गाँवों की सरकार तब, गणराज्य जगे जब!

जनता से संवाद


डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
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   उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पञ्चायतों पर क़ब्ज़े की तिकड़म ज़ारी है। पञ्चायत चुनावों की रणभेरी बजे पखवाराभर बीत चुका है। इनके लिए राज्य के सभी 75 जिलों में चार चरणों में मतदान 15, 19, 26 और 29 अप्रैल को होंगे। हालाँकि ये चुनाव दलगत आधार पर नहीं हो रहे, फ़िर भी सरकार ने इनके लिए भारी-भरकम तैयारियाँ की हैं। साथ ही सत्तारूढ़ पार्टी ने पञ्चायत चुनावों में ‘प्रचण्ड विजय’ के लिए सारी ताक़त झोंक दी हैं। आखिर, पञ्चायत चुनावों के बमुश्किल आठ-नौ महीनों के भीतर प्रदेश के विधानसभा चुनावों का शङ्खनाद होना है। इसे देखते हुए अन्य दलों ने भी “गाँवों की सरकार” कहे जाने वाली ग्राम पञ्चायतों से लेकर जिला पञ्चायत तक को अपने कब्ज़े में करने के लिए कमर कसी हुई है। विपक्ष की पीड़ा अधिक है क्योंकि 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से ‘घायल’ विपक्षी दलों को उत्तर प्रदेश में अपनी ताक़त जुटाने तथा जमाने का यह पहला सीधा मौक़ा है।
   उत्तर प्रदेश में कोई 58 हज़ार ग्राम पञ्चायतें, क़रीब साढ़े आठ सौ क्षेत्र पञ्चायतें और 75 जिला पञ्चायतें हैं। जिला पञ्चायतों में 3,000 से अधिक सीटें हैं जबकि क्षेत्र पञ्चायतों में पहले बीडीसी और बाद में क्षेत्र प्रमुखों का चुनाव किया जाना है। सत्तारूढ़ पार्टी तो इन्हें जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाये हुए है ही, समूचा विपक्ष भी इसके निमित्त फनफनाया हुआ है। कारण यह कि समाजवादी पार्टी की सरकार में हुए 2015 के पञ्चायत चुनावों के बाद गत विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सवा तीन सौ सीटें जीतते हुए ज़बर्दस्त प्रदर्शन किया था और अपने तमाम विपक्षी दलों के इरादों को नेस्तनाबूद कर दिया था। 
   गाँवों में सभी लोग एक-दूसरे को जानते हैं। इससे पहली नज़र में प्रचार, अथवा चुनाव की ख़ातिर किसी खर्च की ज़रूरत नहीं दिखती। लेकिन मैदानी हकीक़त इसके विपरीत है। जिला पञ्चायतों और क्षेत्र पञ्चायत सदस्यों (बीडीसी) को तो छोड़िए, विभिन्न स्थानों पर ग्राम प्रधानी के प्रत्याशियों के द्वारा पाँच से आठ लाख रुपये तक खर्च किये जा रहे हैं। मतदाताओं का समर्थन जुटाने के लिए विभिन्न स्तरों पर धन का ‘अन्धाधुन्ध’ वारा-न्यारा हो रहा है। इनमें आकर्षक पोस्टर, बैनर तथा दूसरी प्रचार सामग्री तो है ही, भेंट के रूप में मोबाइल, घड़ियाँ, कपड़े, पर्स और बैग से लेकर तमाम तरह की आर्थिक मदद तथा ‘पार्टी’ तक शामिल है। ऐसी पार्टियों में शाकाहारी व्यञ्जन के अलावा समर्थकों की पसन्द पर मांस और मुर्गे-दारू का दौर चल रहा है।
   यों, ऐसे भी अनेक स्थान हैं जहाँ रसूख, दबदबे या लोकप्रियता के कारण पञ्चायत प्रत्याशियों का चुनाव निर्विरोध होने की सम्भावनाएँ हैं। इन (पञ्चायत) चुनावों में शुचिता के पक्षधर भी हैं, भले इनकी संख्या कम हो। इनमें डॉ० चन्द्र शेखर ‘प्राण’ और डॉ० गिरीश चन्द्र पाण्डेय जैसे समर्पित देशप्रेमी प्रमुख हैं। ये सब लम्बे समय से पञ्चायत चुनावों में पवित्रता की वकालत करते आये हैं और इसके लिए जनता को जागरूक करने के वास्ते संगोष्ठियों, कालान्तर में ‘बेविनारों’ और सोशल मीडिया के माध्यम से जनता को जागरूक करने का अभियान चलाये हुए हैं। नेहरू युवा केन्द्र सङ्गठन और राष्ट्रीय युवा वाहिनी के निदेशक रह चुके डॉ० प्राण पञ्चायत प्रणाली को मज़बूत करने के लिए 73वें/74वें संविधान संशोधन के पहले से ही जन-जागरूकता के लिए अनथक कार्य कर रहे हैं। इससे उनकी ख्याति न केवल उत्तर भारत बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण और बिहार, उड़ीसा तक फैल चुकी है। इसी तरह से मुख्य आयकर आयुक्त रहे डॉ० गिरीश चन्द्र पाण्डेय हैं। वे भी गाँवों को विकास की धुरी तथा पञ्चायतों को इसका हत्था (हैण्डल) मानते हैं। इस सन्दर्भ में सालों पहले उनकी एक पुस्तक “जागो! गणराज्य जागो” आ चुकी थी और अब वे इस बारे में विशेष अभियान चलाये हुए हैं।
   ऐसे लोग मानते हैं कि गाँवों को मज़बूत तथा आत्मनिर्भर करने से ही समूची प्रणाली और अन्तत: देश को आर्थिक रूप से दृढ़-सशक्त किया जा सकेगा। डॉ० गिरीश चन्द्र पाण्डेय का पञ्चायत चुनावों के सम्बन्ध में डेढ़ घण्टे का एक वीडियो ‘यू ट्यूब’ और ‘फ़ेसबुक’ पर कुछ समय पूर्व ‘लाइव’ प्रसारित हुआ था। वे कहते हैं- “लोग यदि सबसे अच्छे व्यक्ति को आपस में तय करके चुन लें तो गाँव ख़ुशहाल हो जाएंगे क्योंकि तब पैसे का बोलबाला ख़त्म हो जाएगा।” अपने एक ‘सोशल कन्सर्ट’ में उन्होंने इस बारे में विस्तार से बात की है। उसके सम्पादित अंश यहाँ प्रस्तुत हैं :- “गाँव वालों को यह जानना ही होगा कि ग्राम प्रधान, या पञ्चायत कोई भी फ़ैसला अपने आप नहीं ले सकती; साल में दो बार सारे गाँव के लोगों की बैठक होनी चाहिए और सारे फ़ैसले उन्हीं बैठकों में होने चाहिए। 73वें संविधान संशोधन के बाद अब 29 विषय पर गाँव पञ्चायतों का पूरा अधिकार है।”
   डॉ० गिरीश चन्द्र पाण्डेय के अनुसार- “दूसरी और उतनी ही महत्वपूर्ण बात यह है कि जो “राइट टू रिकॉल” यानी चुने हुए ग़लत प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार लोकनायक जय प्रकाश नारायण ’70 के दशक में शुरू अपने ‘सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन’ में माँग रहे थे, वह पञ्चायत के चुनावों में दे दिया गया है। अगर कोई प्रधान मनमानी करता है, या गाँव के लोगों से फ़ैसले नहीं करवाता, या ग़लत काम करता है, या जिला अथवा तहसील के अधिकारियों का मोहरा बन जाता है तो गाँव के लोग 2 साल तक उसका काम देखने के बाद असन्तुष्ट होने पर बड़ी आसानी से उसको निकाल सकते हैं। इसकी पूरी प्रक्रिया पञ्चायती राज अधिनियम में, 73वें संविधान संशोधन के बाद हुए परिवर्तनों के अनुसार दी हुई है।” 
 
  डॉ० पाण्डेय बताते हैं- “मात्र ये तीन चीज़ें जान लेने से कि (1) जनता यानी हम गाँव के लोग मालिक हैं, हमें अपना सेवक चुनना है, (2) जिसे सारे फ़ैसले गाँव के लोगों की बैठक में करना है और (3) अगर प्रधान काम ठीक से नहीं कर सकता, या नहीं कर रहा है तो गाँव के लोग दो साल के बाद उसे कभी निकाल सकते हैं, से ही अभूतपूर्व परिवर्तन होने लग जाएँगे।” वे बताते हैं कि “2015 के चुनावों में जिन गाँवों में इन बातों को समझते हुए प्रधान और अन्य सदस्यों का चुनाव किया गया था- वहाँ जादुई बदलाव की लहर शुरू हो भी गयी है।”
   15 अप्रैल से होने जा रहे पञ्चायत चुनावों के सन्दर्भ में डॉ० गिरीश पाण्डेय कहते हैं कि “अगर किसी के पास कोई सम्पत्ति (प्रॉपर्टी) है जिसका उसके पास न तो दस्तावेज़ है, न ही क़ब्ज़ा है, और न ही उसे पता है कि यह प्रॉपर्टी उसकी है,तो क्या होगा? जिसे उस प्रॉपर्टी की जानकारी होगी और जिसका क़ब्ज़ा होगा वही उसका उपभोग करेगा। यही हाल आज आम जनता का है। सत्ता जनता के पास है लेकिन जनता ने उस दस्तावेज़ का नाम नहीं सुना जिसके द्वारा जनता को सत्ता मिली है। वह जानती है भी नहीं कि सत्ता उसके पास है, और न ही जनता का सत्ता पर क़ब्ज़ा है। इसीलिए सत्ता कुछ चालाक लोगों ने हथिया ली है और जनता अपने को आज भी प्रजा समझे हुई है। संविधान ही वह दस्तावेज़ है जो सत्ता जनता को सौंपता है लेकिन दुर्भाग्य ये है कि जनता में अधिकतर लोगों ने तो संविधान का नाम ही नहीं सुना है, पढ़ना-जानना तो दूर की बात है।”
   हालत यह है कि आप गाँव में जाकर हज़ारों लोगों से पूछ डालिए कि सत्ता किसके पास है तो  ‘पीएम’, ‘सीएम’ या ‘डीएम’ के अलावा और कोई उत्तर नहीं मिलेगा। …और यह जनता की ग़ैर जानकारी का नतीज़ा है कि भारत दुनिया के 200 से अधिक देशों में अकेला ऐसा देश है जहाँ जनता का रास्ता रोक कर उसके सेवकों को गुज़ारा जाता है। आज़ादी के बाद उसी छलावे की मानसिकता की वजह से देश को प्रजातंत्र कहा गया और आज भी जब किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण होता है तो मीडिया कहती है “फ़लाँ-फ़लाँ का राजतिलक?” ये धूर्तता है। निहित स्वार्थी और सत्तालोलुप लोग नहीं चाहते कि जनता को अपनी शक्ति का एहसास हो। डॉ० पाण्डेय इस बारे में अपनी ही एक गज़ल का एक शेर सुनाते हैं :-
“खर पतवार फ़सलों से भी बड़े हो गये हैं, 
व्यवस्था में हुई ठीक से निराई नहीं है।।”
   बहुप्रचारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह ‘जनतंत्र’ का दौर है। लोकतंत्र तभी तक जीवित रह सकता है जब तक कि जनता जागरूक बनी रहे। इसे रौंदने की बहुतेरी कोशिशें जब-तब दिखती रही आयी हैं। गौरतलब है कि पिछले पञ्चायत चुनाव में 200 से अधिक “अच्छे ग्राम प्रधान” चुने गये थे। जनता, आप, और हम चेतते हैं तो इस बार अधिकाधिक गाँवों में अच्छे प्रधान चुने जा सकते हैं। गाँव गणराज्य हैं, ये जागेंगे तभी गाँवों की सरकार का सपना पूरा हो सकता है।

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