देवता रूठ रहे हैं, उन्हें मनाना है

शिव कुमार, भारतीय जनता पार्टी, दिल्ली 

अजगर करे ना चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम ! 

राम झरोखे बैठ के सब का मुजरा लेत । जैसी जाकी चाकरी वैसा वाको देत

कबीर खड़ा बजार में सबकी मनावे खैर । ना काहू। से दोस्ती न काहू से बैर ।।.

आज इस युग में ऐसे संतों  का मिलना जो दूसरों की खैर मनाता है, मुश्किल ही नही असंभव है ।

21 जून के सूर्य ग्रहण की सालभर से चर्चा थी, की कुछ भयंकर होगा, भयंकर होगा ।ग्रहण के पूर्व से ही, आज सारी दुनिया कष्ट में है ।चाहे रशिया हो, स्पेन हो, इंग्लैंड हो, यूरोपीयन देश हो सब एक गंभीर भूचाल के चक्रव्यूह में फंसे है ।भूचाल एक खगोलीय प्रक्रिया है, उसके प्रभाव से कहीं अति वृष्टि, कहीं सूखा, कहीं असाध्य रोग है ।21 जून से पूर्व ही हिन्दुस्तान और चाइना के आपसी टकराव  यहाँ तक  आ गया कि कहीं युद्ध की स्थिति ना आ जाए ।

कैसा विकट समय है कि हम अपने अपने आराध्यों को अर्ध नहीं चढ़ा सकते ।देश के चौथे कौने में जगत के नाथ, जगन्नाथ जिनकी हर साल शोभा यात्रा बलभद्र, सुभद्रा, सुदर्शन चक्र 15 दिन के विश्राम पर जाते थे, आज उस पर भी शर्तें  लगी हैं ।ये आराध्य का दोष नही, हमारे कर्मों का फल है.हर मोहल्ले, हर चौराहे, हर नगर, हर प्रान्त, ज्योतिषियों की भरमार है। 

आज सारी दुनिया में भूकंप से पृथ्वी चलायमान हो चुकी है । दिल्ली, गुड़गांव, गाज़ियाबाद, गुजरात, यहाँ इन्हीं  दिनों में कई बार धरती काँपी  है । उत्तराखंड की प्रसिद्ध चारधाम की यात्रा जहाँ पहले लोग अपनी, अंतिम इच्छा पूरी करने जाते थे ।आज  पट  बंद पड़े हैं. 

15-15, 20-20 हेलीकॉप्टर खड़े रहते है ।क्योंकि सैरगाह बन गए है हमारे पूजनीय स्थल, और ये वहाँ के पहाड़, नदियां, उत्तराखंड की जलवायु सब पर प्रभाव डालते है ।दर्शन नहीं, प्रदर्शन के लिए जाते हैं ।देवता के सामने, नतमस्तक होकर जाया जाता है, ना कि तिलक, और रंग बिरंगे दुपट्टे डालकर अपनी प्रभुता प्रगट करते है ।

उत्तराखण्ड की भूमि, देवों की भूमि, सारे देव अंततोगत्वा यहीं विराजे है , चाहे, उत्तराखंड के गाँव की मेड पर  बना हुआ देव हो चाहे बद्रीकाश्रम हो, केदारनाथ हो, ऐसी भूमि, जहाँ गंगा, मंदाकिनी का संगम हो उस देश मे पानी की कमी क्यों ? 

जब पृथ्वी पर भार पड़ता है अत्याचार, अनाचार बढ़ता है तब देव रूठते है, कोई ना कोई दुर्भिक्ष संसार में फैलता है । आज भी वही स्थिति है भारत बड़ा भूभाग है, कभी सोने की चिड़िया कहलाता था । इसलिए गजनवी अफगानिस्तान की छोटी से ढाणी से हिन्दुस्तान पहुँच गया औऱ इस लालच में कई बार आक्रमण किये । गजनी तो निमित्त  मात्र था, उसके रास्ते मे  लालची लोग मिलते गए वो उनसे अपना कार्य करता रहा.

आज भी देश मे सोने की कमी नही है । मंदिरों में, मस्जिदों में, मठो मैं टनो मन सोना पड़ा है, इसका राष्ट्र निर्माण में उपयोग हो ।प्रधानमंत्री केयर फण्ड में जितना भी दान दिया जा सके वो इस समय कम होगा, क्योँकि देश संकटों में घिरा है कोरोना, चाइना से तकरार, अर्थव्यवस्था सबसे निचले स्तर पर है लोगो को काम नही. रोजगार नही । फैक्टरियों के उत्पादन कम होते जा र्है । ऐसे स्थिति में विरोध पक्ष द्वारा  छिद्रान्वेषण करना हर मामले में प्रधानमंत्री को घसीटना ।लड़ाई चाइना से पहले भी हुई थी और उस समय के प्रधानमंत्री  हिंदी चीनी भाई भाई के नारे लगाती थी । पंचशील के सिद्धान्त की जय जयकार थी। 1962 और 2020 के बीच गंगा का बहुत पानी बह चुका, चीन को अपनी लक्ष्मण रेखा में ही रहना चाहिए । इतनी सब विपत्तियों के बावजूद भी हमारे प्रधानमंत्री ना डरे, ना हिचकिचाये । तुर्की पे तुर्की का जवाब । इतनी सम विषम परिस्थितियों  के होते हुए भी हमारे प्रधानमंत्री डटे है और सभी परिस्थितियों का डटकर सामना कर रहे है और उनका हल निकाल रहे हैं । 

जैसा मैंने पूर्व में कहा कि देव रूठ रहे हैं, उन्हें मनाना है, कैसे, गीता में श्री कृष्ण ने कर्म की व्याख्या की अपने कर्म पर चलते रहो, फल की इच्छा मत करो । फिर किसी ने पूछ ही लिया भगवन जब फल की इच्छा ही नही है तो कर्म की क्या जरूरत ।  तो कृष्ण ने बड़ा सुंदर उत्तर दिया मामेकम  शरणं व्रज  । मेरी शरण हो जा, सब ठीक हो जायेगा, भगवान ही तो रूठे हैं , उनको मनाना है ।उनको मनाने के लिए पुनः भारत की प्रभुता अखंडता को स्थापित करना होगा। वो सरकार या प्रशासन नही कर सकता, हम कर सकते है, हमें अब हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सोचना होगा. अगर अब भी नही संभले तो विकराल परिस्थितियां पैदा हो जाएगी।

नोट : लेखक लम्बे समय तक पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोगी रहे हैं. 

 

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