क्यों डरे सहमें हैं जोशीमठ के लोग

                                          अखिलेश पाण्डेय 

जोशीमठ कस्बे के लोग किसी बड़ी अनहोनी की आशंका से डरे सहमे हुए हैं। लगभग 14 महीनों से लोग अपनी व्यथा सरकार को सुनाने को छटपटा रहे थे लेकिन सरकार कान में रुई ठुंसे रही ।

थक हार कर लोग अब सड़कों पर हैं ।लोग घर बार छोड़ कर भरी ठंडी रातों में सड़कों पर जीने को मजबूर हो गए। शहर के अधिकांश लोगों का आरोप है कि जलविद्युत परियोजनाओं के अंधाधुंध निर्माण से यह शहर दरक रहा है । जोशीमठ में 80 के दशक में भी बहुत छोटे से भू-धसाव पर तत्कालीन यूपी सरकार ने तत्कालीन आयुक्त गढ़वाल मंडल महेश चंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में दिनांक 08/04/1976 को एक समिति गठित की थी । जबकि तब लोग यह आरोप लगाते थे कि पहाड़ की सरकार सुनती नहीं । जबकि आज पिछले चौदह महीने से उत्तराखंड सरकार के सामने लोग चिल्ला रहे हैं कि वे खतरे की जद में हैं लेकिन सरकार को उनकी सुनने की कोइ फुर्सत नहीं थी । जब मामला हाथ से निकलने लगा लोग सडक पर आ गये तो 7 जनवरी को सीएम वहां गये ।
जोशीमठ नगर बदरीनाथ, हेमकुंड साहिब, फूलों की घाटी और औली जैसे धार्मिक और पर्यटन स्थलों का मुख्य पड़ाव है। यह प्राचीन काल में चंद राजवंश की राजधानी रहा है। ऐतिहासिक और पौराणिक होने के साथ ही चीन सीमा के नजदीक होने के कारण सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सीमा पर तैनात की जाने वाली सेना का यह बेस कैंप है।भू धसाव के यहां लगातार बढ़ने से
जोशीमठ के सिर्फ घर ही नहीं सड़कें भी धंस रही हैं ।

जोशी बद्रीनाथ हाईवे में भी दरारें
बद्रीनाथ हाईवे भी धँस रहा है Badrinath Highway

जोशीमठ की 20 से 25 हजार की नागरिक आबादी यहं बनाये गये लगभग पांच हजार घरों में रहती है। इसके अलावा भारतीय सेना के भी एक ब्रिगेड और आईटीबीपी का यह एक ठिकाना है। इस तरह देखा जाए तो जोशीमठ में कुछ 35 से 40 हजार सिविलियन और सैनिक रहते हैं। हर रोज यहां ठहरने और यहां से गुजरने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या भी हजारों में होती है। चीन पर नजर रखने के लिए साल 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद से यहाँ सेना की टुकड़ी तैनात की गयी । इसके अलावा जोशीमठ के थ्घीक बगल में औली हिम क्रीडा स्थल है जो भारत में हिम क्रीडा का सबसे शानदार स्पॉट माना जाता है यहाँ मिलिट्री के माउंटेन ब्रिगेड का भी ट्रेनिंग सेंटर है ।

पिछले दिनों भारत अमेरिकी सैनिकों का 15 दिवसीय युद्धाभ्यास भी यहाँ हुआ था । घरों और सड़कों पर हर जगह दरारें आने से अब लोग सरकारी अनदेखी और इसके विरुद्ध सड़कों पर आने लगे हैं । बीते 24 दिसंबर को जोशीमठ के हजारों लोग सड़कों पर उतरे। उसके बाद सरकार में कुछ हलचल दिखी और शनिवार 7 जनवरी को मुख्यमंत्री ने वहां का दौरा किया लेकिन सड़कों पर बैठे लोगों से मुख्यमंत्री इस दौरे पर भी नहीं मिले । एक गेस्ट हाउस में कुछ लोगों को बुलाकर एकाध उनकी पार्टी के यहाँ भेजे गये शिष्टमंडल द्वारा चयनित घर में जाकर वहां के दरारों को देख कर मुख्यमंत्री लौट आये।
अक्टूबर 2021 में आई भारी बारिश के बाद छावनी बाजार के लोगों ने अपने घरों में दरारें देखीं। हालांकि 7 फरवरी, 2021 को नंदा देवी बायोस्फीयर क्षेत्र में हैंगिंग ग्लेशियर टूटने के कारण आई बाढ़ के बाद से उन्हें घर की दीवारों में परिवर्तन महसूस हो रहा था। साल 2021 की 7 फरवरी को आई बाढ़ में दो जल विद्युत परियोजनाएं बह गई थी और 200 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। घरों में दिख रही दरारों के बाद नवंबर 2021 में ही प्रशासन को ज्ञापन देकर प्रभावित लोगों को अन्यत्र बसाने की मांग की जाने लगी थी । स्थानीय लोगों ने भू-वैज्ञानिकों के दल से अपने स्तर से एक सर्वेक्षण कराया । इस दल में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद से जुड़े नवीन जुयाल और कॉलेज ऑफ फॉरेस्ट्री, रानीचौरी, टिहरी गढ़वाल के बेसिक एवं सोशल साइंस विभाग के अध्यक्ष एसपी सती और शुभ्रा शर्मा शामिल थे। रिपोर्ट में कहा गया कि जोशीमठ की आसपास की ढलानें बेहद नाजुक स्थिति में हैं और इन ढलानों में अस्थिरता देखी गई है। इसलिए इस क्षेत्र का व्यापक अध्ययन किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार को जब यह रिपोर्ट भेजी गयी तो उसने उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पीयूष रौतेला, सीएसआईआर-सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के शांतनु सरकार, आईआईटी रुड़की के बीके माहेश्वरी, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के मनोज केष्ठा, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के स्वपनामिता चौधरी वेदश्वरम ने जोशीमठ का दौरा यहां करवाया। सितंबर 2022 में इन लोगों की रिपोर्ट सामने आयी। जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति बनाकर लोगों की जायज आवाज उठाने वाले अतुल सती कहते हैं कि जोशीमठ ही नहीं, पूरी नीती घाटी में भू धंसाव हो रहा है। 7 फरवरी, 2021 की तबाही के बाद से यह सिलसिला चल रहा है।लेकिन चौदह महीने से लगातार आवाज उठाने के बाद उनकी मांग पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया ।जोशीमठ नगर में धंसाव 1970 के दशक में भी महसूस किया गया था। तब सरकारी स्तर पर गढ़वाल आयुक्त महेश चंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में धंसाव के कारणों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने 1978 में अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि जोशीमठ नगर के साथ पूरी नीती और माणा घाटियां मोरेन पर बसी हुई हैं। ग्लेशियर पिघलने के बाद जो मलबा पीछे रह जाता है, उसे मोरेन कहा जाता है। ऐसे में इन घाटियों में बड़े निर्माण कार्य नहीं किये जाने चाहिए। लेकिन मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट पर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया और इन घाटियों में दर्जनों जल विद्युत परियोजनाओं के साथ ही कई दूसरे निर्माण भी लगातार हो रहे हैं।

शंकराचार्य मठ के प्रयास

शंकराचार्य का नृसिंह मंदिर भी ख़तरे में Nrisingh Mandir Shankaracharya

साध्वी पूर्णांभा का कहना है ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वरूपानन्द जी महाराज ने पहले ही यह कहा था कि नदियों को बांध मुक्त रहने देना चाहिए।उनके आदेशानुसार काशी मे 2012 मे गंगा तपस्या चली थी स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द जी महाराज के नेतृत्व में जिसमे हमने भी निर्जल अनशन किया था। हमारे साथ 9 और लोग अनशन मे शामिल थे।


ज्योतिर्मठ संवेदनशील क्षेत्र है। वहा अनियोजित विकास के कारण यह दुर्गति हुई है। समय रहते शंकराचार्य जी की बात मानी गयी होती तो यह परिणाम न आता। वर्तमान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य जी ज्योतिर्मठ के लिए हर स्तर पर प्रयास कर रहे है।उन्होने सुप्रीम कोर्ट मे पी आई एल भी दाखिल की है।
वे स्वयं अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर वहा पहुचे हैं और उनकी ओर से प्रभावितों के लिए भोजन वस्त्र और अन्य उपयोगी सामग्री पहुचाई जा रही है।

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