वेद चिंतन : जो वृद्धों और समान उम्र वालों की सेवा नहीं करता और अकेले खाता है, वह पापी है

विनोबा वेद चिंतन

विनोबा  वेद चिंतन विचार.  मोघमन्नं विंदतेअप्रचेता:सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य नार्यमं पुष्यति नो सखायम केवलाघो भवति केवालादी ।

अविवेकी पुरुष नाहक अन्न का ढेर जमा करता है। मैं सच कहता हूं, जो अन्न का संग्रह करता है, वह मृत्यु का संग्रह कर रहा है ।

जो उदार सृष्टि का , समाज का पोषण नहीं करता और अकेला खाता है, वह पाप खाता है ।

इससे कठिन शाप कौन दे सकता है?

जो अपने वृद्धों और अपने समान वयवालों की सेवा नहीं करता और अकेले खाता है, वह पापी है ,यह वेद के उदगार हैं।

परिश्रम न करनेवाला खाने का अधिकारी नहीं । यह भारत भूमि का विचार है ।

आर्यमनमणम् यानी उदार भावनावाला। यह संज्ञा सृष्टि देवता के लिए दी है ।

पुष्पति नो सखायम, यानी सखाओं का, समाज का पोषण नहीं करता। जो अपने भाई का पोषण नहीं करता, मददगारों का पोषण नहीं करता, वह अन्न नहीं खाता, पाप ही खाता है ।

ऋषि खतरे की सूचना दे रहा है – वध इत स तस्य, वह उसकी मृत्यु है ।

तुमने अपने लिए अन्न के भंडार भर रखे हैं। अरे!यह तुमने अन्य नहीं प्राप्त किया है ,यह तुमने मृत्यु प्राप्त कर ली है ,मृत्यु!

ऋषि कहते हैं- आप अकेले खाओगे तो पाप के पुतले बन जाओगे।

आपको भरे हुए भंडार मिले हैं वे सारे व्यर्थ है, यह तो आपका मरण इकट्ठा हुआ है।

जो दूसरों को पोसेगा नहीं, उसके पास जो है, वह उसकी मृत्यु है।

समाज को न देकर संचय करना यानी मृत्यु प्राप्त करना ।

वेदमाता आपको यह कह रही है। वेदमाता से ज्यादा हितकारी बात कौन कहेगा!

श्रुति माता आपको सावधान कर रही है, आप के हित की बात कर रही हैं ।

इतने साफ शब्दों में खतरे की सूचना और कोई नहीं देगा।

गीता ने भी कहा है- भुंजते ते त्वयं पापा ये पचांत्यातमकारनात् । जो अपने लिए संग्रह करता है, वह पाप खाता है।

हम समाज को अर्पण न करते हुए, अपना हक बना लेते हैं तो वह प्रसाद सेवन नहीं होगा ।

समर्थ रामदास स्वामी भी कहते हैं , आप दूध पीजिए, भरपेट खाइए, परंतु घर में संग्रह मत करिये।

भरपेट भोजन कर, बचा हुआ दीजिए । अन्न  पर नाग बनकर मत बैठिए।

आचार्य विनोबा भावे 

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