डब्लू. एफ़. एच. यानी घर-घुस्सूपन

डब्लू. एफ़. एच. अर्थात् वर्क फ़्राम होम यानी घर से काम. इसके फ़ायदे तो बहुत हैं, पर जरा नुक़सान पर भी गौर करें. उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी का एक हास्य लेख.

महेश चंद्र द्विवेदी , लेखक
महेश चंद्र द्विवेदी

बलिहारी उस कोरोना की, जिसने डब्लू. एफ़. एच. (वर्क फ़्राम होम) संस्कृति का प्रसार कर दिया है। यदि हिंदी की शुचिता के पक्षधर इसे भाषीय अत्याचार न समझें और मुझे हिंदी का हननकर्ता न घोषित कर दें, तो मैं इसे घर-घुस्सू संस्कृति कहूंगा। इसमें जब तक बाहर जाना अपरिहार्य न हो, तब तक सब को घर-घुस्सू बने रहने को बाध्य किया जाता है। 

मुझे यह संस्कृति बचपन से भाती रही है।लड़कपन में मेरे द्वारा अलसाये पड़े रहकर पलंग तोड़ने पर मुझे घर-घुस्सू होने के ताने सुनने पड़ते थे। मेरे द्वारा पत्नी-प्राप्ति के पश्चात ये ताने द्विगुणित हो गये थे। इसमें ताने देने वालों का कोई दोष नहीं था, मेरा घर-घुस्सूपन ही दूना हो गया था।

पर अंग्रेज़ी में कहावत है – ‘एवरी डौग हैज़ हिज़ डे’। उस कहावत को चरितार्थ करने हेतु ऊपर वाले ने कोरोना भेज दिया, जिसने घर-घुस्सुओं की बल्ले बल्ले कर दी और घर-घुस्सुओं को ताना देनेवालों की ऐसी तैसी कर दी। घर-घुस्सुओं को ताना देने वाले खुद अब सबको घर-घुस्सू बने रहने की सलाह देने लगे। सरकार ने घर-घुस्सू संस्कृति को देश-काल की आवश्यकता पाकर सबको घर-घुस्सू बने रहने का आदेश पारित कर दिया। जिन अड़ियल किस्म के लोगों ने लाकडाउन अवधि में इस संस्कृति की अवहेलना की, पुलिस वालों ने उन्हें सड़क पर सरेआम मुर्गा बनाकर उनकी इज़्ज़त उतार ली अथवा उनकी एक-आध हड्डी तोड़कर चिकित्सीय आधार पर उन्हें मजबूरन घर-घुस्सू बने रहने का नेक काम कर दिया। 

           प्राइवेट शैक्षणिक संस्थानों में भी डब्लू. एफ़. एच. की जय-जयकार हो रही है। साल भर स्कूल प्रायः बंद रहे हैं बस कुछ क्लास आनलाइन पढ़वा दिये गये हैं, परंतु छात्रों से फ़ीस पूरी वसूल की जा रही है अर्थात हींग लगी न फ़िटकरी और रंग आ रहा है चोखा। पांचवीं कक्षा का एक निर्धन छात्र 24 मार्च, 2020 को लाकडाउन लगने के बाद एक भी दिन स्कूल इसलिये नहीं गया, जिससे 2020-2021 वर्ष की उससे फ़ीस न लगे तथा उसने इस दौरान एक भी आनलाइन क्लास में भी भाग नहीं लिया है, क्योंकि उसके पास फोन ही नहीं है। परंतु अब जब वह वहां टी. सी. लेने गया, तो उससे पूरे वर्ष की फ़ीस मांगी जा रही है। उसे यह लालच अवश्य दिया जा रहा है कि उसे पांचवीं व छठी दोनो कक्षा उत्तीर्ण होने का टी. सी. दे दिया जायेगा।           

        आई. टी. कम्पनियां, जहां कम्प्यूटर पर ही काम होता है, की तो चांदी हो गई है। कार्यालय के किराये का खर्च, बिजली का खर्च और कर्मचारियों के आने-जाने तथा खिलाने-पिलाने (काफ़ी, लंच आदि) का खर्चा बहुत कम हो गया है। दूसरी ओर घर से काम करने के कारण सभी कर्मियों को अब 24 घंटे का बंधुआ मज़दूर मानकर काम लिया जा रहा है। मेरा बेटा अमेरिका में आई. टी. कम्पनी में कार्यरत है और गत वर्ष से घर से काम कर रहा है। मार्च, 2021 में मैने अपने बेटे से फ़ोन पर पूछा, “अब तो सम्भवतः तुम्हें आफ़िस जाकर काम करना होगा।“

           बेटे ने तल्ख स्वर में कहा, “नहीं। कम्पनी ने अभी से घोषणा कर दी है कि इस वर्ष डब्लू. एफ. एच. ही चलेगा।“ 

            मैं बधाई देने वाले स्वर में बोला, “तब तो तुम्हारे ठाठ हैं।“ 

            बेटे का जल-भुन जाने वाले व्यक्ति का सा उत्तर था, “क्या ठाठ हैं? पहले लोग मेरे कार्यालय का समय देखकर मीटिंग फ़िक्स करते थे। अब सब सोचते हैं कि घर पर ही तो होगा और किसी भी समय मीटिंग रख देते हैं। मेरे लिये न सोने का समय अपना है और न जागने का। कम्पनी का मुख्यालय जर्मनी में है और काफ़ी बिज़िनेस भारत में है। अमेरिकन, जर्मन और भारतीयों को अलग-अलग समय सुविधाजनक हैं और सब जगह के बौस अपनी सुविधानुसार मीटिंग रख देते हैं। अक्सर मीटिंग के दौरान ही मुझे ट्वाइलेट जाना पड़ता है और वहीं से सवाल-जवाब चलते रहते हैं। ऐसे में मुझे लैप-टौप थोड़ा उठाकर रखना पड़ता है जिससे धड़ के नीचे का हाल दिखाई न दे और माइक साइलेंट पर कर देना पड़ता है जिससे दूसरे छोर पर पिपिहरी से लेकर तबले तक की आवाज़ें सुनाई न दें।“ 

             मैं अपनी हंसी न रोक सका, पर बोला, “लेकिन डब्लू. एफ़. एच. से परिवार का साथ तो मिलता है।“ 

             बेटा अविलम्ब बोल पड़ा, “क्या साथ मिलता है? डब्लू. एफ़. एच. से दूरियां बढ़ ही गई हैं। मेरी आनलाइन मीटिंग चलती रहती है तथा पत्नी और दोनो बच्चों के घर पर ही आनलाइन क्लासेज़ चलते रहते हैं। इनमें व्यवधान न हो, इस कारण हर एक को अलग-अलग कमरे में रहना पड़ता है। हालत यह है कि खाना खाने के लिये बुलाने हेतु भी एस. एम. एस. करना पड़ता है। आपस में घरेलू बातचीत का मौका मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है।“

             बेटा कुछ देर रुका, फिर हंसते हुए बोला, “इस घर-घुस्सूपन का एक खतरा और भी है कि पत्नी किसी दिन यह न कहने लगे कि दिन-रात घर में एक मेरी ही शकल देखते-देखते वह बोर हो गई है।“    

       

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