उत्तरकाशी में द्रौपदी माला आर्किड की बगिया

फूलों की दुनिया में अपनी खूबसूरती, अनूठेपन और खुशबू की वजह से ऑर्किड की अलग ही पहचान है।पत्रकार लोकेन्द्र सिंह बिष्ट ने उत्तरकाशी शहर के बीचोंबीच माँ गंगा के तट पर केदारमार्ग अपने निवास में स्थित अपनी छोटी सी बगिया में द्रौपदी माला नामक फूलों की सुंदर दुनियाँ बसायी है। इन दिनों यहां ऑर्किड के दिलकश फूल खिल रहे हैं। इनमें से एक खास ऑर्किड फूल है द्रौपदीमाल।
माना जाता है कि द्रौपदी जी इस फूल को माला व गजरे के रूप में इस फूल को पहनती थी। ये आसाम व अरुणाचल प्रदेश का राज्य पुष्प भी है और बीहू उत्सव के समय नृत्यांगनाएं ऑर्किड की द्रौपदीमाला को पहनती हैं।
इधर सरकारी स्तर पर वन विभाग ने भी हल्द्वानी में फूलों की खेती को प्रोत्साहन देने और ऑर्किड की कई किस्मों को सहेजने के उद्देश्य से ऑर्किड उद्यान बसाया गया है।
अंतर्राष्ट्रायी बाजार में कट फ्लावर श्रेणी में ऑर्किड की अच्छी मांग होती है। हिमालयी राज्यों का पर्यावरण तो इसके अनुकूल है ही, इसके अलावा दक्षिण भारत के राज्य केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र भी इसका व्यवसायिक उत्पादन करते हैं।
लोकेंद्र सिंह बिष्ट बताते हैं कि थोड़ा सा प्रयास किया जाय तो धार्मिक, औषधीय व सांस्कृतिक विरासत लिए द्रौपदिमाला की सुगंध से देवभूमि भी महक सकती है। द्रोपदी के गजरे पर सजने वाला इस पुष्प को द्रौपदिमाला कहते हैं।।
माँ सीता काे भी ये पुष्प काफी प्रिय थे। इसलिए इसका एक नाम सीतावेणी भी है।।
द्रोपदीमाला नामक यह फूल असम व अरुणाचल प्रदेश का राज्य पुष्प है। मेडिकल गुणों की वजह से इसकी खासी डिमांड है। आंध्र प्रदेश में इसकी तस्करी भी होती है। महाभारत की अहम पात्र द्रोपदी जी माला के तौर पर इन फूलों का इस्तेमाल करती थीं। जिस वजह से इसे द्रोपदी माला कहा जाता है।
वनवास के दौरान सीता मां से भी इसके जुड़ाव का वर्णन है। यहीं वजह है कि महाराष्ट्र में इसे सीतावेणी नाम से पुकारा जाता है।

अरुणाचल प्रदेश और असम का राज्य पुष्प फाक्सटेल आर्किड इन दिनों उत्तरकाशी के मांगली बरसाली गांव में भी महक रहा है। और उत्तरकाशी शहर के बीचोंबीच भी।।
दरअसल लोकेंद्र सिंह बिष्ट बताते हैं कि उन्होंने इस फूल की पौध को परीक्षण के तौर पर अपने गाँव के अखरोट के पेड़ से इसे निकालकर लाये थे ।। इसको अपने आवास उत्तरकाशी में लगे बांझ के पेड़ से मिट्टी का लेप लगाकर बांध दिया था। कुछ पौध को टोकरी में भी लगाया। लेकिन 8 महीने तक इसकी देखभाल करने के बाद इस मई माह में बांझ के पेड़ से लटके इस द्रौपदिमाला पर सुंदर फूल खिल आये। जबकि टोकरी व गमले में लगे पौध पर फूल नहीं खिले। इससे यही लगता है कि द्रौपदिमाला में फूल खिलने के लिए इसको लटकन की आवश्यकता होती होगी।।
इस पुष्प को धार्मिक, औषधीय और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी माना जाता है।
उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 12 किमी दूर मांगली गांव में एक अखरोट के पेड़ पर यह पुष्प पिछले 20 वर्षों से खिलता आ रहा है, जो बेहद ही खूबसूरत है और आने-जाने वाले ग्रामीणों व अतिथियों को आकर्षित कर रहा है।
लोकेंद्र सिंह बिष्ट बताते हैं कि द्रौपदीमाला का फूल इतना सुंदर और आकर्षक होता है कि इसे असम और अरुणाचल प्रदेश ने इसे अपना राज्यपुष्प घोषित कर रखा है।
मान्यता है कि द्रौपदी इन फूलों को माला के तौर पर इस्तेमाल करती थीं। इस वजह से इसे द्रौपदीमाला कहा जाता है। वनवास के दौरान सीता से भी इसके जुड़ाव की मान्यता है। यहीं वजह है कि महाराष्ट्र में इसे सीतावेणी नाम से पुकारा जाता है। लोकेंद्र सिंह बिष्ट बताते हैं कि मांगली गांव में अखरोट के पेड़ पर द्रौपदीमाला का पौधा पिछले दस वर्षों से है। इस पौधे पर हर बार फूल खिलते हैं। लेकिन, इस पौधे के अलावा पूरे क्षेत्र में दूसरा पौधा नजर नहीं आया है। इसके बारे में स्थानीय ग्रामीणों को भी कोई जानकारी नहीं है। जबकि, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया व भारत के अरुणाचल प्रदेश, असम व बंगाल में ये बहुतायत में प्राकृतिक रूप से उगता है।
गँगा स्वच्छता व पर्यावरण के क्षेत्र में पिछले 20 वर्षों से कार्य कर रहे लोकेन्द्र सिंह बिष्ट का कहना है कि फाक्सटेल आर्किड अधिपादप श्रेणी का पौधा है। ये अखरोट, बांज और अन्य पेड़ों के तने, शाखाएं, दरारों, कोटरों, छाल आदि में मौजूद मिट्टी में उपज जाते हैं। वे कहते हैं कि वे उत्तरकाशी के अपने गांव मांगलीसेरा में एक अखरोट के पेड़ में इस फूल को पिछले 10 वर्षों से देख रहे है , उनका कहना है कि गांव में इस पौधे का बीज हवा से ही पहुंचा होगा। साथ ही अखरोट के पेड़ पर इस पौधे के पनपने के लिए अनुकूल स्थिति व वातावरण मिला होगा। बिष्ट कहते हैं कि फाक्सटेल आर्किड के पौधे आसानी से पनपते नहीं हैं। इनके लिए अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है।
गौरतलब है कि जानकारों के मुताबिक अस्थमा, किडनी स्टोन, गठिया रोड व घाव भरने में द्रोपदीमाला को दवा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। पंश्चिम बंगाल व आसाम में इसे कुप्पु फूल के नाम से जाना जाता है।
बीहू नृत्य में महिलाओं का श्रृंगार किया जाता है।।
असम का बीहू नृत्य दुनियाभर में प्रसिद्ध है। सांस्कृतिक कार्यक्रम से लेकर शुभ अवसर में महिलाएं बीहू नृत्य किया जाता है।
मान्यताओं के मुताबिक इस दौरान महिलाएं बालों में इस फूल को जरूर लगाती है। वहां इसे प्रेम का प्रतीक माना जाता है। आपको बताते चलें कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम पंचवटी नासिक में रूके थे। तब सीता मां ने भी इस फूल का इस्तेमाल किया था। जिस वजह से इसे सीतावेणी भी कहा जाता है।
बांज व अन्य पेड़ों से जुड़ाव द्रोपदीमाला आर्किड प्रजाति का हिस्सा है। आर्किड जमीन व पेड़ दोनों पर होता है। आमतौर पर १५०० मीटर ऊंचाई पर मिलने वाला द्रोपदीमाला बांज, अखरोट व अन्य पेड़ों पर नजर आ जाता है। धार्मिक व औषधीय महत्व से अंजान होने पर लोग संरक्षण के प्रति जुड़ाव नहीं रख पाते। चारे के चक्कर में नुकसान पहुंचा देते हैं। उत्तराखंड में उत्तरकाशी के माँगलीसेरा गांव में, नैनीताल व गौरीगंगा इलाके में देखा जाता है। इसका अंग्रेजी नाम फॉक्सटेल है।

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