वैक्सिन और आयुर्वेदीय रसायनचिकित्सा

                                                                                                    डा. आर. अचल*

शरीर के लिए असात्म्य द्रव्यों का:क्रमशः सेवन, उस द्रव्य को शरीर के लिए सात्म्य बना देता है (सात्म्य क्रमेण …….. च.सं.)। महर्षि चरक  के इसी कथन पर आधुनिक आयुर्विज्ञान का व्याधि प्रतिरोधक प्रयोग चिकित्सा वैक्सिनआश्रित है। परन्तु जहाँ आधुनिक आयुर्विज्ञान भिन्न-भिन्न व्याधियों के लिए भिन्न-भिन्न प्रतिरोधकों(वैक्सिन) पर केन्द्रित है वहाँ प्राचीन आयुर्विज्ञान अपनी समग्रता मूलक चिंतन के कारण रसायन चिकित्सा के रूप में शरीर की समग्र व्याधि प्रतिरोधक शक्ति के संवर्धन पर केन्द्रित रहा है।

​व्याधियों के प्रतिरोध के लिए वर्तमान में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने अनेक प्रकार के टीकों (वैक्सिन ) का अनुसंधान हुआ है। टीकों का विकास इस सिद्धान्त पर किया गया है कि उस रोग के कारक जीवाणु या विषाणुक विष की घातक रहित सूक्ष्म मात्रा व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कराया जाता है। इस मात्रा का व्यक्ति सहन कर लेता है,अर्थात उस विषाणु,जीवाणु के एण्टीवाडीज विकसित हो जाते है। इसके पश्चात् उस जीवाणु या विषाणुक विष का प्रभाव उस व्यक्ति पर नहीं होता है। यह सिद्धांत सर्वप्रथम 1890 में जर्मन जीवाणु वैज्ञानिक बेहरिंग ने प्रतिपादित किया। इस संदर्भ में आधुनिक अन्वेषणों के अनुसार यह स्पष्ट हुआ है कि उस व्यक्ति के शरीर में उस विष (Taxic) के विरूद्व एक प्रतिविष (एण्टीवाडीज) उत्पन्न हो जाता है। जिससे उस जीवाणु या विषाणु का विष निष्प्रभावी हो जाता है। उसे अर्जित रोगप्रतिरोधक क्षमता कहते है। इसके अतिरिक्त आगे के अनुसंधानों से यह ज्ञात हुआ कि शरीर प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता भी होती है जो अन्यान्य व्याधियों से शरीर की सुरक्षा करती है। इसी प्राकृतिक क्षमता के परिणाम स्वरूप शरीर किसी भी व्याधि से पीड़ित होने के पश्चात आरोग्य को प्राप्त करता है। आज की सबसे व्यापक विभीषिका कोरोना कोविड इसीलिए भयावह बना हुआ है।

​प्राचीन आयुर्विज्ञान के महर्षियों ने सदियों पूर्व ही इस रोग प्रतिरोधक शक्ति का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इसीलिए आयुर्वेद महर्षियों ने व्याधि प्रतिरोधक शक्ति के संवर्धन व सक्रियता के लिए रसायन चिकित्सा के सूत्र दिये हैं। चरकादि आचार्यो के अनुसार ”जो व्याधि व जरा (बुढ़ापा) का प्रतिरोध करता है वही रसायन चिकित्सा है।”

​रसायन चिकित्सा में गुण विशेष औषधियाँ होती है। बल्य रसायन, मेध्य रसायन, त्वक रसायन आदि। इस वर्ग विशेष का तात्पर्य ये उदस अंगविशेष के व्याधि का प्रतिरोध करती है। या प्रतिरोधक शक्ति को सवंर्धित करती है। इसमें ऐसी भी औषधियाँ जो सम्पूर्ण शरीर के व्याधि प्रतिरोधक शक्ति को सक्रिय एवं सबल करने में सक्षम है।रसायन औषधियों के प्रयोग में दो विधियाँ आचायों ने बतायी हैः-

(1) ​कुटी प्रवेशिक रसायन विधि- यह विधि पूर्णतः विशेषज्ञ वैद्य/चिकित्सक के संरक्षण में प्रयोग की जाती है। कुटी अर्थात् वर्तमान में वातानुकुलित कक्ष में शोधनादि संस्कारों के पश्चात रसायन औषधियों का सेवन किया जाता है। इस वर्ग में भल्लातक, आमलकी, च्यवनप्राश, ब्रह्नयादि रसायन आते हैं।

(2) ​वातातपिक रसायन विधि- यह सामान्य वातावरण, सामान्य परिचर्या में विशेषज्ञ चिकित्सक के परामर्शानुसार सेवनीय विधि है। यह जनसामान्य उपयोगी विधि है। इसीलिए इस वर्ग के रसायन सूत्रों को ही यहाँ उधृत करना सार्थक एवं उयुक्त है।

1.​शीतल जल, दूध, मधु, गोधृत मे एक-एक या दो-दो या तीन-तीन या सभी को एक साथ मिलाकर प्रातः काल सेवन करने से युवा अवस्था लम्बे समय तक बनी रहती है।

2.​गुड़, मधु, सोठ, पिपली या सेंधा के साथ-2 हरड़ का एक वर्ष तक प्रतिदिन सेवन करता है। वह सौ वर्षो तक सुखी जीवन जीता है।

3.​मधु, मिश्री, घी के साथ आँवलों का स्वरस 1 तोला प्रतिदिन सेवन करने वाला व्यक्ति वृद्धावस्था में भी रोगरहित हो युवा की तरह जीता है।

4.​पके आँवलों को विडंग चूर्ण को विजयसार के पात्र मे एक वर्ष तक रखकर प्रतिदिन शहद से लेने पर युवावस्था का विनाश नहीं होता है।

5.​खैरसार-विजयसार के क्वाथ में त्रिफला चूर्ण को सात भावना देकर घी-मधु से प्रतिदिन 1 वर्ष तक सेवन करने से सभी व्याधियों से सुरक्षित रहकर जीया जा सकता है।

6.​पुनर्नवा को तत्काल उखाड़कर कल्क बना 2 तोला की मात्रा में दूध के साथ 15 या 2 माह या 6 माह या 1 वर्ष पीने से वृद्धावस्था में भी युवा सदृश्य होता है।

7.​शतावरी कल्क तथा क्वाथ 1 तोला गोधृत व मिश्री के साथ सेवन करने से कोई व्याधि पिड़ित नहीं कर सकती है।

8.​असगंधा चूर्ण 1 तोला दूध या घी या तेल या गुनगुने जल से 15 दिन सेवन करने से शरीर पुष्टि को प्राप्त करता है।

9.​गोखरू, आँवला, गुर्च चूर्ण को घी, मधु में मिलाकर प्रतिदि लेने वाला व्यक्ति वीर्यवान, रतिकर्म स्थिर, रोगरहित, दीर्घायु व आजीवन काले बालों से युक्त रहता है।

10.​1 माह तक भृंगराज स्वरस 1 से 2 तोल पान कर दूग्ध युक्त शलि चावल खाने वाला व्यक्ति बल व पराक्रम युक्त हो सौ वर्ष जिवित रहता है।

11.​एक मास तक बाल बच चूर्ण 2 से 4 रत्ती दूध, तेल या घी से प्रतिदिन लेने से बुद्धि, मेधा, वाक शुद्धि सहित सर्वआरोग्य होता है।

12.​छः मास तक बकरी का दूध पीने वाले बच्चे को क्षयरोग का भय नहीं होता है।

13.​तुलसी पत्र (20 से 50) मधु से सेवन करने से खसरा, गलसुआ, रूबैला जैसे संक्रमण नहीं होते हैं।​

14.​सत्यानाशी मूल 4 ग्रा0 पीसकर 50 ग्रा0 दही से खिलाने पर कुत्तापिष (श्वानदंश) का प्रभाव नही होता है।

15.​गुर्च का क्वाथ 4 तोला या स्वरस 2 तोला शहद से पान करने पर जनपदोध्वंस (महामारी) वयाधि का प्रभाव नहीं होता है।

16. मधुयष्टीचूर्ण शहद या दूध से आधा तोला नियमित ग्रहण करने से मेधा दृष्टि क्षत-क्षय आदि अनेक व्याधियों से सुरक्षित एवं यौवन से परिपूर्ण जीवन होता है।

रसायनों का सेवन शरीर बल,आयु के अनुसार प्रभावी होता है।इस लिए इसका सेवन विशेषज्ञ (वैद्य)के परामर्श से ही करना चाहिए।

                      *सम्पादक-ईस्टर्न साइंटिस्ट जर्नल एवं आयोजन समिति सदस्य वर्ल्ड आयुर्वेद कांग्रेस

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