सनातन धर्म क्या है?

आज का वेद चिंतन

संत विनोबा

 विचार अचित्तं ब्रह्म .नौजवानों को वह ब्रह्म अच्छा लगता है, जिसका चिंतन कभी किसी ने न किया हो। जिसका चिंतन पहले हुआ है ,उसका आकर्षण नहीं होता है । यदि जीर्ण  ब्रह्म युवकों के समक्ष रखा जाए, तो उसके ब्रह्म होने के बावजूद नई पीढ़ी को उसका कुछ भी आकर्षण नहीं हो सकता।

यह युवकों का दोष नहीं माना जाएगा। उन्हें नवीन कल्पना चाहिए। उचित भी है। नये आदमी है, पुरानी कल्पना से उन्हें कैसे संतोष होगा? इसलिए समाज में तत्व प्रकट होना चाहिए।

परन्तु इस संसार में एकदम नया क्या है ? सनातन  सत्य पुराने ही होते हैं।परंतु ये नया रूप ,नया वेश धारण करके आ सकते हँ और इस प्रकार वे नए बन जाते हँ।

नव रूप धारिणी शक्ति ही सनातन सत्य की सनातनता है। इसी में वे चिरस्थायी बनते है। यासकाचार्य ने सनातन धर्म की व्याख्या की है – सनातनो नित्यनूतन: — जो नित्य नया रूप धारण कर सके वह सनातन धर्म है।

आज तो सनातन धर्म यानी पुराना धर्म माना जाता है। परंतु जो धर्म पुराना ही रूप रखना चाहता है ,वह सनातन धर्म नहीं कहा जा सकता। सनातन धर्म का अर्थ है ,अद्यतन धर्म , आज का धर्म। जिसमें आज के जमाने का रूप और तेज हो, वह युगधर्म ही सनातन धर्म है।

 

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