आयुर्वेद क्यों है सच्ची एवं आदर्श चिकित्सा!!

दा मदन गोपाल वाजपेयी
वैद्य डा मदन गोपाल वाजपेयी

चूंकि चिकित्सा शब्द की निष्पत्ति कित् रोगपनयने धातु से रोग निवृत्ति अर्थ में हुई है, अतः चिकित्सा का अर्थ रोगों की निवृत्ति करना है। आयुर्वेद को सच्ची आदर्श चिकित्सा मानने के पूर्व, किसी भी अन्य विज्ञान की भांति, इसके मौलिक सिद्धांतों को समझना आवश्यक है। औषधि और चिकित्सक के विषय में चरक संहिता के सूत्र स्थान में आचार्य चरक लिखते हैं कि:

तदेवयुक्त भैषज्यं यदाsरोग्याय कल्पते। 

स चैव भिषजाम श्रेष्ठो रोगेभ्य: यो प्रमोचयते॥ (.सू। 1/135)॥ 

अर्थात, औषधि वह है जो रोग को दूर कर आरोग्यता प्रदान करे तथा दूसरी कोई व्याधि उत्पन्न न करे और चिकित्सक वही श्रेष्ठ है जो रोगी को रोग से सर्वथा मुक्त कर स्वास्थ्य लाभ दे सके। 

आयुर्वेद में चिकित्सा के स्वरूप का वर्णन करते हुए आचार्य चरक आगे लिखते हैं:

याभि: क्रियाभि: जायन्ते शरीरे धातव: समा:।

या चिकित्सा विकराणम तत्कर्म भिषजाम मतम॥(.सू। 1/134)

अर्थात, जिन क्रियाओं के द्वारा शरीर में धातुएं (वात, पित्त, कफ, रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, मल, मूत्र, स्वेद आदि) समान रूप में हो जाएँ वही विकारों की चिकित्सा है और वही चिकित्सक का कर्म है। 

चिकित्सा की उपरोक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि जिस प्रक्रिया के द्वारा उत्पन्न हुई व्याधि का शमन तथा विषम दोषों का प्रकृत्यनुवर्तन (प्राकृतिक स्थिति में लौटना) होता है, वही आदर्श चिकित्सा मानी जाती है। आदर्श चिकित्सा से व्याधि और दोषों का शमन तो होता ही है, साथ-साथ शरीर की रस, रक्त आदि धातुएं भी पुष्ट होती हैं और रोग के प्रभाव से उत्पन्न धातुक्षय एवं दुर्बलता का प्रतीकार कर, स्वास्थ्य का अनुवर्तन भी होता है। जैसा कि कहा गया है:

प्रयोग: समयेद व्याधिमेकम योsन्यमुदीरयेत।

नाsसौ विशुद्ध: शुद्धस्तु शामयेद्यो न कोपयेत॥

यदि किसी चिकित्सा से एक व्याधि का शमन हो और दूसरी व्याधि उत्पन्न हो जाए और शरीर अन्य विकारों के लिए उर्वर क्षेत्र बन जाये तो ऐसी चिकित्सा किस काम की? अतः उपरोक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि आदर्श चिकित्सा में निम्नांकित गुण होना आवश्यक हैं:

  1. दोषों (वात, पित्त, कफ) की विषमता को साम्यावस्था में लाकर व्याधि का उन्मूलन करना। 
  2. उत्पन्न विकारों के शमन के साथ साथ, शारीरिक धातुओं का पुष्ट होना तथा अन्य विकारों का उत्पन्न न होना। 
  3. दोष और व्याधि के दुष्प्रभाव से उत्पन्न धातुक्षय और दुर्बलता का प्रतिकार करते हुये स्वास्थ्य का अनुवर्तन (recovery) होना। 

आयुर्वेद चिकित्सा को आदर्श चिकित्सा मानने का प्रमुख कारण इसमें उपरोक्त सभी गुण विद्यमान हैं क्योंकि आयुर्वेद पूर्णत: निरापद तो है ही साथ ही, इसके उपचार के पश्चात, न तो वह रोग जिसका उपचार किया गया है वह पुनः उत्पन्न होता है न ही इसके पार्श्व प्रभाव के कारण किसी अन्य रोग की उत्पत्ति होती है। चूंकि आयुर्वेद चिकित्सा रोग का शोधन, शमन एवं उन्मूलन करती है और रोगी के शरीर का पोषण करती है इसलिए हानि करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। 

उपरोक्त गुणों के अतिरिक्त, आयुर्वेद चिकित्सा में हेतु व्याधि विपरीत चिकित्सा को व्याधि प्रत्यानीक या व्याधि विपरीत चिकित्सा से श्रेष्ठ बताया गया है इसीलिए, आयुर्वेद चिकित्सा से रोगी स्वस्थ होकर पूर्णत: स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है। आयुर्वेद चिकित्सा में तीक्ष्ण औषधियों से रोग के लक्षणों को दबाने के बजाय उसको समूल नष्ट किया जाता है जिससे वह रोग पुनः उत्पन्न नहीं हो पाता। सरल भाषा में, आयुर्वेद रोग के बजाय, रोग के कारणों की चिकित्सा करता है। यद्यपि रोग के जीर्ण अवस्था में होने पर पहले रोग की फिर रोग के कारणों की चिकित्सा की जाती है। 

इस बात को एक उदाहरण से अधिक स्पष्ट समझा जा सकता है। मान लीजिये, किसी क्षेत्र में कोई विषैला पौधा उग आया है और आसपास के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है, यदि उसकी शाखाएँ और पत्ते काट दिये जाएँ तो उसके हानिकारक प्रभाव समाप्त हो जाएंगे। परंतु, उसकी जड़ें पृथ्वी पर शेष रहने के कारण कुछ समय बाद वह पुनः पौधे का रूप लेकर, वातावरण प्रदूषित करेगा। लेकिन उसकी जड़ें उखाड़ कर, उसे समूल नष्ट कर देने से उस पौधे के पुनः उत्पन्न होने की संभावना समाप्त हो जाती है।  

इसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति को कुष्ठ रोग हुआ है तो स्पष्ट है कि उस रोगी कि प्रतिरक्षा शक्ति उस रोग के संक्रमण से शरीर की रक्षा कर पाने में असफल रही है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे- कीटाणुओं का संक्रमण, पाचनतंत्र की खराबी, दूषित खान-पान, धातुओं की दुष्टि आदि। अब यदि रोगी की चिकित्सा का उद्देश्य केवल रोग के कीटाणुओं को ही नष्ट करना मान लिया जाए तो रोग का संक्रमण पुनः होने की संभावना बनी रहेगी। चूंकि आयुर्वेद चिकित्सा का सिद्धान्त रोग के किटाणुओं को नष्ट करने के साथ साथ शरीर की जीवनीय शक्ति या प्रतिरक्षा शक्ति को भी सुदृढ़ बनाना तथा शरीर में आवश्यक तत्वों की कमी को भी दूर करने की शिक्षा देता है, इसलिए, न तो रोग के पुनः उत्पन्न होने की संभावना समाप्त हो जाती है, बल्कि अन्य रोगों की उत्पत्ति भी नहीं हो पाती। इसलिए स्पष्ट है कि आयुर्वेद चिकित्सा ही सर्वश्रेष्ठ, सच्ची एवं आदर्श चिकित्सा है।    

आचार्य डॉ0 मदन गोपाल वाजपेयी, बी0ए0 एम0 एस0, पी0 जीo इन पंचकर्माविद्यावारिधि (आयुर्वेद), एन0डी0, साहित्यायुर्वेदरत्न, एम0ए0(संस्कृत) एम0ए0(दर्शन), एल-एल0बी0।

 संपादक- चिकित्सा पल्लव

पूर्व उपाध्यक्ष भारतीय चिकित्सा परिषद् उ0 प्र0

संस्थापक आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम।

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