जैसे – जैसे उम्र बढ़ी , कुएँ सूखे, तालाब ग़ायब , भविष्य? पानी के लिए विश्व युद्ध!

दिनेश कुमार गर्ग,

स्वतंत्र लेखक, पूरब शरीरा, कौशाम्बी, प्रयागराज

दिनेश कुमार गर्ग
दिनेश कुमार गर्ग
 
सौ साल  पुराने कुंए की ओगरनी यानी सफाई के पांचवें दिन  हम मंजिल तक पहुंच गये । कौशाम्बी जनपद के पूरबशरीरा ग्राम में स्थित गरगों के कुंए की मंजिल यानी कुंए का आधार जिसे टेक्निकल भाषा में नेवार बोलते हैं । नेवार लकडी़ की वह विशाल वृत्ताकार संरचना है जिस पर कुंए की ईंटों की पक्की चिनाई होती है । लगभग 80 फीट ऊंची पकी ईंटों की वृत्ताकार संरचना लकडी़ की इसी नेवार पर टिकी है और नेवार को आज से 103 वर्ष पूर्व एक हरे-भरे गूलर के वृक्ष को काटकर बनाया गया था.  ग्रामीण इंजीनियर जिन्हें हम लोहार-बढ़ई कहते हैं, उनको मालुम था कि केवल गूलर के हरे वृक्ष के काष्ठ में हजार साल तक कीचड़-पानी में पडे़ रहने पर भी वही ताजगी बची रहती है जो गूलर को काटे जाने के दिवस पर होती है । खनिकों ने जब बताया कि नेवार मिल गयी है जो एक बित्ता मोटी है और उसमें लोहे के चुल्ले गडे़ हैं तो मेरे हर्ष का पारावार न रहा।
 
एक सौ तीन साल पुरानी गूलर की लकड़ी की नेवार गाँव में बनी थी
नेवार को देखने और छू कर महसूस करने के रोमांच के लिए मैं आज फिर कूंए में 80 फीट नीचे उतर गया । कीचड़-कंधे छिछले पानी में मैंने हाथ से नेवार को छुआ , उसमें गडे़ लोहे के कडे़ को हिलाया और खींचा तथा एक झटके में अतीत के उस दिन में पहुंच गया जब मालकिन साहेब गंगा कुंवर ने प्रातःकाल की पुण्य वेला में वरुण पूजा करके नेवार को एक गड्ढे में उतरवाया था । मैंने मन ही मन उस देवी गंगा कुंवर को प्रणाम किया , कुंआ खोदवाने के लिए धन्यवाद दिया और आशीर्वाद की याचना करते , खनिकों का हौसला बढा़ते कूंए के गहराई से ऊपर आ गया । मेरे पिता आचार्य पंडित रमाकांत शुक्ल ने एक सूक्ति आवास पर लिखवाई थी – 
अद्य में देवताष्तुष्टाः , पितरः प्रपितामहाः , 
युष्माकं दर्शनादेव नित्यं तुष्टाः सबान्धवाः 
इस सूक्ति जो अर्थ मैं समझ पा रहा हूं वह यह है कि आज मेरे (पुरुषार्थ से ) देवता संतुष्ट हुए हैं, पितर और प्रपितामह लोग भी संतुष्ट हुए । और हे देव आपके दर्शन मित्र से मैं सकुटुम्ब नित्य तुष्ट हो रहा हूं । पिता जी के पांडित्य की गहराई में उतरना मेरे सामर्थ्य से बाहर है पर उन्होंने यह सूक्ति अपने पिता के बनवाए विशाल भवन पर लिखवाया था, तो मेरे मन में आज पितर स्वरूपा मेरे पिता की नानी मालकिन साहेब गंगा कुंवर के बनवाए विशाल कूप के लिए यह छन्द ध्वनित हो रहा है। मालिकन साहेब गंगा कुंवर को चिन्ता थी कि उनके वंशज यानी दौहित्रादि (उनके कुल 2 पुत्रियां थीं शिवकली कुंवर व उर्मिला कुंवर ) उनके मंदिर और कुंए का अनुरक्षण व अनुपालना कर पायेंगे या नहीं , तो आज अब जब कुंए की गाद , मलवा साफ हो गया है और पानी फिर से निकल आया है , मैं पितर स्वरूपा नानी मालकिन साहेब गंगा कुंवर से विनम्रता से कह रहा हूं कि हे माता आपने अपने संकल्प से जिस कूप-गंगा को हमारे लिए प्रकट किया , जिसका जल पीकर न केवल आप, बल्कि मेरी पितामही उर्मिला कुंवर , पितामह शिवराम गर्ग, पिता आचार्य पंडित रमाकांत शुक्ल , कुटुम्बजन और मैं , मेरी बहन मेरे बच्चे जीवन के इस छोर तक पहुंचे वह अभी सुरक्षित है और मैं अपने पुत्रों को मंदिर व कुंआ सुरक्षित रखने के लिए कह जाऊंगा । हे दिव्य माता , मंदिर-कुंए के निर्माण बाद दो-दो बार ” गो शत दान ” करने वाली देवी हमें आशीर्वाद दो कि हम पूरे कुटुम्ब के लोग आपको स्मरण रखें और मन्दिर व कुंए की सेवा का बल बना रहे। भोले।नाथ की जय।
दिनेश गर्ग कुएँ के अंदर
कुंआ पेयजल का सबसे सुलभ ,सुरक्षित स्रोत
 
कोई 30 साल पहले तक ग्रामीण भारत में कुंआ पेयजल का सबसे सुलभ ,सुरक्षित स्रोत हुआ करता था जिसको बनाने  में गांव के लोगों का परंपरागत ज्ञान परी तरह सक्षम हुआ करता था । कुंआ खोदने की एक गणित होती थी जिसके मास्टर गांव केअनुभवी बुजुर्ग लोहार/ बढ़ई होते थे।ये लोग गांव के वंशानुगत इंजीनियर होते थे । लोहा से लेकर लकडी़ तक को ग्रामीणों की आवश्यकताओं के अनुसार ढालने में पारंगत हुआ करते थे। कुंए को संरचित करने में सिविल वर्क का काम भी प्रायः इसी बिरादरी के पास होती थी और 103 साल पहले मेरे घर का कुंआ इन्हीं इंजीनियरों ने बनाया था । 
 
मैं रहा होऊंगा कोई 4 साल का , सन् 1962 या 63 का समय था जब मुझे पहली बार बडे़ पिता जी की 2 लीटर पानी वाली पीतल की सोने जैसी चमचमाती बाल्टी को गर्मी की दोपहर के सन्नाटे में चुराकर कुंए में पानी भरने का अवसर मिला । तब तक मैं अपनी चड्ढी के नाडे़ की गांठ मारना सीख गया था सो उसी ज्ञान के आधार पर बाल्टी के टंगने पर रस्सी बांधी और पानी भरने का प्रयास किया कहार दादा और अन्य लोगों को पानी भरते देखता था , पर कुंए में हम बच्चों को पानी भरना , झांकना अननुमन्य नहीं था  । सो पहला मौका था , जेठ की दोपहर का सन्नाटा, तेन जिंग नोर्गे का हौसला ले कुंए की जगत चढ़ कर पहले तो अंदर के पानी को निहारा और कहा कि अभी निकाल लूंगा । कोई 30 फीट की भीषण गहराई पर कुंए के शांत पर अगाध पानी को देखकर डर भी लगा , पर पानी खींच लेने के एडवेंचर के कारण हिम्मत नहीं टूटी।
 
 
आनन-फानन हाथ में बाल्टी और रस्सी के गठबन्धन में जुटे । याद है , गांठ कसने के लिए जबडे़ में रस्सी को पकड़ कर खींचा और वह कस भी गयी । रस्सी धूप से तप कर गरम हो गयी थी । रस्सी को उछालकर गरारी पर चढा़या था और बाल्टी को कुंए में चन्द्रयान की तरह लांच कर दिया , रोमांच के एवरेस्ट पर थे हम और  धूप से गर्म रस्सी घरघराती गरारी कुंए में बाल्टी साहित जाने लगी तो मेरे हाथों में लगा आग लग गयी और जो न होना था हो गया , पूरी रस्सी सहित बाल्टी गहरे कुंए में समाहित हो गयी । बाद में क्या हुआ आप सब कल्पना कर सकते हैं।
 
तब मेरे कुंए का पानी 30 फीट पर था । तब गांव में नाप की इकाई हाथ होती थी। बुड़किहार यानी गोताखोर ने मुझे तब बताया था कि पानी 20  हाथ तरे है जो 30 फीट बैठता है। गांव केअन्य कुंओं में भी पानी तालाब व नहर की निकटता से ऊपर नीचे हुआ करता था । किसी में 25 हाथ में तो किसी मे 15 हाथ में । तालाब जेठ में भी पानी और मछली से भरे रहते थे। कोई-कोई उथले तालाब सूख जाते थे पर मेरे घर के पास वाला कलेन तारा दो पुरसा गहरा होने से सदानीरा रहता था । पुरसा यानी गहराई नापने का ग्रामीण पैमाना , लगभग 6 फीट गहरा होता था ।
 
बरसात में यानी भादों की वर्षा के बाद  हाथी के डूब जाने भर का पानी उसमें हुआ करता था और इसलिये तालाब के किनारे वाले लोग हम बच्चोः पर कडी़ निगाह रखते थे का हम लोग गहराई वाले घाट की तरफ न जांये। मेरे लिए समुद्र, जिसकी चर्चा मेरी कक्षा तीन की पुस्तक में था , कलेन तारा ही था , पुरवाई चलने पर ऊंची ऊंची हिलोरें मारता हुआ ।
 
गांव के कहार बिरादरी के लोग उसमें उथले हिस्से में सिंघाडे़ की खेती किया करते थे कुंवार मास से पूष माह तक सिंघाडे़ की बहार रहती । मैंने कलेन तारा को आर-पार तैरते केवल सिंघाडे़ की खेती वाले कहारों को ही देखा था, गाव को कोई भी नौजवान तैराक हिम्मत नहीं करता था। गांव में चारों ओर सात आठ प्रमुख गहरे तालाब थे । भुआ, तलवा , देवी जी, राजा तारा, बोडी पोखरी, बडी़ तीर , आसीतारा , तिवारिन तारा आदि पानी से लबालब हुआ करते थे। पुरैन सिंघाडा़ , कुमुदिनी और सेवार के साथ सारस, बगुला, टिटिहरी, पनबुड्डी , जलकौआ,और ऐसे ही दर्जनों पक्षियों , लंगूरों  के आश्रय ये तालाब गंगा स्नान के साथ सिंचाई के भी काम आते थे। 
 
तब से अब मेरी उम्र 62 साल है। सन् 1969 में मैं अपने गांव से बाहर शिक्षा के लिए गया था और तबसे अब मैं सेवानिवृत्त होकर अपने गांव वापस आया हूं तो मेरे बचपन के ये जलाशय अब उद्विग्न, श्रीहीन और जलरहित होने से उदास हैं । सिंचाई और डोमेस्टिक यूज के लिए भारी मात्रा में जल दोहन होने से तालाब तो माघ के महीने में जल रहित केवल कीचड़ वाले बचते हैं । कुंए भी अब बिना पानी निकाले सूख गये हैं । गांव व खेतों का कोई भी कुंआ पानी से भरा नहीं बचा । कारण है कि भूमिगत जल-स्तर अब 20-25 फीट नीचे से खिसककर 62 फीट नीचे जा चुका है। मेरे पडो़सी श्रीदत्त पांडे ने अभी 2 दिन पहले घर में पेयजल सुविधा के लिए बोर कराया है तो उन्हे 62 फीट नीचे पानी मिला । 
 
भूगर्भ जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है
 
 
मेरे घर सहित आस पडो़स मे में 12 सबमर्सिबिल पंप भूमि से पानीके दोहन के लिए लगे हैं।गांव जो पहले प्रकृति संरक्षण व पूजन की पुरानी परंपराओं के अनुगामी होते थे अब उन परंपराओं का अतिक्रमणकर प्रकृति की उपेक्षा करने लगे हैं , उनकी सूचनाओं के स्रोत महानगरीय बौद्धिकता, फैशन और मीडियम है। उदाहरण के लिए वर्षा जल संरक्षण व भूमिगत जल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत तालाब है, जिसे ग्राम्य समाज में देवता माना जाता था । सभी प्रमुख मांगलिक अवसरों पर तालाब पूजन होता था , विवाह संस्कार की प्रथम तैयारी मठमंगरा और काडी़पूजन का शुभारंभ तालाब के पूजन और मिट्टी लाने से हुआ करता था । सांकेतिक अर्थ है कि मंगल और प्रजा सातत्य का नाभिसूत्र जलाशय हैं । तालाब दो तरह के थे – प्राकृतिक और मानव निर्मित । दोनों का देवताओं की तरह सम्मान होता था । तालाब से मिट्टी को विभिन्न प्रयोजनों के लिए निकाला जाता था पर तालाब और कुंआ पाटना बहुत ही निंदनीय और पापपूर्ण माना जाता था ।
 
पूर्वज तालाब खोदवाना पुरुषार्थ और पुण्य का काम मानते थे और संचित कमाई का बडा़ हिस्सा तालाब , कुंआ , बावली , सराय निर्माण में लगाना फर्ज मानते थे। समय बीता और अब तालाब व कुंएं कीपुण्यदायी हैसियत नयी पीढी़ भूल गयी । तालाब पाटकर अब भवन बनाए जा रहे हैं और बाजार व बस्तियां बसाई जा रही हैं । मेरे गांव से सटे 4 प्रमुख तालाब कलेन तारा , धोबीयन तारा, भुआ, बडी़ तीर और पसियन का तालाब अब प्रधानों ने सरकारी सोच और ऐक्ट की कमजोरियों का लाभ उठाकर बेच डाला है ।
 
मेरी एक चचेरी बहन के ससुराल उदहिन में घरेलू बंटवारे के बाद  कुंआ जो जनाना के प्रयोग के लिए बनवाया गया था उनके जेठ के हिस्से में गया तो उनके बच्चों ने उस सूखे कुंए का पुनरुद्धार करनेके बजाय उसमें घर के सीवर को जोड़ दिया। नई  पीढी़ जो अब नलकूप पीढी़ है वह कुंए-तालाब  के महत्व से अनजान है और उसे यह भी नहीं पता कि जिस भूमिगत जल को अंधाधुन्ध वे धरती से खींच रहे हैं वह वर्षानुवर्ष नीचे और नीचे जि रहा है और अगले 15 से 20 वर्ष के भीतर धरती का यह जीवनदायी खजाना जो 400 से 1000 साल में बूंद-बूंद कर संचित हुआ है समाप्त हो जायेगा , कुंए-तालाब तो सूखे और समाप्त ही हुऐ , नलकूप और सबमर्सिबिल भी ठप हो जायेंगे । 
 
 सरफेस वाटर और भूमिगत जल स्रोत का सबसे काला पक्ष यह है कि सरकार जो मास एडूकेशन की जिम्मेदार है उसके पास समग्र दृष्टि का अभाव है। सरकारें मल्टीनेशनल कंपनियों की बंधक अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सलाह पर उनकी दवाइयों , उपकरण और वस्तुओं के लिए मास- अवेयरनेस के प्रोग्राम तो करती हैं पर अपनी जनता की मौलिक बात शुद्ध जल की भरपूर उपलब्धता के विषय में विमूढ़ अहिल्या की तरह बनी रहती हैं ।
 
सरकारों के पास थिन्क टैन्क होते हैं पर वे भी शीर्ष स्तर से प्रक्षेपित कार्यों को कर नौकरी पूरी करते हैं । सरफेस वाटर और ग्राउण्ड वाटर कन्जर्वेशन कितना बडा़ काम है , भारत का भविष्य है शायद इससे अनजान हैं, तभी पाठ्यक्रमों में सरफेस वाटर और ग्राउण्ड वाटर पर जागरूकता का कोई पाठ्यक्रम नहीं है। जल की पूजा , वायु की पूजा ,धरती की पूजा और सम्मान नयी पीढी़ के लिए पिछडा़पन है। वे पिछडा़ नहीं अगडा़ यानी अमेरिकन बनना चाहते हैं केवल उपभोग में जो हमारी संस्कृति में राक्षसी प्रवृत्ति मानी गयी है । संरक्षण व रिचार्ज के बिना केवल उपभोग रावण की प्रवृत्ति है जबकि दैवी प्रवृत्ति है “आपो भवन्तु पीतये ” आप यानी जल पीने के लिए हो यह वैदिक प्रार्थना है । पर हमारी धर्म निरपेक्ष सरकार इस मानव धर्म से भी निरपेक्ष है। 
 
प्राचीन कौशाम्बी महाजनपद और वर्तमान कौशाम्बी  जनपद का परगना अथरवन के दोनों ओर दो महान नदियों का प्रवाह है । बताते हैं कि 1900 से 1905 के दौर  में इस क्षेत्र में भारी सूखा पडा़ था और लोग पानी व अनाज की कमी से मरने लगे तो ब्रिटिश कलक्टर ने मेरे गांव तक की यात्रा घोडे़ की पीठ पर की थी और मेरे पिता के नाना से एक लाख चांदी के रुपये उधार लेकर जनता में तकाबी यानी आर्थिक सहायता बांटी थी । यह कहानी मैं बचपन से सुनता आया हूं और आज भी कुछ सीनियर बचे हैं जो इसे बताते हैं पर मैं अभी तक इलाहाबाद के गजेटियर से इसे प्रमाणित करने का अवसर नहीं पा सका हूं।
 
तब ब्रिटिश सरकार ने हमारे क्षेत्र में गंग नहर की एक ब्रांच कानपुर से यहां तक खुदवाई जिससे गरीब लोगों को रोजगार के साथ किसानों को रबी की फसल जैसे आलू ,गेहूं आदि की खेती का अवसर भी मिला । गन्ना भी होने लगा । सिंचाई सुविधा बढ़ने से आर्थिक स्थिति के साथ क्षेत्र की ग्राउण्ड वाटर व सरफेस वाटर लेवल में भारी सुधार हुआ था । नहर एक क्रांति थी इस क्षेत्र के लिए । न केवल पानी आया बल्कि धुर देहाती क्षेत्रों में एक कच्ची मोटरेबुल रोड भी अस्तित्व में आयी और फसलों के बाजार को बाहर कानपुर के बडे़ बाजिर से कनेक्टिविटी भी मिली। 
 
नहर अब भी है और अब उसे गंगा के बजाय किशुनपुर पंप कैनाल के जरिये जमुना के पानी से भरा जाता है। वह ग्राउण्डवाटर रिचार्ज के साथ सरफेस वाटर की डिमाण्ड को पूरा करते हुए तालाबों पर सिंचाई के दबाव को घटाती है पर जैसे जैसे नया जमाना नयी सुविधाएं बढ़ रहे हैं , ग्राउण्ड वाटर की मुसीबत भी गहराती जा रही है। 
 
पूरबशरीरा में पानी की टंकी बन गयी है जो प्रतिदिन 100000 लाख लीटर जल भूमि से चूसकर एक बडे़ एरिया में भेज रहा है । इसका असर यह है कि अब उथले नलकूप भी सूखने लगे हैं । प्रधानमंत्री संचालित स्वच्छता कार्यक्रम  में घर-घर फ्लश लैट्रीन बनी हैं तो पानी की डिमाण्ड भी बढ़ गयी है । जहां प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 4 लोटे पानी यानी ढाई से तीन लीटर पानी दोनों  समय के स्वच्छता क्रियाओं में खर्च होता था, वहां अब प्रति व्यक्ति 20 – 25 लीटर जा रहा है। स्नान भी जल खर्च करने की दृष्टि से खर्चीला हो गया है।
 
पहले पानी कठिनता और श्रम से प्राप्त होता था तो अपव्यय और विलासिता में व्यय नहीं होता था । अब मशीन के कारण या पाइप वाटर के कारण अपव्यय में भारी वृद्धि हुई है। कच्चे घरों की जगह पक्के घर बनने से तालाबों से मिट्टी खोदाई  बंद होने के कारण और पुराव से तालाब उथले होते जा रहे हैं । जहां जिन तालाबों मेः हाथी डूबने भर का पानी होता था वहां अब भैंस भी नहीं डूबती । 
जल ही जीवन है , सरकार और लोगों को गांठ बांधकर आज से ही समय रहते उपाय कर लेने की जरूरत है अन्यथा प्यासे मरने और पानी के लिए विश्वयुद्ध में फंसने का मैदान निकट ही है।
 
जल ही जीवन है , सरकार और लोगों को गांठ बांधकर आज से ही समय रहते उपाय कर लेने की जरूरत है अन्यथा प्यासे मरने और पानी के लिए विश्वयुद्ध में फंसने का मैदान निकट ही है।
 
 
 

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