कांग्रेस का कसूर क्या है

पंकज चौधरी

कांग्रेस पार्टी अब बेहद ही शर्मनाक दौर से गुजर रही है। क्षेत्रीय पार्टियाँ अब खुलकर बोलने लगी हैं कि कांग्रेस एक बोझ है, गठबंधन के भागते पैर की जंजीर है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता शिवानंद तिवारी ने तो सीधे सीधे कांग्रेस के शिखर नेतृत्व को निशाने पर लेते हुए कहा कि राहुल और प्रियंका “पिकनिक पालिटिक्स“ करते हैं। शिवानंद के बयान पर भाजपा वाले चटकारे लेने लगे। जवाब में सबसे पहले कांग्रेस नेता प्रेंमचंद्र मिश्रा मैदान में कूदे। उन्होंने राजद नेतृत्व को बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि पार्टी शिवानंद को भाजपा की भाषा बोलने से रोके। बहरहाल नाराज कांग्रेस को राजद के शीर्ष नेता मनोज झा ने समझाया-बुझाया कि वो शिवानंद के निजी विचार हैं और इससे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है।

लेकिन बात यहीं थम नहीं रही। शिवानंद तिवारी के शब्द बाण से तिलमिलाई कांग्रेस के जख्म पर तैयार बैठे कपिल सिब्बल ने नमक छिड़क दिया। सिब्बल ने तो पार्टी नेतृत्व पर ही सवाल उठा दिए फिर कपिल सिब्बल के विरोध में कई नेता कूद पड़े। उन्हें तरह तरह की नसीहतें दी जाने लगी। कुल मिलाकर कांग्रेस में दो फाड़ साफ दिखाई दे रहा है।

लेकिन नाम न उजागर करने की शर्त पर कांग्रेस के कई दिग्गज नेता कह रहे हैं कि अब समय आ गया है जब दोनो भाई-बहन (राहुल और प्रियंका गाँधी) को पिकनिक पालिटिक्स छोड़कर 365X24X7 के मोड में आना चाहिए। और अब पार्टी को मुद्दों की बजाय संगठन पर ज्यादा ध्यान देना होगा। संगठन को सिर्फ मजबूत ही नहीं बल्कि विस्तार भी देना होगा क्योंकि पार्टी कई राज्यों में मरणासन्न स्थिति में है। बिहार के ही एक बड़े नेता ने कहा कि प्रियंका गाँधी कम से कम उत्तर प्रदेश से सटे इलाकों में तो चुनाव प्रचार कर ही सकती थीं।

बहरहाल, बिहार चुनाव के नतीजों का निष्पक्ष विश्लेषण तो होना ही चाहिए। तेजस्वी यादव की जनसभाओं में उमड़ रही भीड़ से राजद के नेता काफी गदगद थे। उन्होंने ये मान लिया कि अब उनका ही राजतिलक होना है। यही उनकी सबसे बड़ी गलती थी। इस पूरे प्रचार के दौरान राजद ने डिजिटल कैंपेनिंग को बिल्कुल ही नज़रअंदाज कर दिया। इसके उलट दूसरे और तीसरे दौर के मतदान से पहले भाजपा ने फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया पर कैंपेनिंग की झड़ी लगा दी। पहले दौर के मतदान के बाद एनडीए गठबंधन को ये एहसास हो गया था कि अगर उन्होंने कमर नहीं कसा तो ये चुनाव उनके हाथों से निकल जाएगा। वहीं राजद को लग रहा था कि अब ये चुनाव उनकी गिरफ्त में आ गया है।

इतना ही नहीं 144 सीटों पर लड़ने वाली राजद के टीम से ये तो उम्मीद थी ही कि कम से कम वो सौ सीट पर जीत हासिल करेगी। लेकिन राजद सिर्फ 75 सीट पर ही सिमट गई। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि राजद करीबन 25 सीटों पर पिछड़ गई जहाँ उसे जीत हासिल करनी चाहिए थी। और ये भी हकीकत है कि 2015 के मुकाबले इस बार राजद का प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा।

अब अगर कांग्रेस की बात करें तो ये कहा जा सकता है कि कांग्रेस चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। वो चाहती है कि अधिक से अधिक सीटों पर लड़कर वो जनता को ये एहसास दिलाए कि वो अभी जिंदा है। जिन 70 सीटों पर कांग्रेस लड़ रही थी वो हमेशा से एनडीए गठबंबंधन का गढ़ रहा है। महागठबंधन के चुनावी रणनीतिकार भी ये मान रहे थे कि कांग्रेस अधिक से अधिक 20 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकती है। सदाकत आश्रम के सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस सिर्फ 40 सीटों पर ही गंभीरता से लड़ रही थी…. बाकी के 30 सीटों पर तो वो सिर्फ अपनी उपस्थिति ही दर्ज करा रही थी। नतीजतन …कांग्रेस की सुई 19 पर अटक गई।

अब एक बार इन 70 सीटों के इतिहास पर भी नजर डालें। साल 2010 के चुनाव में जब भाजपा और जदयू साथ साथ चुनाव लड़ रहे थे तो उस समय दोनों पार्टियों ने इन 70 सीटों में 65 पर कब्जा जमाया था। भाजपा ने 36 सीटों पर चुनाव लड़कर 33 पर अपना परचम लहराया था तो जदयू का स्कोर 34 में 32 था। इसी तरह 2019 के लोक सभा चुनाव में भाजपा और जदयू ने मिलकर इन 70 सीटों में से 67 सीट पर कब्जा जमाया था। भाजपा ने 26 में 25 और जदयू ने 32 में 28 सीटों पर अपना हक जताया था।

यही नहीं, 2015 में जब भाजपा का जदयू के साथ गठबंधन नहीं था तब भी भाजपा अकेले ही इन 70 सीटों में से 24 सीटों पर अपनी जीत दर्ज की थी। इसलिए ये कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि इन सीटों पर एनडीए का वर्चस्व रहा और यहाँ चुनाव लड़कर कांग्रेस सिर्फ बलि का बकड़ा ही बनी। महागठबंधन के सूत्रों के मुताबिक, दरअसल इन सीटों पर न तो राजद लड़ने को इच्छुक थी और न ही वामपंथी। दरअसल, राजद जिन जिन सीटों पर लड़ी वो निस्संदेह महागठबंधन के लिए आसान सीट थे और परंपरागत रूप से राजद का गढ़ माने जाते हैं। फिर भी वो 144 सीटों में महज 75 पर ही काबिज हो पाई।

इतना ही नहीं , कांग्रेस को असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से भी सीमांचल में काफी नुकसान उठाना पड़ा। कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक में ओवैसी ने जबरदस्त सेंध लगाया। पाँच सीटों के नुकसान से ये कहा जा सकता है कि महागठबंधन अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाई। लेकिन ये कहना कि महागठबंधन सरकार इसलिए नहीं बना पाई क्योंकि कांग्रेस फिसड्डी साबित हुई, बिल्कुल ही तर्कसंगत नहीं है।

बहरहाल, बिहार चुनाव के नतीजों ने ये संकेत दिए हैं कि अब कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति में काफी कम स्पेस मिलने वाला है। उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी ने तो ये एलान भी कर दिया है कि वो किसी राष्ट्रीय पार्टी के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेगी। पश्चिम बंगाल से भी कुछ ऐसे ही संकेत सामने आ रहे है। इसलिए कांग्रेस के पास ये एक मौका है कि वो अपने सांगठनिक संरचनाओं को दुरूस्त करे। और इसमें कांग्रेस को किसी तरह की मुश्किलात का सामना भी नहीं करना पड़ेगा क्योंकि यही एक पार्टी है जिसके समर्थक सारे देश में हैं। जरूरत सिर्फ उनको जोड़ने की है।

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