बनारस विश्वनाथ मंदिर काॅरिडोर : हड़प्पा के भाई पक्काप्पा का इतिहास


सुरेश प्रताप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

बनारस मंदिर व गलियों का शहर है. यहां गंगा किनारे अनेक ऐसे घर मिलेंगे जिसके आंगन में या फिर किसी कोने में मंदिर हैं. घर के बाहर चबुतरे पर भी मंदिर हैं. गलियों के नुक्कड़ और चौराहे पर भी मंदिर मिल जाएंगे, जिसकी प्रतिदिन लोग श्रद्धा से पूजा करते थे. लाहौरी टोला की वे गलियां अब खत्म हो गई हैं. मंदिर भी तोड़े गए हैं. इन गलियों में दुकानें भी थीं और लोग के दैनिक प्रयोग की सामग्री उन्हें मिल जाती थी. स्वतंत्रता आंदोलन में भी इन गलियों का अपना योगदान है. यहां चंद्रशेखर आजाद भी रहते थे. तब क्रांतिकारियों की पत्रिका “रणभेरी” का प्रकाशन इसी गली में स्थित एक प्रेस से होता था. देश के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री भी पढ़ाई के दौरान लाहौरी टोला में रहते थे. कांग्रेस के नेता पंडित कमलापति त्रिपाठी के पूर्वजों की कोठी भी ललिता गली में थी. अब उसे ध्वस्त कर दिया गया है.

150 साल से भी अधिक पुरानी कारमाइकल लाइब्रेरी थी, जिसमें अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां थीं. इस पुस्तकालय में कभी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, संपादकाचार्य विष्णुराव पराड़कर, प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह आदि पढ़ने के लिए आते थे. उनकी स्मृतियां इस लाइब्रेरी से जुड़ी थीं. कोई संस्कृति ऐसे ही महान नहीं बन जाती है. उसे अपनी विरासत को सहेज कर रखना पड़ता है. जो समाज अपनी धरोहर को बचाने के लिए लड़ नहीं सकता है, उसका कोई भविष्य भी नहीं होता है. यहीं “अनंत कोठी” थी जिसे लाहोरी टोला का शान कहा जाता था, ध्वस्त कर दी गई. इसे लाहौर के रेशम व्यवसायी लाला अनंत राम ने बनवाया था.

बनारस में एक टूटे हुए मंदिर की प्रतिमा
बनारस में एक टूटा हुआ मंदिर

शिवपुत्र विनायक की अनेक प्रतिमाएं मलबे में दब गई हैं. इच्छापूर्ति विनायक ललिता गली में थे, जो अब मलबे में दबे हैं. नंदी की टांग टूट गई. महाभारत के योद्धा कृष्ण व उनकी प्रेमिका राधा का हाथ-पैर तोड़कर गंठरी में बांधकर उन्हें कहीं रख दिया गया. नीलकंठ महादेव का मंदिर जो सतह से 20-25 फुट नीचे होगा की दीवारों को ध्वस्त कर दिया गया. ऐसी अनेक कहानियां यहां बिखरी पड़ी हैं.

शिवपुत्र विनायक की अनेक प्रतिमाएं मलबे में दब गई हैं. इच्छापूर्ति विनायक ललिता गली में थे, जो अब मलबे में दबे हैं. नंदी की टांग टूट गई. महाभारत के योद्धा कृष्ण व उनकी प्रेमिका राधा का हाथ-पैर तोड़कर गंठरी में बांधकर उन्हें कहीं रख दिया गया. नीलकंठ महादेव का मंदिर जो सतह से 20-25 फुट नीचे होगा की दीवारों को ध्वस्त कर दिया गया. ऐसी अनेक कहानियां यहां बिखरी पड़ी हैं.

बनारस में साल 2019 में जब प्रवासी सम्मेलन आयोजित किया गया था, तब अनेक मंदिरों के सामने बोर्ड लगाकर मंदिर का परिचय लिखा गया था, जिसमें अधिकांश जानकारी गलत दी गई थी. मंदिर प्रशासन की तरफ से ये पोस्टर लगाए गए थे. एक मंदिर के बारे में बताया गया था कि इसे चंद्रगुप्त ने बनवाया था.

क्या चंद्रगुप्त ने बनवाया था पक्कामहाल के लाहौरी टोला में महादेव मंदिर ?

पक्कामहाल यानी पक्काप्पा के लाहौरी टोला में विश्वनाथ मंदिर काॅरिडोर और गंगा पाथवे के लिए ध्वस्त किए गए घर व दुकानों के मलवे से घिरे एक मंदिर के बारे में वहां लगे पोस्टर पर लिखा है कि इसका निर्माण चंद्रगुप्त ने कराया था. इस मंदिर का नाम “श्री चंद्रगुप्त महादेव मंदिर” है.

इस सूचना में यह नहीं बताया गया है कि यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी इतिहास की किस पुस्तक से मिली है. या फिर इसकी खोज किस इतिहासकार ने की है. स्रोत की जगह मोटे अक्षरों में लिखा है कि “हमें आपके आशीर्वाद की आकांक्षा है.”

यह जानकारी किस पुरातात्विक विद्वान या जिम्मेदार अधिकारी की तरफ से दी गई है ? इसका भी उल्लेख नहीं है. यह सूचना हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखी गई है. मंदिर के बाहर लगी सूचना में मंदिर के निर्माण की अवधि यानी समय का भी उल्लेख नहीं किया गया है.

गुप्तवंश

भारत में गुप्तवंश की स्थापना 320 ई. में हुई थी. और इसका अंत 550 ई. में हुआ था. चंद्रगुप्त प्रथम का काल 319 ई. से 335 ई. है, जबकि विष्णुगुप्त का 540 ई. से 550 ई. है. प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार गुप्तवंश का साम्राज्य 13,51,358 वर्गमील क्षेत्रफल में फैला था.

पक्कामहाल में चंद्रगुप्त द्वारा बनवाए गए मंदिर का मिलना इतिहास के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय है. काशी हिन्दू विशवविद्यालय तथा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के इतिहास के प्रोफेसरों को इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए आगे आना चाहिए. क्योंकि उनके अपने शहर बनारस के लाहौरी टोला में शासन-प्रशासन ने चंद्रगुप्त द्वारा निर्माण कराए गए महादेव मंदिर की खोज की है. हालांकि मंदिर के बाहर लगे पोस्टर पर इस ऐतिहासिक तथ्य की खोज करने वाले इतिहासकार के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है.

पक्कामहाल में चंद्रगुप्त द्वारा बनवाए गए मंदिर का मिलना इतिहास के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय है. काशी हिन्दू विशवविद्यालय तथा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के इतिहास के प्रोफेसरों को इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए आगे आना चाहिए. क्योंकि उनके अपने शहर बनारस के लाहौरी टोला में शासन-प्रशासन ने चंद्रगुप्त द्वारा निर्माण कराए गए महादेव मंदिर की खोज की है. हालांकि मंदिर के बाहर लगे पोस्टर पर इस ऐतिहासिक तथ्य की खोज करने वाले इतिहासकार के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है.

विश्वनाथ मंदिर

1585 ई. में अकबर के मंत्री टोडरमल की मदद से संस्कृत के दक्षिण भारतीय विद्वान नारायण भट्ट ने बाबा विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण पक्कामहाल में कराया था. 1669 ई. में औरंगजेब के शासनकाल में मंदिर तोड़ा गया था. 1775 ई. में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, जिसमें 4-5 वर्ष लगे थे. कुछ विद्वानों का मत है कि अहिल्या बाई ने जीर्णोद्धार नहीं बल्कि मंदिर का निर्माण कराया था.

यहां यह उल्लेखनीय है कि एक माह पू्र्व क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डाॅ. सुभाष चंद्र यादव के हवाले से स्थानीय अखबारों में खबर प्रकाशित हुई थी कि बाबा विश्वनाथ मंदिर से पुराना पक्कामहाल में कोई मंदिर नहीं है. और विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार 1777 से 1780 के बीच हुआ था. इसी खबर में यह भी बताया गया था कि पक्कामहाल में ध्वस्तीकरण के दौरान मिले अधिकांश मंदिरों का निर्माण 18वीं सदी में हुआ था. अब जो नई जानकारी उपलब्ध हुई है, उसके परिप्रेक्ष्य में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इतिहासकार “सच” की खोज करें. क्योंकि बनारस के इतिहास की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण खोज हुई है. जो अब तक छुपी थी कि चंद्रगुप्त ने यहां मंदिर बनवाया था.

विश्वनाथ काॅरिडोर

विश्वनाथ मंदिर काॅरिडोर को भव्य रूप देने के लिए यह सब किया गया है. 8 मार्च, 2019 को काॅरिडोर में आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गर्व से यह घोषणा की थी कि “बाबा विश्वनाथ अब मुक्त हो गए हैं. खुली हवा में सांस लेंगे. पहले संकरी गलियों के कारण सांस लेने में उनका दम फूलता था.”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्वनाथ कोरिडोर का शिलान्यास करते हुए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्वनाथ कोरिडोर का शिलान्यास करते हुए

तो अब बाबा विश्वनाथ मुक्त हो गए हैं. इसके लिए कारमाइकल लाइब्रेरी, गोयनका पुस्तकालय, गोयनका छात्रावास, वृद्ध आश्रम, अनके मंदिर, 350 से अधिक घर और मणिकर्णिका श्मशान में बने “भिखारी धर्मशाला” आदि को जमींदोज किया गया है. उनका हजारों ट्रैक्टर मलबा भी गंगा में फेंक दिया गया है, ताकि गंगा प्रदूषण मुक्त हो जाएं.

तो अब बाबा विश्वनाथ मुक्त हो गए हैं. इसके लिए कारमाइकल लाइब्रेरी, गोयनका पुस्तकालय, गोयनका छात्रावास, वृद्ध आश्रम, अनके मंदिर, 350 से अधिक घर और मणिकर्णिका श्मशान में बने "भिखारी धर्मशाला" आदि को जमींदोज किया गया है. उनका हजारों ट्रैक्टर मलबा भी गंगा में फेंक दिया गया है, ताकि गंगा प्रदूषण मुक्त हो जाएं.



कृपया इसे भी पढ़ें 

फरवरी 2018 में जब पक्कामहाल में घरों को तोड़ने के लिए लाल निशान लगाया गया था, तब इसके विरोध में “धरोहर बचाओ आंदोलन” शुरू हुआ. अपने अंतरविरोधों के कारण यह आंदोलन बीच में ही दम तोड़ दिया. उसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के नेतृत्व में “मंदिर बचाओ आंदोलन” शुरू हुआ. जनसमर्थन न मिलने के कारण वह भी टूट गया.

बनारस एक धरोहर का नामोनिशान मिट गया

एक पत्रकार के रूप में साल 2018 से ही पक्कामहाल में शुरू आंदोलन व घटनाओं पर मेरी नज़र थी. मैंने जो देखा, उसे लिखा. डायरी की तरह, जिसमें किस्सागोई भी है. कुछ तारीखें इतिहास बन जाती हैं. मुझे लगा कि पक्कामहाल में एक संस्कृति दम तोड़ रही है. उसी नज़रिए से मैं घटनाक्रम को देख और लिख रहा था. इसे मैं गंगाघाटी की “पक्काप्पा संस्कृति” कहता हूं. यह सिंधुघाटी की हड़प्पा संस्कृति का छोटा भाई है. पक्कामहाल से मैंने “पक्का” लिया और हड़प्पा से “प्पा”..! इस तरह यह “पक्काप्पा संस्कृति” बन गई. सितम्बर, 2020 में प्रकाशित मेरी पुस्तक “उड़ता बनारस” में जनवरी, 2020 तक हुई घटनाओं को समेटते हुए मैंने अपनी बात कहने की कोशिश की है. अब मुझे लगता है कि घटनाएं इतनी तेजी से घटित हो रही हैं कि उन्हें पुन: समेटने की जरूरत है.

सुरेश प्रताप

सुरेश प्रताप बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्होंने उड़ता बनारस नाम से एक किताब लिखी है, जिसमें बनारस में इस ध्वंसात्मक कार्यवाही का विस्तृत विवरण है.

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