महामारी के समय आयुर्वेद की उपेक्षा क्यों ?

विश्व के इतिहास में महामारियों और उससे निपटने के तरीकों का सबसे पुराना उल्लेख आयुर्वेद ग्रंथों में मिलता है ।हजारों साल पहले चरक संहिता में महामारियों के कारण व निवारण वर्णन है। मौर्य काल में आचार्य नागार्जुन को महामारी विशेषज्ञ के रूप में उल्लेख मिलता है।परन्तु वर्तमान में इस बहुमूल्य ज्ञान को भ्रमजाल में उलझा हुए किनारे कर दिया गया है. जबकि देश में आयुर्वेद,सिद्धा,यूनानी,होम्योपैथी लाखों चिकित्सकों ,हजारों कालेज व अस्पतालों आदि संसाधनों को प्रयोग नहीं किया जा रहा है,आखिर ऐसा क्यों ?

ऐसे में यह भी प्रश्न उठता है कि महामारियाँ या कोई भी रोग देश काल के अनुसार प्रभावी होता है,इसलिए उसके प्रबंधन के लिए भी देश-काल के अनुसार हर देश को अपनी योजना बनानी चाहिए,परन्तु ऐसा क्यों नहीं हो रहा है,असफल वैश्विक प्रोटोकाल का पालन किया जा रहा है,ऐसा क्यों ?

प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों पर ध्यान

कोरोना महामारी के मध्य अब तक कहीं भी कोई प्रमाणित उपचार न मिलने के कारण पूरे विश्व में प्राचीन एवं परम्परागत  चिकित्सा पद्धतियों की ओर भी  देखा जा रहा है। भारत ऐसी आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी जैसी अनेक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों  जनक देश होने के नाते इस महामारी के समय एक अग्रणी भूमिका निभा सकता है। 

वर्तमान महामारी के समय आयुर्वेद की भूमिका को लेकर मीडिया स्वराज ने अपने यू ट्यूब चैनल के माध्यम से दि.२२.०५.२०२१ को रात्रि ८.३० बजे से एक लाइव परिचर्चा का आयोजन किया। परिचर्चा में पैनलिस्ट के रूप में उत्तर प्रदेश आयुर्वेद विभाग के निदेशक प्रो. एस. एन . सिंह, काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के आयुर्वेद संकाय के पूर्व संकाय प्रमुख प्रो. यामिनी भूषण त्रिपाठी, नागपुर में आयुर्वेद के प्रोफ़ेसर डा. बृजेश मिश्रा, लखनऊ आयुर्वेदिक कालेज में काय चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्ष डा. संजीव रस्तोगी तथा वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक मदन गोपाल बाजपेयी  ने भाग लिया।कार्यक्रम  का संचालन मीडिया स्वराज की ओर से वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी एव डा. आर अचल ने किया। 

परिचर्चा की शुरुआत करते हुये   आयुर्वेद निदेशक प्रो. एस एन सिंह ने कहा कि कोरोना जैसी संक्रामक बीमरियां पूर्व में भी होती रही है और आधुनिक चिकित्सा पद्धति के प्रादुर्भाव से पूर्व सभी व्याधियों का उपचार आयुर्वेद से ही होता था। वर्तमान में प्राचीन मूल्यों के प्रति बढ रहे उपेक्षात्मक भाव  ने रोगों को बढावा दिया है तथा उसके सुगम पारम्परिक इलाज की उपेक्षा की है। 

नागपुर से  प्रो. बृजेश मिश्रा ने बताया कि आयुर्वेद में जनपदोध्वंस जो कि आधुनिक पैनडेमिक के समीचीन शब्द है, का उल्लेख प्राचीनतम चिकित्सा ग्रंथों यथा चरक एवम सुश्रुत संहिता में है। उल्लेखनीय है कि ये ग्रंथ लगभग २,५०० वर्ष पूर्व लिखे गये थे।

चर्चा में आगे भाग लेते हुये आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज लखनऊ से प्रो. संजीव रस्तोगी ने कहा कि प्राचीन ग्रंथों के आलेखों और उद्धरणों को आधुनिक रूप से पुन: परिभाषित करने की आवश्यकता है ताकि उनकी उपयोगिता वर्तमान काल में प्रमाणित हो सके। 

 डा. अचल ने चर्चा को आगे बढाते हुये कहा कि देश और काल का प्रभाव रोगों पर , व्यक्ति पर और उसके उपचार पर सदैव ही पड़ता है। इसी कारण काल और देश विशेष में होने वाले रोगों को काल और देश  विशेष उपायों से जीतना चाहिये। 

महामारी के समय आयुर्वेद की उपेक्षा

परिचर्चा को गति प्रदान करते हुये  संयोजक राम दत्त त्रिपाठी ने वर्तमान महामारी के समय में हो रही आयुर्वेद की उपेक्षा को इंगित करते हुये पैनलिस्टों से इसके कारणों पर प्रकाश डालने को कहा। इसका उत्तर देते हुये प्रो. यामिनी भूषण त्रिपाठी ने कहा कि आयुर्वेदिक उपचार पद्धति और उसमें प्रयोग में लायी जाने वाली औषधियां पहले से ही प्रयोग में लायी जाती रही हैं और उनके फलदायी परिणाम भी मिलते रहे है। ऐसे में आयुर्वेदिक औषधियों को आधुनिक क्लीनिकल ट्रायल के माध्यम से पुन: स्थापित किये जाने के लिये बाध्य करना  महामारी के समय में बहुत युक्तिपूर्ण नहीं है। आयुर्वेदिक उपचार को अनुमति प्रदान करते हुये उसके परिणामों को गम्भीरता पूर्वक निरीक्षित करने एवम परिभाषित करने की आवश्यकता कहीं ज्यादा उपयोगी साबित हो सकती है। 

वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक डा. मदन गोपाल बाजपेयी  ने कोरोना रोगियों के उपचार के अपने अनुभवों को साझा करते हुये बताया कि अधिसंख्य रोगियों में आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुरूप चिकित्सा किये जाने पर लाभ मिलता है। उन्होंने  कहा कि काष्ठ औषधियों के अतिरिक्त आवश्यक अवस्थाओं में रस औषधियों का प्रयोग  किया जाना चाहिये।

इन सवालों के जबाब तलाशने के लिए “कोरोना काल में आयुर्वेद” परिचर्चा श्रृखला के 18 वें अंक में वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी एवं डॉ आर.अचल के साथ उत्तरप्रदेश आयुर्वेद एवं यूनानी सेवाओं के निदेशक डॉ एस.एन सिह, लखनऊ राजकीय आयुर्वेद कालेज के प्रो.संजीव रस्तोगी,आईएमएस आयु बीएचयू वाराणसी के पूर्व डीन प्रो यामिनी भूषण त्रिपाठी,एवं श्री आयुर्वेद महाविद्यालय (राजकीय) नागपुर के प्रो.बृजेश मिश्रा शामिल थे ।

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