित थी, वह अब आम आदमी के शरीर में दिखाई देने लगी है। “अब यह साइंटिस्ट का विषय नहीं रहा,” वे कहते हैं, “यह सीधे-सीधे जनता के स्वास्थ्य का प्रश्न बन चुका है।”

बातचीत आगे बढ़ती है और धीरे-धीरे एक बड़ा परिदृश्य सामने आता है। प्रोफेसर पंवार बताते हैं कि उत्तर भारत  की लगभग हर बड़ी नदी—गंगा, यमुना, गोमती, हिंडन, काली, कृष्णी—अपने प्राकृतिक स्वरूप से दूर जा चुकी है।

Ganga river in Kanpur
Ganga River in Kanpur highly polluted by sewage and industrial effluents

औद्योगिक विकास ने इन नदियों को जीवनदायिनी धारा के बजाय एक “डिस्पोज़ल चैनल” में बदल दिया है। उद्योगों के लिए यह सबसे आसान रास्ता था—जो भी अपशिष्ट हो, उसे नदी में बहा दो। समस्या खत्म। लेकिन असल में समस्या यहीं से शुरू होती है।

मैं उनसे पूछता हूँ कि आखिर यह प्रदूषण हमारे शरीर तक कैसे पहुंचता है। वे इसे बहुत सरल लेकिन चौंकाने वाले तरीके से समझाते हैं। कुछ लोग सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं—जैसे चमड़ा उद्योग में काम करने वाले मजदूर, जो क्रोमियम की धूल को सांस के साथ अपने शरीर में लेते हैं। लेकिन असली खतरा उससे भी बड़ा है। जो रसायन फैक्ट्रियों से निकलकर जमीन में डाले जाते हैं, वे धीरे-धीरे पानी में घुलते हैं, फिर भूजल में पहुंचते हैं, और वहीं से हमारी फसलों, सब्जियों और अंततः हमारे भोजन का हिस्सा बन जाते हैं।

“आप जो ज़हर नदी में डालते हैं,” वे कहते हैं, “वही किसी न किसी रूप में आपकी थाली में वापस आता है।”

उनकी बातों से एक बेचैन करने वाली तस्वीर उभरती है। शहरों के पास, जहां नदियाँ सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं, वहीं सबसे अधिक सब्जियां उगाई जा रही हैं। वही सब्जियां बाजारों में बिकती हैं, हमारे घरों तक पहुंचती हैं। पशु वही पानी पीते हैं, और वही दूध हमारे बच्चों तक पहुंचता है। यानी प्रदूषण केवल नदी तक सीमित नहीं रहता—वह एक पूरे फ़ूड चेन  खाद्य चक्र में फैल जाता है।

( यह इन्फोग्राफिक उस अदृश्य यात्रा को दिखाता है, जिसके माध्यम से औद्योगिक प्रदूषण धीरे-धीरे मानव शरीर तक पहुंचता है। फैक्ट्रियों से निकलने वाला विषैला कचरा सबसे पहले नदियों में जाता है। वहां से यह प्रदूषण दो प्रमुख रास्तों से फैलता है—पहला, भोजन श्रृंखला के माध्यम से, जहां मछलियां, सब्जियां और अन्य खाद्य पदार्थ इस ज़हर को अपने भीतर जमा कर लेते हैं; और दूसरा, भूजल के माध्यम से, जहां यह रसायन जमीन के भीतर जाकर ट्यूबवेल और हैंडपंप के पानी को भी दूषित कर देते हैं।

इसी प्रक्रिया के दौरान अस्पतालों और रासायनिक कचरे से “सुपरबग्स” भी विकसित होते हैं, जो एंटीबायोटिक्स के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। अंततः यही विषैले तत्व मानव शरीर में प्रवेश करते हैं, जहां क्रोमियम जैसे तत्व खून में पाए जाते हैं और कैंसर, त्वचा रोग, सांस की समस्याएं और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।

• 95% लोगों के खून में क्रोमियम (NGT जांच) • Chromium-6: अत्यधिक कैंसरकारी रूप • फूड चेन + भूजल = मुख्य संक्रमण मार्ग • सुपरबग्स: एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का नया खतरा • स्वास्थ्य प्रभाव: कैंसर, त्वचा घाव, सांस की बीमारी)

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जिक्र आते ही बातचीत और गंभीर हो जाती है। सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद—इन इलाकों में यमुना, हिंडन, काली और कृष्णी नदियों के किनारे बसे गांवों में कैंसर और अन्य बीमारियों के असामान्य मामले सामने आ रहे हैं। कुछ गांवों में हालात इतने खराब हैं कि लोग हैंडपंप का पानी पीने से डरते हैं और पीने का पानी खरीदकर इस्तेमाल करते हैं।

लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं होती। प्रोफेसर पंवार एक और खतरे की ओर इशारा करते हैं—सुपरबग्स का। अस्पतालों और औद्योगिक कचरे के जरिए एंटीबायोटिक्स पानी में पहुंचते हैं, जिससे बैक्टीरिया में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। ये “सुपरबग्स” ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं, जहां सामान्य दवाइयाँ बेअसर हो जाती हैं। गोमती और यमुना जैसी नदियों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

बात जब सरकारी प्रयासों पर आती है—गंगा एक्शन प्लान और नमामि गंगे जैसे बड़े अभियानों पर—तो एक निराशा झलकती है। अरबों रुपये खर्च किए गए, लेकिन नदियों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखता। वजह क्या है? 

प्रोफेसर पंवार के अनुसार, हमने समस्या को समग्र रूप से समझने के बजाय टुकड़ों में हल करने की कोशिश की। कहीं घाट साफ कर दिए, कहीं नाले मोड़ दिए, लेकिन पूरे नदी तंत्र—रिवर बेसिन—को कभी एक इकाई के रूप में नहीं देखा।

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, जिन्हें समाधान माना गया, कई जगह खुद समस्या बन गए हैं। वे न तो सभी प्रदूषकों को साफ कर पा रहे हैं और न ही खतरनाक बैक्टीरिया को खत्म कर पा रहे हैं। कई बार तो “ट्रीटेड” पानी भी उतना ही खतरनाक होता है जितना बिना उपचार का।

इस पूरी बातचीत के दौरान एक और अहम बात सामने आती है—डेटा और वास्तविकता के बीच का अंतर। सरकारी रिपोर्ट्स अक्सर यह दिखाती हैं कि सब कुछ नियंत्रण में है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति कहीं अधिक गंभीर है। जब तक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने हस्तक्षेप नहीं किया, तब तक खून में क्रोमियम जैसी बात सामने ही नहीं आई थी।

अंत में मैं उनसे पूछता हूँ कि समाधान क्या है। वे किसी चमत्कारी उपाय की बात नहीं करते। उनका जवाब सरल लेकिन कठोर है—हमें अपनी सोच बदलनी होगी। सरकार को सख्त निगरानी और वैज्ञानिक योजना के साथ काम करना होगा, उद्योगों को जिम्मेदारी लेनी होगी, और समाज को यह समझना होगा कि पर्यावरण से समझौता अंततः खुद अपने जीवन से समझौता है।

बातचीत खत्म होती है, लेकिन एक सवाल मन में रह जाता है—क्या हम सच में इस चेतावनी को सुन रहे हैं?

क्योंकि अब यह केवल नदियों का सवाल नहीं रहा।
अब यह हमारे खून में घुल चुके ज़हर का सवाल है।

@Mediaswarajnews Youtube channel से प्रो सुधीर पंवार की पूरी बातचीत यहाँ सुनें :

This video conversation between senior journalist Ram Dutt Tripathi and Lucknow University Professor Sudhir Panwar ( Zoology Department ) explores the catastrophic health crisis caused by **industrial and urban pollution** in India’s major river systems, such as the Ganges and Yamuna.

 Expert analysis reveals that **heavy metals like chromium** and hazardous “superbugs” are no longer confined to the water but have entered the **human food chain** through contaminated crops, meat, and groundwater. 

These toxins are directly linked to rising rates of **cancer, liver disease, and physical deformities** among populations living near industrial hubs. 

The discussion criticizes the **ineffectiveness of government initiatives** and waste treatment plants, which often fail to filter out dangerous pathogens and chemicals. Ultimately, the text serves as a dire warning that **polluted ecosystems** inevitably return to haunt human health through the very resources used for survival.

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