अमेरिका का राष्ट्रपति आम चुनाव कैसे होता है

चुनाव प्रक्रिया बहुत जटिल

अमेरिका
शिव कांत शर्मा बीबीसी हिंदी रेडियो के पूर्व संपादक, लंदन

अमेरिका में आजकल 59वें राष्ट्रपति आम चुनाव चल रहे हैं जो हर चाल साल बाद होते हैं। चुनाव के लिए 3 नवंबर का दिन तय है लेकिन मतदान की शुरुआत पिछले महीने से ही हो चुकी है और अब तक लगभग 10 करोड़ लोग अपना वोट डाल चुके हैं जो अमेरिका के कुल मतदाताओं के 45 प्रतिशत के आस.पास है।

अमेरिका में आम चुनाव कराने के लिए भारत की तरह केंद्रीय चुनाव आयोग जैसी कोई संस्था नहीं है। चुनाव भले ही राष्ट्रपति के हों, राज्य स्तर के हों या स्थानीय निकायों के, उन्हें कराने की ज़िम्मेदारी काउंटी प्रशासनों की होती है। अमेरिका में कुल मिलाकर 3243 काउंटियाँ या तहसीलें हैं जिनके चुनाव बोर्ड सारे चुनाव कराते हैं। प्रत्येक काउंटी अपने-अपने चुनावी नियम बना कर चुनाव कराने के लिए स्वतंत्र है और अपनी सुविधा और साधनों के हिसाब से चुनाव कराती है।

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अमेरिका में आप तीन तरह से वोट डाल सकते हैं। डाक के ज़रिए, ड्रॉप बक्से के ज़रिये और व्यक्तिगत रूप से मतदान केंद्रों में जाकर। व्यक्तिगत रूप से मतदान भी दो तरह से किया जा सकता है। चुनाव के दिन और चुनाव से पहले अग्रिम रूप से। अमेरिका के ज़्यादातर राज्य और उनकी काउंटियाँ चुनावी दिन से 5 से लेकर एक हफ़्ते पहले मतदान केंद्र खोल देती हैं जहाँ जाकर आप चुनावी दिन से पहले अपना वोट डाल सकते हैं।

अमेरिका के पाँच राज्य ऐसे हैं जहाँ सारे वोट डाक और ड्रॉप बक्सों के ज़रिये ही डाले जाते हैं। ये राज्य हैं : वॉशिंगटन, ऑरेगन, यूटा, कोलोराडो और हवाई। इनके अलावा 33 राज्यों और राजधानी वॉशिंगटन डीसी लोगों को डाक और ड्रॉप बक्से के ज़रिये वोट डालने का विकल्प देते हैं। बाकी राज्यों में भी आप चाहें तो कारण बता कर डाक के ज़रिये वोट डाल सकते हैं। ऐसे राज्यों में टैक्सास प्रमुख है जो अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है।

डाक चुनाव वाले पाँच राज्यों के अलावा बाकी राज्यों में डाक के ज़रिये वोट डालने के लिए आपको अपनी काउंटी से आवेदन करना होता है। आपका आवेदन पाते ही काउंटियाँ आपका वोट डाक के ज़रिये आपके पास भेज देती हैं जिसे भर कर आप डाक के ज़रिये या फिर ड्रॉप बक्से के ज़रिये भेज सकते हैं। कोरोना की महामारी की वजह से इस बार डाक से चुनाव कराने वाले पाँच राज्यों के अलावा कैलीफ़ोर्निया जैसे 20 और बड़े राज्यों ने सभी मतदाताओं को डाक के ज़रिये उनके वोट भेज दिए हैं ताकि वे चाहें तो डाक या ड्रॉप बक्सों के ज़रिये अपने वोट डाल सकते हैं और मतदान केंद्रों पर जाने और कतारों में लगने से बच सकते हैं।

अब तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार इस चुनाव में 9 करोड़ 10 लाख से ज़्यादा मतदाताओं ने डाक के ज़रिये वोट मँगवाए थे। इनके अलावा 25 राज्यों ने अपने सभी मतदाताओं के पास डाक से उनके वोट भेजे हैं ताकि उनके पास डाक से वोट डालने का विकल्प हो। इनमें से अभी तक लगभग 6 करोड़ लोगों के वोट ही गणना केंद्रों तक पहुँच पाए हैं। ज़्यादातर राज्यों में उन वोटों को वैध माना जाएगा जिनके लिफ़ाफ़ों पर चुनावी दिन यानी 3 नवंबर या उससे पहले की मुहर लगी होगी। इसलिए लोगों का अनुमान है कि इस बार आधे से ज़्यादा वोट डाक या ड्रॉप बक्सों के ज़रिये डाले जाएँगे।

चुनाव से दो दिन पहले तक 10 करोड़ वोटों के डाले जाने से अनुमान लगाया जा रहा है कि इस चुनाव में रिकॉर्ड तोड़ मतदान होगा। पिछले 50-60 साल के चुनावों पर नज़र डालें तो अब तक का सबसे भारी 62.8% मतदान 1960 में हुआ था जब डैमोक्रेटिक पार्टी के युवा उम्मीदवार कैनेडी ने रिपब्लिकन उपराष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को हराया था। सन 2008 के चुनाव में भी 57.1% मतदान ही हुआ था जब बराक ओबामा राष्ट्रपति चुने गए थे। पिछले चुनाव में 13 करोड़ 84 लाख लोगों ने वोट डाले थे और मतदान का प्रतिशत 55.5% था।

दस करोड़ वोट डाले जा चुके हैं और तीन करोड़ से ज़्यादा वोट डाक के रास्ते में हैं। चुनाव के दिन भी भारी मतदान होने की संभावना है क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप डाक से आने वाले वोटों की वैधता पर निराधार सवाल उठाते हुए अपने समर्थकों से चुनाव के दिन बड़ी तादाद में व्यक्तिगत रूप से वोट डालने की अपील कर रहे हैं। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि चुनाव के दिन उमड़ी भीड़ पर आधारित चुनावी सर्वेक्षणों में और वोटों की शुरू की गिनती में वे अपने प्रतिद्वन्द्वी जो बाइडन से आगे निकल जाएँ और अपनी जीत के दावे करने लगें।

लेकिन अमेरिकी चुनाव में हार.जीत की घोषणा की प्रक्रिया भी जटिल है। डाक से आए वोटों को चुनाव के दिन से पहले नहीं खोला जाता और कई राज्यों में उनकी गिनती चुनाव के एक हफ़्ते से लेकर दस दिन बाद ही शुरू की जाती है। इसकी वजह यह है कि पहले डाक से आए वोटों की वैधता की जाँच की जाती है। मामूली भूलों के सुधार के लिए वोटों को मतदाता के पास दोबारा भेजा जाता है ताकि वे भूल.सुधार कर सकें और उनका वोट बेकार न हो। राष्ट्रपति ट्रंप इसी प्रक्रिया में धाँधली और जालसाज़ी की संभावना की बात करते हैं।

क्योंकि इस बार आधे से ज़्यादा वोट डाक से ही पड़ने वाले हैं इसलिए काउंटी प्रशासनों को औसत चुनावों से कह़ी ज़्यादा वोटों की जाँच और गणना करनी पड़ेगी। डाक से पड़ने वाले वोटों में डैमोक्रेटिक पार्टी के वोट ही ज़्यादा होंगे। इसलिए ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी वाले राज्य और काउंटियाँ डाक से प्राप्त वोटों की वैधता और गिनती को लेकर नई-नई आपत्तियाँ उठाने में जुटे हैं।

विस्कोन्सिन राज्य की एक काउंटी ने चुनावी दिन के बाद आने वाले डाक वोटों की वैधता को चुनौती दी थी जिसके जवाब में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य को निर्देश दिया है कि चुनावी दिन के बाद पहुँचने वाले डाक वोटों को चुनावी तारीख़ की मुहर के बावजूद वैध न माना जाए। इसी तरह की आपत्तियाँ पेंसिलवेनिया और उत्तरी कैरोलाइना में भी उठाई गईं जिन पर न्यायालय ने चुनाव तक कोई फ़ैसला देने से मना कर दिया है।

इसीलिए चुनावी प्रेक्षकों को चिंता है कि यदि 3 नवंबर की रात को पहली गणना में किसी एक उम्मीदवार को भारी बढ़त हासिल न हो सकी तो चुनाव का नतीजा सन 2000 के बुश-गोर चुनाव की तरह लटक सकता है। अमेरिका की चुनावी प्रक्रिया के अनुसार विजेता उम्मीदवार को निर्वाचन मंडल के कम से कम 270 वोटों की ज़रूरत है। निर्वाचन मंडल के कुल 538 सदस्य हैं। जिस उम्मीदवार को 270 वोट मिलेंगे वही 59वाँ राष्ट्रपति बनेगा। लोकप्रियता के राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय रुझानों में इस समय जो बाइडन ट्रंप से काफ़ी आगे हैं।

निर्वाचक मंडल के सदस्यों की संख्या अमेरिकी कांग्रेस या संसद के दोनों सदनों के सांसदों की संख्या और राजधानी डीसी के लिए नियत तीन सदस्यों को मिला कर तय होती है। कांग्रेस के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के सांसदों की संख्या 435 है। प्रवर सदन या सेनेट के सेनेटरों की संख्या सौ है। इनमें डीसी के तीन सदस्य जोड़ दें तो मिला कर 538 बैठते हैं जो निर्वाचक मंडल के सदस्यों की संख्या है। इनका राज्यवार बँटवारा हर राज्य की आबादी के आधार पर किया जाता है। इसीलिए कैलीफ़ोर्निया को 55 निर्वाचक दिए गए हैं, टैक्सस को 38, न्यूयॉर्क और फ़्लोरिडा को 29-29 और अलास्का, डेलेवेयर, डेकोटा और मोंताना को केवल तीन-तीन।

चुनाव के बाद सारे वोटों की गिनती और सभी तरह के कानूनी विवादों का निपटारा 8 दिसंबर तक करना होता है। उसके बाद राज्य सरकारें निर्वाचक मंडल के लिए अपने.अपने निर्वाचकों की नियुक्ति करती हैं जो अक्सर राज्यों की विधायिकाओं के सदस्य होते हैं। नब्रास्का और मेन राज्यों को छोड़ कर बाकी सभी राज्यों में जिस उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं उसे उस राज्य के हिस्से में आने वाले सभी निर्वाचकों के वोट मिल जाते हैं।

मिसाल के तौर पर यदि बाइडन को कैलीफ़ोर्निया में बाकी उम्मीदवारों की तुलना में एक वोट भी ज़्यादा मिल जाता है तो कैलीफ़ोर्निया के सभी 55 निर्वाचक उनके माने जाएँगे। नब्रास्का और मेन राज्यों में निर्वाचकों का फ़ैसला सभी काउंटियों में हुई हार.जीत के आधार पर होता है। जिस उम्मीदवार को ज़्यादा काउंटियों में जीत हासिल होगी, राज्य के सभी निर्वाचक उसकी झोली में चले जाएँगे।

सभी राज्यों के निर्वाचक 14 दिसंबर को अपने.अपने राज्यों की राजधानियों में बैठकें करते हैं और औपचारिक रूप से राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को चुनने के लिए वोट करते हैं। यह परंपरा चली आ रही है कि ये निर्वाचक उसी उम्मीदवार को चुनते हैं जिसे राज्य में सबसे ज़्यादा वोट मिले हों। लेकिन यह संवैधानिक बाध्यता नहीं है। कई बार कुछ निर्वाचक अपना मन बदल लेते हैं और उस उम्मीदवार को वोट देते हैं जो उनकी पार्टी का हो। लेकिन पचास राज्यों में ऐसे मन बदलने वाले निर्वाचक मुट्ठी भर ही होते हैं।

नए साल में 3 जनवरी को राजधानी वॉशिंगटन डीसी में अमेरिकी कांग्रेस या संसद की नव निर्वाचित प्रतिनिधि सभा का सत्र आरंभ होगा और 6 जनवरी को प्रतिनिधि सभा और सेनेट का संयुक्त अधिवेशन होगा जिसमें उपराष्ट्रपति माइक पेंस सेनेट के सभापति के तौर पर चुनावी नतीजे की औपचारिक घोषणा करेंगे। इस बीच सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया जारी रहेगी और 20 जनवरी को नया राष्ट्रपति शपथ लेगा।

ग़ौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति के आम चुनाव में राष्ट्रपति के साथ-साथ संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के सभी 435 सदस्यों, सेनेट के 33 सदस्यों, तेरह राज्यों के गवर्नरों, 16 राज्यों की प्रतिनिधि सभाओं और सेनेटों, 26 राज्यों की प्रतिनिधि सभाओं, अनेक शहरों के मेयरों, काउंटी पार्षदों और जजों के भी चुनाव हो रहे हैं। निवर्तमान केंद्रीय प्रतिनिधि सभा में डैमोक्रेट पार्टी का बहुमत दाँव पर है और सेनेट में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत।

भारतीय मूल के उम्मीदवारों में उपराष्ट्रपति पद की दावेदार कमला हैरिस के अलावा पूर्वोत्तरी मेन राज्य से भारतीय मूल की सैरा गिडियन सेनेट की सीट के लिए चुनाव लड़ रही हैं। निकी हेली, बॉबी जिंदल और तुलती गैबार्ड जैसे जाने.पहचाने भारतीय मूल के कई नेता इस बार मैदान में नहीं हैं। फिर भी प्रतिनिधि सभा के लिए भारतीय मूल के कई नेता मैदान में हैं। जिनमें कैलीफ़ोर्निया से डैमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अमी बेरा और रो खन्ना, इलिनोए से रिपब्लिकन पार्टी के कृष्ण बंसल और डैमोक्रेटिक पार्टी के राजा कृष्णमूर्ति, वॉशिंगटन से डैमोक्रेटिक पार्टी की प्रमिला जयपाल और वर्जीनिया से डैमोक्रेटिक पार्टी के मांगा अनंतमुला प्रमुख हैं।

अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की संख्या 41 लाख के आसपास है जो संख्याबल की दृष्टि से बहुत बड़ी नहीं है। लेकिन अपने सामाजिक प्रभाव और संपन्नता के कारण भारतीय समुदाय का अमेरिकी आम चुनावों में ख़ासा प्रभाव रहता है। भारतीय समुदाय के लोगों का झुकाव पारंपरिक रूप से डैमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ ही रहा है। 2008 के ओबामा के चुनाव में भारतीय मूल के 88% लोगों ने डैमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों को वोट दिया था जो घट कर पिछले चुनाव में 77% रह गया था। इस बार यूगव और कार्नेगी न्यास के सर्वेक्षण के अनुसार 72% भारतीय मूल के लोग डैमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय मूल के लोगों के वोटों में सेंध तो लगाई है मगर इतनी नहीं कि उससे डैमोक्रेटिक पार्टी की दीवार हिल जाए।

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