योग:प्राचीनता एवम् नवीनता का दिव्य मिश्रण

 

योगासन

।।असतो मा सद्गमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय।।

आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। योग जिसका अर्थ है ‘जोड़ना’। तो प्रश्न यह उठता है कि किसे जोड़ना है और किससे जोड़ना है ? उत्तर है – आत्मा को प्रकृति से अर्थात परमात्मा से। तो यह कैसे संभव है इसके लिए क्या करना चाहिए आदि अनेक प्रश्न हमारे मन में उठ रहे हैं तो आइए अब विस्तार से जानते हैं इसके विभिन्न पहलुओं को। योग तत्वतः बहुत सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित एक आध्यात्मिक विषय है जो मन एवं शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर ध्यान देता है। इस प्रकार योग का लक्ष्य आत्म-अनुभूति, सभी प्रकार के कष्टों से निजात पाना है जिससे मोक्ष की अवस्था प्राप्त होती है।

पाणिनी ने ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘युजिर् योगे’ ,’युज समाधो’ तथा ‘युज् संयमने’ इन तीन धातुओं से मानी है। प्रथम व्युत्पत्ति के अनुसार ‘योग’ शब्द का अनेक अर्थो में प्रयोग किया गया है।, जैसे – जोड़ना, मिलाना, मेल आदि। इसी आधार पर जीवात्मा और परमात्मा का मिलन योग कहलाता है। इसी संयोग की अवस्था को “समाधि” की संज्ञा दी जाती है जो कि जीवात्मा और परमात्मा की समता होती है।

महर्षि पतंजलि ने योग शब्द को समाधि के अर्थ में प्रयुक्त किया है। व्यास ने ‘योग: समाधि:’ कहकर योग शब्द का अर्थ समाधि ही किया है। वाचस्पति का भी यही मत है। संस्कृत व्याकरण के आधार पर ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार से बताई सकती है – “युज्यते एतद् इति योग: – इस व्युत्पत्ति के अनुसार कर्मकारक में योग शब्द का अर्थ चित्त की वह अवस्था है जब चित्त की समस्त वृत्तियों में एकाग्रता आ जाती है। यहाँ पर ‘योग’ शब्द का उद्देश्य के अर्थ में प्रयोग हुआ है। यहाँ ‘योग’ शब्द साधनार्थ प्रयुक्त हुआ है।

इसी आधार पर योग के विभिन्न साधनों को जैसे हठ, मंत्र, भक्ति, ज्ञान, कर्म आदि को हठयोग, मंत्रयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि के नाम से पुकारा जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इसे कुछ इस प्रकार से परिभाषित किया है। योगस्थ: कुरू कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय:। सिद्ध्यसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। (2/48) अर्थात् – हे धनंजय! तू आसक्ति त्यागकर समत्व भाव से कार्य कर। सिद्धि और असिद्धि में समता-बुद्धि से कार्य करना ही योग हैं। सुख-दु:ख, जय-पराजय, शीतोष्ण आदि द्वन्द्वों में एकरस रहना योग है। “योग: कर्मसुकौशलम्” (गीता 2/50) अर्थात् कर्मो में कुशलता ही योग है। कर्म इस कुशलता से किया जाए कि कर्म बन्धन न बने।

योग जीवन जीने की कला है, साधना विज्ञान है। मानव जीवन में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी साधना व सिद्धान्तो में ज्ञान का महत्व दिया है। इसके द्वारा आध्यात्मिक और भौतिक विकास सम्भव है। वेदो, पुराणो में भी योग की चर्चा की गयी है। यह सिद्ध है कि यह विद्या प्राचीन काल से ही बहुत विशेष समझी गयी है। इसे जानने के लिए सभी ने श्रेष्ठ स्तर पर प्रयास किये है। आज का मानव जीवन कितना जटिल है, उसमें कितनी उलझने और अशांति है। यदि किसी को दिव्य दृष्टि मिल सकती होती तो वह देख पाता कि मनुष्य का हर कदम पीड़ा की कैसी अकुलाहट से भरा है, उसमे कितनी निराशा, भय, व्याकुलता है। इसीलिए यह आवश्यक है कि हमारा हर पग प्रसन्नता का प्रतीक बन जाए, उसमे पीड़ा का अंश, अवषेश न बचे।

योग का मुख्य उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना है जिनका भावनात्मक स्तर दिव्य मान्यताओं से, आकांक्षाओं से, दिव्य योजनाओं से जगमगाता रहे। क्योंकि ऐसे व्यक्तियों में क्षमता एवं विभूतियां भी उच्च स्तरीय होती है। वे सामान्य पुरुषो की तुलना में निश्चित ही समर्थ और उत्कृष्ट होते है, और उस बचे हुए प्राण-प्रवाह को अचेतन के विकास करने में नियोजित करते हैं। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान ,समाधि जैसी साधनाओं के माध्यम से चेतन मास्तिष्क को शून्य स्थिति में जाने की सफलता प्राप्त होती है।

प्राचीन काल में योग विद्या सन्यासियों या मोक्षमार्ग के साधकों के लिए ही समझी जाती थी तथा योगाभ्यास के लिए साधक को घर त्याग कर वन में जाकर एकांत में वास करना होता था। इसी कारण योगसाधना को बहुत ही दुर्लभ माना जाता था। जिससे लोगो में यह धारणा बन गयी थी कि यह योग सामाजिक व्यक्तियों के लिए नहीं है। जिसके फलस्वरूप यह योगविद्या धीरे-धीरे लुप्त होती गयी। परन्तु पिछले कुछ वर्षों से समाज में बढते तनाव, चिन्ता, प्रतिस्पर्धा से ग्रस्त लोगों को इस गोपनीय योग से अनेको लाभ प्राप्त हुए और योग विद्या एक बार पुन: समाज मे लोकप्रिय होती गयी। आज भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्वभर में योगविद्या पर अनेक शोध कार्य किये जा रहे है और इससे लाभ प्राप्त हो रहे है। योग के इस प्रचार-प्रसार में विशेष बात यह है कि यहां यह योग जितना मोक्षमार्ग के पथिक के लिये उपयोगी था, उतना ही साधारण मनुष्य के लिए भी महत्व रखता है। आज के आधुनिक एवं विकास के इस युग में योग अनेक क्षेत्रों में विशेष महत्व रखता है जैसे –
1. स्वास्थ्य क्षेत्र में
2. रोगोपचार के क्षेत्र में
3. खेलकूद के क्षेत्र में
4. शिक्षा के क्षेत्र में
5. पारिवारिक महत्व
6. सामाजिक महत्व
7. आर्थिक दृष्टि से महत्व
8. आध्यात्मिक क्षेत्र में

योग के विभिन्न महत्त्वो देखने से स्पष्ट हो जाता है कि योग वास्तव में वैज्ञानिक जीवन शैली है, जिसका हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष पर गहराई से प्रभाव पड़ता है। इसी कारण से योग विद्या सीमित तौर पर संन्यासियों की या योगियों की विद्या न रह कर, पूरे समाज तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए आदर्श पद्धति बन चुकी है। आज योग एक सुव्यवस्थित व वैज्ञानिक जीवन शैली के रूप में प्रमाणित हो चुका है। प्रत्येक मनुष्य अपने स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए, रोगों के उपचार हेतु, अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाने, तनाव-प्रबन्ध, मनोदैहिक रोगो के उपचार आदि में योग पद्धति को अपनाते हुए देखा जा रहा है। प्रतिदिन टेलीविजन कार्यक्रमों में बढ़ती योग की मांग इस बात को प्रमाणित करती है कि योग वर्तमान जीवन में एक अभिन्न अंग बन चुका है। जिसका कोई दूसरा पर्याय नहीं हैं। योग की लोकप्रियता और महत्त्व के विषय में हजारो वर्ष पूर्व ही योगशिखोपनिषद् में कहा गया है- योगात्परतंरपुण्यं यागात्परतरं शित्रम्। योगात्परपरंशक्तिं योगात्परतरं न हि।। अर्थात् योग के समान कोई पुण्य नहीं, योग के समान कोई कल्याणकारी नहीं, योग के समान कोई शक्ति नहीं और योग से बढ़कर कुछ भी नहीं है। वास्तव में योग ही जीवन का सबसे बड़ा आश्रम है।

इसीलिए प्रतिवर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है जिससे लोगों को योग के विषय में विस्तृत जानकारी दी जा सके। अंत में ईश्वर से मंगल कामना वो सदैव आपका कल्याण करें हमेशा इस चराचर पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें और इस कोरोना महामारी से निजात दिलाए।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः

रितेश त्रिपाठी
(सचिव, रचयिता संस्थान, प्रयागराज)
राज़ रौशन
(शिक्षक:आर.के. कैरियर कोचिंग संस्थान, हरसिद्धि, पूर्वी चम्पारण, बिहार)
राज त्रिपाठी
(छात्र:काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, सदस्य:रचयिता संस्थान प्रयागराज एवम् स्वयं सेवक:राष्ट्रीय सेवा योजना)

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