जब राजीव गांधी से मिला

राजीव गांधी से त्रिलोक दीप जी की पहली मुलाकात स्मरणीय थी। और दूसरी मुलाकात भी तय थी लेकिन उनकी हत्या हो गयी और एक टीस दे गयी।

मैं जानता हूं कि कुछ लोगों को पुराने संस्मरणों से विरक्ति हो सकती है, कुछ की उनमें कतई दिलचस्पी नहीं, कुछ इसे समय की बरबादी भी मानते होंगे लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘समझनी है ज़िंदगी तो पीछे देखें।’

राजीव गांधी
त्रिलोक दीप, वरिष्ठ पत्रकार

‘आज जिस तरह के लोकतंत्र में आप खुली सांस ले रहे हैं उसके पीछे बहुत कुर्बानियां दी गयी हैं।

अगर अतीत की नींव पुख्ता न होती तो आज हम विश्व के विराट और विशाल लोकतंत्र कैसे कहलाते।

न जाने मैं असली मुद्दे से कैसे और क्यों कर भटक गया।

हां, 20, अकबर रोड से फ़ोन पर एक न्योता था शाम को लोक सभा अध्यक्ष डॉ.बलराम जाखड़  के यहां चाय पीने को।

मैं इसका कारण या प्रयोजन पूछ सकूं फ़ोन रख दिया गया, ज़ाहिर है किसी दूसरे को न्योतने के लिए। यह बात होगी 1986-87 की।

तब बलराम जाखड़ लोक सभा के अध्यक्ष थे। उनसे मैं अक्सर मिलता रहता था।

सरदार हुकम सिंह के बाद मैं पहली बार 1980 में 20, अकबर रोड में दाखिल हुआ था यानी पंद्रह साल बाद ।

‘दिनमान ‘में छापने के लिए कुछ न कुछ जानकारी जाखड़ साहब से मिल जाया करती थी।
जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब भी लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ को ही बनाया गया।

निजी तौर पर भी राजीव गांधी जाखड़ साहब की बहुत इज़्ज़त करते थे।

एक दिन मैंने जाखड़ साहब से निवेदन किया कि जब कभी भी राजीव जी को आप अपने यहां बुलाएं या वे खुद आएं तो मुझे भी मिलवा दीजिएगा।

मैं उनसे यह आग्रह करके भूल गया था लेकिन जाखड़ साहब नहीं भूले थे।

मैं जब 20, अकबर रोड पहुंचा तो देखा आज सुरक्षा व्यवस्था कुछ ज़्यादा थी । पूछने पर पता चला कि पीएम आ रहे हैं।

भीतर जाकर मैं जाखड़ साहब से मिला। उन्होंने कहा कि आज तुम्हारी राजीव गांधी से मुलाकात कराऊंगा।

लगे हाथ एकाध सवाल भी पूछ लेना। मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगा।

जब राजीवजी आये तो कुछ लोग उनके निकट जाने को उतावले दिखे लेकिन सुरक्षा अधिकारियों ने इसकी इज़ाजत नहीं दी।

मैं जाखड़ साहब  के साथ गया। राजीवजी से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि यह त्रिलोक दीप है, मेरे छोटे भाई जैसा।

इस समय दिनमान में काम करता है । इसका आपसे एक छोटा सा सवाल है।

मैंने उस समय राजीव गांधी से पूछा था कि इस समय आपकी pet योजना क्या है ।

उनका उत्तर था संचार व्यवस्था को अति आधुनिक बना कर आईटी को प्रभावशाली बनाना।

यदि हमारी आईटी मजबूत नहीं होगी तो दुनिया के साथ हम कंधे से कंधा मिलाकर कैसे चल पायेंगे ।

लेकिन हमारे यहां बिजली की स्थिति तो लचर है, उस दिशा में भी तेज़ी से काम हो रहा है कहते हुए राजीव जी बलराम जाखड़ के साथ और लोगों से मिलने के लिए चल दिये।

मैंने ‘दिनमान ‘में इसे राजीव गांधी से संक्षिप्त भेंट के शीर्षक के तहत छापा था जिसे आप चाहें तो एक्सक्लूसिव कह सकते हैं।

1989 में उनकी पार्टी के चुनाव हार जाने के बाद भी उनसे मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा।

इस बीच मैं दिनमान छोड़ कर ‘संडे मेल’में आ गया लेकिन हमारी मुलाकातें जारी रहीं।

1989 में जनमोर्चा के नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस को पराजित कर लोकसभा का चुनाव तो जीत गये लेकिन वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मात्र 341 दिन ही बैठ पाये।

उनकी पार्टी में भी जनता पार्टी की तरह फूट पड़ गयी और टूट गयी।

उनके स्थान पर कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने पर कांग्रेस के समर्थन वापसी के कारण वे भी मात्र 224 दिनों तक ही प्रधानमंत्री रहे।

चंद्रशेखर कभी कांग्रेस पार्टी में ‘युवा तुर्क ‘के तौर पर जाने जाते थे।

दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही कभी कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता हुआ करते थे ।

कुल मिला कर दोनों प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल महज़ 565 दिनों का रहा जो डेढ़ साल से भी दस बारह दिन कम था ।

आखिरकार मई,1991 में लोकसभा के लिए नए चुनाव हुए । राजीव गांधी के सामने यह एक बड़ी चुनौती थी । उन्होंने देश का धुआंधार दौरा किया ।

उन्होंने  कुछ वैसी ही रणनीति अपनाई जैसी उनकी माँ इंदिरा गांधी ने जनता पार्टी की सरकार की विफलता के बाद 1980 के चुनाव में अपनाई थी जो कामयाब साबित हुई थी ।

 17 या 18 मई, 1991 को  हैदराबाद में  मैं अपने स्थानीय पत्रकार मित्र एम.ए. माजिद के साथ देर रात की एक सार्वजनिक सभा में गया।

 उन्होंने उस जनसभा के बाद राजीव गांधी से मिलने का समय तय कर रखा था।

जनसभा बहुत ही कामयाब रही थी जो रात 12 बजे के बाद खत्म हुई ।

वादे के मुताबिक राजीव गांधी जब आये तो उन्होंने मुझे  तुरंत पहचान लिया।

बोले, आप कैसे। मैंने कहा कि आपकी जनसभा देखने आया था। मैंने उनसे ही पूछा कैसा चल रहा चुनाव प्रचार।

उत्तर तो आपके सामने है। बाहर भीड़ की तरफ उन्होंने  इशारा करते हुए कहा।

जब आधी रात के बाद तक लोग मुझे देखने और सुनने का इन्तज़ार कर सकते हैं तो उनकी सोच और मूड  को सहज ही भांपा जा सकता है। आपका फ़ीडबैक क्या है।

जवाब में राजीव गांधी ने बताया था कि मैं यह दावा तो नहीं करता कि हमें चार सौ सीटें मिलेंगी लेकिन हां मैं कांग्रेस के पूर्ण बहुमत के बारे में आश्वस्त हूं।

उस मुद्दे का क्या और कितना असर है जिसे बनाकर राजा साहब (वी. पी. सिंह)  ने पहले कांग्रेस छोड़ी और बाद में जनमोर्चा बना कर चुनाव जीता था, राजीव गांधी ने बड़े ही सहज भाव से बताया था कि मुझे लगता है  कि आज न तो किसी को वह मुद्दा याद है और न ही कहीं उसका ज़िक्र ही हो रहा है ।

रात का एक बज रहा था राजीव गांधी ने खुद ही सलाह दी कि 21 मई को बंगलुरू आ जाना, वहां और खुल कर बात हो जायेगी।

उन्होँने अपने उस समय के मीडिया सलाहकार सुमन दुबे को भी हमारी 21 मई की मीटिंग की जानकारी दे दी।

मुझे एम. ए . माजिद (वर्तमान में भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य)  ने मेरे होटल कृष्णा ओबेराय (अब कृष्णा ताज) में छोड़ दिया और वे अपने घर चले गये।

राजीव गांधी की चुनावी सभा और उनके साथ हुई एक्सक्लुसिव बातचीत ‘संडे मेल’ के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी।

रात को नींद आ नहीं रही थी लिहाज़ा कहीं सुबह तक कोई पॉइंट भूल न जाऊं इसलिए मैंने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली।

अगले दिन सवेरे ही फ़ोन करके माजिद साहब (उन दिनों वे उर्दू दैनिक ‘सियासत’ में कार्यरत थे) से बात कर उनसे भी तमाम मुद्दों पर चर्चा की और फिर अपनी स्टोरी पुख्ता करने के बाद नीचे नाश्ता करने के लिए गया।

लॉबी में सुमन दुबे मिल गये। उन्होंने  बताया कि वे भी इसी होटल में ठहरे हैं।

उनसे यह भी पता चला कि बॉस जल्दी ही निकल गये हैं और 21 मई को बंगलुरू में आपसे मुलाकात कराने का निर्देश भी दे गये हैं।

मैंने सुमन जी से अपनी उस पहली  मुलाकात का ज़िक्र भी किया जो तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद  के घर पर हुई थी। उस समय वे ‘इंडिया टुडे ‘में थे और मैं ‘दिनमान ‘ में ।

मैं 20 मई, 1991को बंगलुरू पहुंच गया और विंडसोर मैनोर होटल में रुका । उस समय वहां के जनरल मैनेजर थे नकुल आनंद।

पहले दिन ही उनसे मुलाकात कर वहां आने का उद्देश्य  बताया।

नकुल बहुत बेहतरीन और मददगार इंसान थे । वे राजीव गांधी के कल के प्रोग्राम से भी वाक़िफ थे।

उन्होंने बताया कुछ और लोग देर रात या अलसुबह आने वाले हैं।

मैंने श्रीकांत पाराशर को फ़ोन करके बंगलुरू पहुंचने और अपने ठौर की खबर दे दी।

श्रीकांत पाराशर उन दिनों ‘संडे मेल’ के लिए कर्नाटक कवर किया करते थे और मैं उन्हें ‘दिनमान’के दिनों से जानता था।

वहां भी कर्नाटक से वे समाचार भेजते रहते थे ।उन्होंने सुबह होटल में मिलने का वादा किया तथा राजीव गांधी के पूरे कार्यक्रम की जानकारी भी एकत्र कर ली।

श्रीकांत को राजीव से विशेष मुलाकात बाबत भी बता दिया। बंगलुरू में श्रीकांत पाराशर मेरे वैसे ही मददगार थे जैसे हैदराबाद में एम. ए .माजिद।

कल की तैयारियां कर मैं रात को सोने के लिए चला गया।

सुबह-सुबह नकुल आनंद ने फ़ोन किया और कहा कि आपके लिए बुरी खबर है।

तमिलनाडु में राजीव गांधी की हत्या हो गयी है। मेरे हाथ-पांव फूल गये। इतने में श्रीकांत पाराशर पहुंच गये, इंडियन एक्सप्रेस के अजय सिन्हा तथा और कई पत्रकार भी आ गये। हम लोग सभी विधान सौध गये जहां सभी गमगीन चेहरे नज़र आये।

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