भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व किसने बढ़ाया!

भारत में जब से संघ परिवार और उसकी राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व बढ़ा है , अनेक बुद्धिजीवी निराशा में यह कहने लगे हैं कि इसके लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण जेपी ज़िम्मेदार हैं . इनका आरोप है कि जेपी ने संघ परिवार को राजनीतिक स्वीकार्यता दिलायी , जिससे संघ और भाजपा को प्रसार में मदद मिली. यह आरोप इसलिए लगाया जाता है कि जेपी ने जिस सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का नेतृत्व किया उसमें विद्यार्थी परिषद, जनसंघ और आरएसएस के लोग शामिल थे. 

याद दिलाना ज़रूरी है कि गुजरात और बिहार में महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी आदि के खिलाफ ऑंदोलन जेपी ने नहीं शुरू कराये थे . ये स्वत: स्फूर्त आंदोलन थे और विद्यार्थी परिषद समेत ग़ैर कॉंग्रेस राजनीतिक दलों के छात्र और युवा संगठन उसमें शामिल थे. पटना में अब्दुल गफ़ूर की कॉंग्रेस सरकार की बेवक़ूफ़ियों और ज़्यादतियों से परेशान होकर ये युवा ऑंदोलनकारी मार्गदर्शन और नेतृत्व के लिए जेपी के पास गये थे जिसे उन्होंने अपनी शर्तों पर स्वीकार किया था .

जेपी की पहली यह कि ऑंदोलन हर हाल में शांतिपूर्ण होगा और दूसरे उसका एजेंडा व्यापक व्यवस्था परिवर्तन का होगा।इसे  बाद में उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का नाम दिया. सम्पूर्ण क्रॉंति यह एजेंडा एक तरह से गॉंधी के ग्राम स्वराज और सर्वोदय का एजेंडा था . इसी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए जेपी ने अपने नायकत्व में निर्दलीय छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गठन किया . जेपी का यह सारा कार्यक्रम सर्व धर्म समभाव , समता  और सत्ता के विकेंद्रीकरण पर आधारित था , उसमें संघ के विचार का कोई अंश नहीं था.

जेपी एक समाजशास्त्री थे और वह विचार परिवर्तन में विश्वास करते थे। ज़मींदारों का हृदय परिवर्तन कर उनसे  भूदान करवाया गया और चम्बल के डाकुओं का हृदय परिवर्तन कर उन्हें मुख्य धारा में लाया गया. इसलिए जेपी तो संघ परिवार के कार्यकर्ताओं को गॉंधी के रास्ते पर लाने का प्रयोग कर रहे थे जो आरएसएस को अछूत मानकर नहीं हो सकता था . इसलिए जेपी ने उनके सम्मेलन को भी संबोधित किया.

जेपी एक समाजशास्त्री थे और वह विचार परिवर्तन में विश्वास करते थे। ज़मींदारों का हृदय परिवर्तन कर उनसे  भूदान करवाया गया और चम्बल के डाकुओं का हृदय परिवर्तन कर उन्हें मुख्य धारा में लाया गया. इसलिए जेपी तो संघ परिवार के कार्यकर्ताओं को गॉंधी के रास्ते पर लाने का प्रयोग कर रहे थे जो आरएसएस को अछूत मानकर नहीं हो सकता था . इसलिए जेपी ने उनके सम्मेलन को भी संबोधित किया.

किसी ज़माने में डा लोहिया ने ग़ैर कॉंग्रेस के सिद्धांत पर जनसंघ के साथ संविद सरकारें बनवायी थीं. तब भी जनसंघ हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर नहीं चल रहा था। 

जेपी तो प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से भी मिलने गये और पूरी कोशिश की कि वे बिहार ऑंदोलन की उचित माँगें मान लें . लेकिन इंदिरा गांधी उन दिनों सत्ता के अहंकार और बेटे संजय गॉंधी के प्रभाव में थी . चापलूसों से घिरी हुई थीं और गुप-चुप इमरजेंसी लगाने की तैयारी कर रही थीं . कम्युनिस्ट सोवियत रूस भी उन्हें इसी रास्ते पर ले जाने के लिए प्रेरित कर रहा था. इसलिए उन्होंने जेपी को अमेरिकी एजेंट तक कह  डाला। हालात ने अचानक नाटकीय मोड़ लिया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने  इंदिरा गाँधी का रायबरेली से लोक सभी चुनाव रद्द कर दिया और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें संसद में मताधिकार से वंचित रखा . उस समय भी जेपी ने केवल नैतिकता के नाते प्रधानमंत्री से त्यागपत्र मॉंगा . वह अपना ध्यान और ताक़त पूरी तरह बिहार में सम्पूर्ण क्रॉंति आंदोलन को सघन रूप से ज़मीनी सतह पर ले जाने में लगाना चाहते थे.

विपक्षी दलों के आग्रह  पर जेपी ने पचीस जून को रामलीला मैदान पर रैली को संबोधित किया जिसमें प्रधानमंत्री पर त्यागपत्र देने का दबाव बढ़ाने के लिए उनके निवास के बाहर सत्याग्रह का कार्यक्रम घोषित किया . इंदिरा गाँधी को बहाना मिल गया उसी रात इमरजेंसी लगाकर सारे विपक्षी नेताओं और ऑंदोलनकारियों को जेल में डालने और नागरिकों के मौलिक अधिकार ख़त्म करने का . संसद कठपुतली हो गयी और सुप्रीम कोर्ट ने सरेंडर कर दिया . यह जेपी का ही आत्मबल था कि मरणासन्न हालात में भी सारे विरोधी दलों का विलय कर जनता पार्टी बनवायी और आरएसएस की राजनीतिक शाखा जनसंघ  का अलग अस्तित्व ही समाप्त कर दिया. देश को स्थायी रूप से तानाशाही के रास्ते जाने से रोका।जनता पार्टी की जीत के बाद सांसदों से  गॉंधी समाधि राजघाट पर संकल्प करवाया.

गुनहगार हैं मोरारजी देसाई, चरण सिंह , जनजीवन राम , राज नारायण और चंद्रशेखर जो अपनी सत्ता-लिप्सा के चलते जनता पार्टी को एकजुट नहीं रख पाये और संघ को फिर से अपनी राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी बनाने का मौक़ा दिया. फिर भी यह जेपी का ही प्रभाव था कि भाजपा ने पहले गॉंधीवादी समाजवाद का रास्ता चुना.

 गुनहगार हैं मोरारजी देसाई, चरण सिंह , जनजीवन राम , राज नारायण और चंद्रशेखर जो अपनी सत्ता-लिप्सा के चलते जनता पार्टी को एकजुट नहीं रख पाये और संघ को फिर से अपनी राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी बनाने का मौक़ा दिया. फिर भी यह जेपी का ही प्रभाव था कि भाजपा ने पहले गॉंधीवादी समाजवाद का रास्ता चुना. 

भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक अभ्युदय के वास्तविक कारण हैं राजीव गांधी का राम मंदिर ऑंदोलन को ठीक से न सँभाल पाना , शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट जजमेंट को संसद से पलटना , वीपी सिंह का मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को बिना आम सहमति बनाये निजी राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना . मुलायम सिंह , वीपी सिंह और लालू यादव में मुस्लिम समुदाय को रिझाने की होड़ ने भी आरएसएस को हिन्दू समाज को अपनी तरफ़ खींचने में मदद की . मायावती को मुख्यमंत्री बनने की इतनी जल्दी थी कि कॉंशीराम ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़कर भाजपा से गँठजोड़ किया और गुजरात जाकर नरेंद्र मोदी का प्रचार किया . बिहार में नीतीश कुमार ने पुराने साथी लालू यादव को गच्चा देकर भाजपा के साथ सरकार चलायी. 

भाजपा को पूर्ण बहुमत से सत्ता में लाने का सर्वाधिक श्रेय अन्ना ऑंदोलन को दिया जा सकता है जिसमें शामिल लोगों की सूची बड़ी लंबी है. जो कॉंग्रेस पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुक़ाबला कर सकती थी , वह न केवल अपने पुराने राजनीतिक सिद्धान्त और कार्यक्रम से हट गयी , बल्कि सारी शक्ति परिवार में केंद्रित कर ली . कॉंग्रेस में ऑंतरिक लोकतंत्र की सॉंकेतिक बहाली  एक शुभ लक्षण है. अब देखना यह है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से कॉंग्रेस को कितनी राजनीतिक ताक़त मिलती है. कोई क्षेत्रीय दल अकेले या उनका गँठजोड अब भाजपा का मुक़ाबला नहीं कर सकता।

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