वाराणसी को निर्मल गंगा कैसे मिलेगी

गंगा को अविरल बहने दें

तीर्थनगरी वाराणसी में गंगा और उसकी दोनों सहायक नदियाँ भयंकर प्रदूषण का शिकार हैं . गंगाजल आचमन तो क्या स्नान के लायक़ भी नहीं रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सात सालों में अरबों रुपये खर्च होने के बाद स्थिति सुधरने के बजाय बदतर हो गयी है. वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप ने गंगा को फिर से निर्मल बनाने के लिए कुछ सुझाव दिये हैं . ख़ास बात यह कि गंगा के बहाव में अवरोध न खड़े करें – गंगा को अविरल बहने दे .

हमारे पूर्वज राजा भगीरथ की तपस्या से गंगा हिमालय से पृथ्वी पर आईं. ऐसी लोकधारणा है. गंगा का उद्गम हिमालय में गंगोत्री से 21 किमी दक्षिण-पूर्व स्थित गोमुख से माना जाता है. गंगा सूखे और पानी की कमी से जनता को मुक्ति दिलाती हैं. वैसे कुछ लोगों का मानना है कि धरती पर आने के लिए गंगा ने अपना रास्ता खुद बनाया था.

गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक लगभग 2.5 किलोमीटर तक लम्बी गंगा नदी उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल ही नहीं बल्कि अपनी एक शाखा पद्मा के रूप में बंगला देश की भी जीवनरेखा बनी हुई हैं. इसके किनारे अनेक बड़े शहर और तीर्थस्थल हैं. गंगा को हम देवी और उसके पानी को अमृत मानते हैं. लेकिन पिछले 100 साल से हमने गंगा की दुर्गति कर दी है.

प्रदूषण के बड़े कारण

  1. गंगा पर बने डैम-बांध, औद्योगिकीकरण, धार्मिक कर्मकांडों ने इसे सबसे अधिक प्रदूषित नदी बना दिया है. कारखानों का जहरीला कचरा, सैकड़ों नगरों का गंदा पानी और मल-मूत्र, सैकड़ों लाशें, मंदिर व घरों की सड़ी पूजा सामग्री इसी नदी में प्रवाहित होती है.
  2. गंगा का पानी अब न पीने लायक रहा और न नहाने लायक. मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी गंगा अब वह गंगा नहीं रहीं, जिसकी महिमा हम हजारों साल से सुनते आ रहे हैं. प्रदूषण के कारण बनारस में गंगा पानी घाट किनारे जून और जुलाई, 2021 में हरा हो गया था. गंगा में काई और सैवाल लग गया था.
  3. गंगोत्री से नरोरा के बीच बने दर्जोंनों डैम, बांध और नहरों में बंद गंगा बुलंदशहर तक आते-आते दम तोड़ देती हैं. गंगा का 60 फीसदी पानी दिल्ली की जरूरतों को पूरा करने के लिए दे दिया जाता है. शेष 40 फीसदी पानी का बड़ा हिस्सा कई आश्रमों और व्यापारियों ने छीन लिया. आम लोगों के हिस्से में नाम मात्र का गंगाजल जो मिला, उसमें बरसाती और सहायक नदियों का जल, नालों से गिरने वाला गंदा पानी तथा हजारों कल-कारखानों का कचरा भरा है.
  4. वैसे तो गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया है लेकिन गंगा की सफाई, घाटों की सफाई और सौंदर्यीकरण के नाम पर हजारों करोड़ रुपये पानी में बह गया और यह रुपया गंगा परियोजनाओं से जुड़े लोगों की जेब में चला गया.
  5. बनारस में सिर्फ गंगाघाट पर घूमने-टहलने, तफरीह के साधनों का निर्माण, गंगा आरती व भजन कीर्तन पर रुपये खर्च हुए. सैलानियों की सुविधा के लिए कई घाटों पर चार साल पहले जो पेयजल टंकियां लगीं थीं, उसमें कभी पानी आया ही नहीं. पानी की ये टंकियां टूटी पड़ी हैं. गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अविरलता पहली शर्त है. जिस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया. इंसान अपनी सुविधाओं के लिए बिजली पैदा करने को गंगा पर डैम बनाया, जिससे गंगा की अविरलता बाधित हुई.
  6. बनारस में गंगा उसपार साढ़े पांच किलोमीटर लम्बी “रेत की नहर” बनाई गई है, जिसकी चौड़ाई लगभग 45 मीटर है. नहर के दोनों किनारों पर बालू का ढेर लगा है. जाहिर सी बात है कि इससे गंगा का जलस्तर जब बढ़ेगा तो बालू पुन: नहर में गिरेगा. नदी के जानकारों का मानना है कि इससे गंगा का धारा प्रभावित होगी और अस्सी से दशाश्वमेध घाट तक किनारे सिल्ट जमा हो जाएगी. पंचगंगा घाट के आगे कटान भी शुरू हो जाएगा.
  7. बनारस में मीरघाट, ललिता घाट, जलासेन और मणिकर्णिका श्मशान के सामने लगभग 800 मीटर लम्बाई और 150 मीटर चौड़ाई में गंगा की धारा को बालू व मलबे से पाटने के कारण भी धारा प्रभावित होगी. इसका असर तो जून व जुलाई में ही देखने को मिला, जब गंगा का पानी काई लगने के कारण हरा हो गया था. काई / सैवाल की सफाई के लिए प्रशासन ने जर्मनी की तकनीक पर रासायनिक घोल का छिड़काव दशाश्वमेध घाट के आसपास कराया था.
  8. स्वयं शुद्धिकरण क्षमता

दरअसल नदियां खुद अपनी सफाई कर लेती हैं. बस, शर्त यह है कि उसकी धारा को अविरल बहने दीजिए. हमने खुद विकास के नशे में गंगा के पानी को जहरीला बना दिया है. हिमालय में जब तक ग्लेशियर हैं, तब तक गंगा भी बहती रहेंगी लेकिन विकास की जिस अवधारणा को हम अपनाए हैं, उस पर विराम नहीं लगा तो भविष्य में गंगा का प्राचीन वैभवशाली सम्मान नष्ट होना तय है.

सिर्फ गंगाआरती और भजन-कीर्तन करने से गंगा को प्रदूषण मुक्त नहीं किया जा सकता है.
#सुरेशप्रताप

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