जीवन को नए तरीके से जीने का अंदाज़

एक महामारी से चारों और निराशा घिरी हुई है पर हर अंधेरी रात के बाद एक नया सवेरा होता है, चिड़िया चहचहाती हैं और कोपल से नए फूल निकल आते हैं । Soulify परिवार हमें जीवन को नए तरीके से जीने का अंदाज़ दिखाता है, पूरे जीवन बंदिशों में बंध जीने से अच्छा है कि हम इनकी तरह पूरी दुनिया को अपना घर समझ इसे जानें और नया सीखते रहें।उत्तराखंड से हिमांशु जोशी का लेख.

दुनिया में हर किसी का मुख्यतः एक ही सपना होता है। पैदा होने के बाद पारम्परिक शिक्षा ग्रहण करते हुए बड़ा होना और फिर अच्छी आजीविका/ नौकरी प्राप्त कर समाज में यश प्राप्ति करते हुए आगे बढ़ना। अंत में अपने परिवार के लिए बहुत सा धन छोड़ इस दुनिया से चले जाना।

क्या हम अपने ही समाज के बने इसी ढांचे पर ढल गए हैं जहां उपभोक्ता संस्कृति ही जीवन में सफलता का पैमाना है। हम मीडिया के माध्यम से समाज के सबसे अमीर लोगों को देख उनके जैसा बनने के सपने बुनते-बुनते अपना जीवन निकाल देते हैं और हम जो वास्तव में हैं उसे कहीं खो देते हैं।
Soulify.org.in यह सिर्फ़ खुद को खोजने वाली वाली वेबसाइट नही है, यह कहानी है ऐसे परिवार की जिसने खुद को समझा और अपना एक अलग रास्ता चुना।
                           Soulify दम्पति


स्मृति राज का जन्म पटना निवासी जयंत प्रसाद साह और कंचन माला के घर में हुआ। पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर जयंत प्रसाद ने अपनी बेटी को बचपन से ही कॉन्वेंट स्कूल में शिक्षा दी जिसकी वजह से स्मृति ने बचपन से ही बड़े सपने देखने शुरू कर दिए थे। यही सपने बड़े होने पर उन्हें मुंबई खींच कर ले गए।

वहीं सिद्धार्थ मस्केरी का जन्म मुंबई में ही हुआ था और उनके पिता प्रमोद मस्केरी बैंक ऑफ इंडिया में और माता शर्दिनी ‘किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल एल्फिंस्टोन, मुंबई’ की एक पुरस्कार विजेता नर्स थी। सिद्धार्थ का बचपन अपने पिता की नौकरी की वजह से लंदन और हांगकांग जैसे शहरों में गुजरा फिर वापस उनका परिवार मुंबई आ गया।
सिद्धार्थ को शुरू से ही कहानी लिखना पसन्द था पर उनके माता-पिता को यह पसन्द नही था इसलिए सिद्धार्थ ने पढ़ाई के लिए माइक्रोबायोलॉजी को चुना पर वह खुद ही एनिमेशन सीखने लगे और उसे पढ़ाते भी थे।स्मृति ने भी ग्राफिक डिजाइन की पढ़ाई के लिए मुंबई स्थित सी-डैक को चुना।

        सी-डैक मुुंबई (फ़ोटो साभार सी-डैक वेबसाइट)
इस बीच ही सिद्धार्थ और स्मृति की एक पारस्परिक मित्र ने स्मृति का परिचय सिद्धार्थ से कराया ताकि खुद से एनिमेशन सीख और पढ़ा रहे सिद्धार्थ से स्मृति कुछ नया सीख सके।

इस बीच सिद्धार्थ सी-डैक में पढ़ाने लगे और स्मृति वेब डिजाइनिंग का काम करने लगी।स्मृति और सिद्धार्थ उत्साही स्वभाव के थे और हमेशा ही कुछ नया करना चाहते थे। किसी जगह नौकरी के बजाए इन दोनों को उद्यमिता पर ज्यादा भरोसा था। अपनी इसी समानता की वज़ह से दोनो करीब आते गए और लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगे।
स्मृति के घरवाले इस रिश्ते के खिलाफ नही थे पर सिद्धार्थ के घर में उस समय मुंबई में मीडिया द्वारा बिहारियों को लेकर बनाई गई नकारात्मक छवि की वजह से इस रिश्ते को लेकर डर था। साल 2002 में अपनी माँ की मृत्यु के बाद 2003 में सिद्धार्थ दिवाली के दौरान जनरल टिकट पर स्मृति के घरवालों से मिलने मुंबई से बिहार पहुंचे थे।
वर्ष 2004 में विश्व सामाजिक मंच की चौथी बैठक मुंबई में हुई थी।  मुख्य तौर पर ट्रेड यूनियन, ग़ैर सरकारी संगठनों और वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं वाले इस विश्व सामाजिक मंच के पीछे की सोच आर्थिक वैश्वीकरण का विरोध करने वाले एक अंतरराष्ट्रीय मंच की है।

         विश्व समाजिक मंच मुंबई 2004- फ़ोटो साभार                                   yachana.org
स्मृति हमेशा से यह सोचती थी कि हम उपभोगवादी समाज में रहते हैं और हमेशा अपना फायदा-नुकसान देखते रहते हैं। समाज में महंगे ब्रांडेड कपड़े पहनना, अच्छा खाना खाते दूसरे को दिखाना, हम सब समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए यह कार्य क्यों करते हैं। कभी-कभी उन्हें लगता था कि वह गलत हैं और समाज सही है।विश्व सामाजिक मंच में जाकर उन्हें लगा कि वह सही हैं और उनकी सोच की तरह सोचने वाले दुनिया में और लोग भी हैं।वहां उनकी मुलाकात मंजुल भारद्वाज से हुई। “थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज वह थिएटर शख्सियत हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने रंग विचार “थिएटर आफ रेलेवेंस” के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं। स्मृति ने वहां मंजुल के चाइल्ड थियेटर वर्कशॉप को देखा, यह उनके लिए कुछ नया सीखने और खुद को खोजने का अवसर था।
स्मृति सोचती थी कि हम जो शिक्षा अपने बच्चों को दे रहे हैं उसमें व्यक्तित्व निर्माण की जगह कहां है। 
हमारे बच्चे ऐसे बच्चों के साथ क्यों बड़े नही होते जो आम बच्चों से अलग हैं। क्यों ऐसे बच्चे जो चल नही सकते , देख नही सकते उन्हें और आम बच्चों को बचपन से ही अलग- अलग रखा जाता है, उन्हें समाज क्यों छुपाने की कोशिश करता है।
स्मृति ने कमाठीपुरा में नाटक का मंचन किया जहां एड्स जैसी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त बच्चे रहते हैं। उन्होंने ‘पॉपुलेशन फर्स्ट‘ नाम की संस्था द्वारा कन्या भ्रूण हत्या पर चलाई जा रही मुहिम के अंतर्गत मुंबई के मशहुर ‘टाटा थियेटर’ पर नाटक का मंचन किया।जैसे गांधी जी ने राजा हरिश्चंद्र का नाटक देख कर सत्य और अहिंसा पर चलने की प्रेरणा ली थी, ठीक वैसे ही स्मृति भी अपने नाटकों के माध्यम से अपने दिखावे के मुखोटे उतार लोगों को प्रेरणा देना चाहती थी।
यह नाटक का काम चल तो रहा था पर इससे आजीविका नही होती थी और घरवालों के दबाब में फिर स्मृति ने एडवरटाइजिंग, पब्लिकेशन का काम किया और मुंबई की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में खो गई।
धीरे- धीरे उन्हें यह महसूस होने लगा कि वह फिर मुखोटे में जीने लगी हैं और खुद से ज्यादा झूठ नही बोल सकती।
इस बीच सिद्धार्थ कला से जुड़े बहुत से प्रतिष्ठित संस्थानों में काम कर रहे थे। वह बॉलीवुड के मशहूर फ़िल्म निर्माता और निर्देशक सुभाष घई के विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म संस्थान ‘व्हिस्टलिंग वुड्स इंटरनेशनल’ में पढ़ाते थे। उन्होंने मुंबई के ऐतिहासिक फ़ेमस स्टूडियो और वैभव स्टूडियो के साथ भी काम किया। वह बॉलीवुड फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’ और ‘मस्ती एक्सप्रेस’ के साथ जुड़े थे। उनकी एनिमेटेड सीरीज़ ‘एनको द एस्किमो- ए किड्स’ कार्टून नेटवर्क यूएसए के बैनर तले निर्माणाधीन है। जिसमें वह ‘एमी’ मनोनीत लेखक माइक ब्लम के साथ सह निर्माता हैं।उन्हें साल 2012 में अपनी कहानी ‘द पिकल कार एडवेंचर’ को ‘एनेसी फेस्टिवल‘में साझा करने के लिए फ्रेंच एम्बेसी द्वारा प्रायोजित किया गया था।
सिद्धार्थ को पटना स्थित बिहार संग्रहालय बनाने वाली टीम में भी जगह मिली।  यह संग्रहालय पूरी दुनिया में भारतीय कला के सबसे समृद्ध संग्रह में से एक के विश्व स्तरीय प्रदर्शन का अनुभव करने के लिए एक जगह है।
स्मृति की तरह ही अच्छी जगह काम करने और ऊंचा वेतन पाने के बाद भी सिद्धार्थ अपनी नौकरियों से संतुष्ट नही थे क्योंकि उनका सपना अपनी कहानी पर काम करने का था।
दिसम्बर 2006 में स्मृति की नानी के मंत्रों के बीच दोनों की कोर्ट में शादी हुई और सिद्धार्थ के पिता की जिद पर बाद में मुंबई में ही शादी का रिसेप्शन दिया गया।

                         स्मृति और अद्वैत
6 अगस्त 2009 में स्मृति और सिद्धार्थ के पुत्र अद्वैत का जन्म हुआ। यहां से यह दम्पति सोचने लगा कि उन्हें अपने बेटे की छवि एक लड़के और लड़की से दूर एक इंसान के रूप में बनानी है। उन दोनों में अब राजनीतिक और सामाजिक सोच की जगह आध्यात्मिक सोच बढ़ने लगी।
मस्केरी दम्पत्ति ने अद्वैत को ‘वाल्डोर्फ प्रणाली’ की शिक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया। यहां पर स्मृति का थिएटर वाला अनुभव काम कर रहा था। उन्हें यह लगता था कि जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो हम उसे जबर्दस्ती पेन पकड़ा देते हैं और हम उसके विकास के अनुक्रम को जबर्दस्ती प्रभावित करने लगते हैं।वाल्डोर्फ प्रणाली के जनक रुडोल्फ स्टीनर का मानना ​​था कि बच्चों के विकास में कुत्रिम रूप से तेजी लाने की आवश्यकता नही है, बच्चे को नया कौशल सीखने के लिए समय चाहिए।
 अद्वैत ने मुंबई के प्रतिष्ठित इनोदय और कैम्ब्रिज स्कूलों में अपनी शिक्षा ग्रहण की पर इस बीच उसका स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा। मस्केरी दम्पत्ति को यह लगने लगा था कि हर स्कूली संस्थान का उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना ही होता है। स्कूलों से यह बोला जाता कि आपका बच्चा पिछड़ रहा है पर वह अद्वैत को स्कूलों के मानदंडों पर नही तोलते थे। वह इस बात को लेकर जागरूक थे कि अद्वैत की समझ घर में ही शिक्षा देने पर कितनी विकसित हो रही है। वह अद्वैत की किसी भी इच्छा को दबाते नही थे, वह चाहता तो कमीज़ के बटन लगाता था, बर्तन धोता था, कपड़े समेटता, सब्जी काटता और छह साल का होते किचन के सारे काम करने लगा था। मस्केरी दम्पत्ति अद्वैत पर प्रयोग करते हुए उसे खुद को खोजने का अवसर दे रहे थे।मस्केरी दम्पत्ति अद्वैत को किसी स्कूल में न भेजकर घर पर ही पढ़ाना चाहते थे पर अपने परिवारों के दबाव की वज़ह से ऐसा नही कर पाते थे।
साल 2017 में मस्केरी परिवार दिल्ली के साकेत स्थित एक पॉश इलाके में शिफ्ट हो गए। सिद्धार्थ दिल्ली में बैंडिट क्वीन, मकबूल जैसी मशहूर फिल्मों के निर्देशक बॉबी बेदी के गुरुद्वारे से जुड़े एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे।
यह समय मस्केरी दम्पत्ति के जीवन का सबसे बुरा समय था। उनको लगने लगा था कि वह एक मशीन की तरह जीवन जी रहे हैं, अद्वैत का काम करने एक बाई घर आती थी जो उसे सुबह स्कूल भेजती और फिर वह वापस लौटने पर गृहकार्य में ही व्यस्त रहता। दम्पति सुबह ही अपने काम पर निकल जाते थे। दिन भर एक दूसरे से दूर रह उनके बीच परिवार जैसा कुछ नही था। इस वजह से उन्हें एक घुटन सी महसूस होने लगी थी और उनके वैवाहिक जीवन में भी तनाव आने लगा था। 

सीखने की कोई उम्र नही होती

यह पूरी प्रक्रिया वर्तमान में हर परिवार के साथ होती है, हर दम्पति का अब मशीनी जीवन हो गया है जहां भावनाओं के लिए कोई जगह नही रह जाती पर मस्केरी दम्पति ने इसे समझा और वह उस चक्र से अलग हटना चाहते थे जहां पूरी दुनिया जीने लगी है, जिसमें पैदा होना, पढ़ना, डिग्री लेना, बच्चे पैदा करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। उन्होंने निर्णय लिया कि वह इस चक्र को तोड़ेंगे।
मस्केरी दम्पति ने इसके लिए एक प्रयोग किया और अपने घर के एक कमरे को समुदाय के लिए खोल दिया। वह कमरा उन्होंने एक मंच के रूप में ऐसे लोगों के लिए खोल दिया जो अपना हुनर दूसरों के साथ बांटना चाहते थे। ऐसे लोगों में रचनात्मक प्रकार के लोग होते थे जिसमें बड़े और बूढ़े सब समान थे क्योंकि सीखने की कोई उम्र नही होती।

     मस्केरी दम्पति के दिल्ली स्थित घर में Soulify की                                 कार्यशाला
जैसे हम अपने कमरे को किराए पर देने के लिए ओएलएक्स जैसी वेबसाइट का प्रयोग करते हैं वैसे ही मस्केरी परिवार ने अपना कमरा निःस्वार्थ भाव से जरूरतमन्दों की मदद के लिए बनाए गए एक फेसबुक पेज दरिया दिल की दुकान पर साझा किया था।

अब उनके इस कमरे पर नए नए प्रयोग होने लगे थे। वहां डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकिंग, लेखन हर क्षेत्र से जुड़े लोग अपने अनुभव साझा करने आने लगे।
वहीं बॉबी बेदी के गुरुद्वारे वाले प्रोजेक्ट पर काम करते हुए सिद्धार्थ ने गुरुनानक देव जी के बारे में समझा कि उन्होंने घूम-घूम कर कैसे ज्ञान अर्जित किया और उस ज्ञान को वह कैसे लोगों के बीच बांटते चले गए।
 मस्केरी दम्पति को अब खुद को समझने का मौका मिला कि उनकी भाषा कितनी मशीनी हो गई है वह सिर्फ अपने काम में इस्तेमाल होने वाली भाषा बोलते हैं जिसमें न दिल को छूने वाली गर्माहट होती है और न ही रिश्तों को बांधने वाली कोई डोर। 
उन्हें दुनिया की सच्चाई को समझने का मौका मिला कि हम सब उपभोक्तावाद वाद के पीछे अंधे होकर भाग रहे हैं। जो जितना ज्यादा पैसा, बड़ा घर, महंगे सामान जोड़ेगा समाज और उसके खुद के परिवार में उसकी उतनी ही अधिक इज्ज़त होगी।
सिद्धार्थ ने पच्चीस सौ रुपए महीने से कमाना शुरू किया और उस समय वह डेढ़ लाख रुपए महीना कमा रहे थे पर लोन, घर के खर्चे पर सारा कमाया चला जाता था, उन्हें ऐसा लगता था कि वह शीशम के बेड पर लेटे तो हैं पर वहां उन्हें नींद नही है।

    अपनी पहली कार्यशाला के लिए अहमदाबाद निकलता  मस्केरी परिवार
अब उन्होंने निर्णय लिया कि वह अब अपने दिल की सुनेंगे और यहीं से Soulify.org.in की नींव पड़ी।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।मोबाइल-9720897941

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