उपनिषद व्यावहारिक ज्ञान के भंडार

उपनिषद व्यावहारिक ज्ञान के भंडार हैं. उपनिषद हमें शिक्षित करते चलते हैं, व्यवहार सिखाते चलते हैं. उपनिषद हमें प्रेरित करते हैं कि उच्च स्तरीय और बुद्धिमत्तापूर्ण, व्यवहार करें. उपनिषदों के बारे इला कुमार का लेख.

उपनिषद पर केन्द्रित करने के पहले मैं  यह इंगित करना चाहती हूँ कि आज जो यहाँ इस सदी के एक आधुनिक समय खंड में हम सभी बैठे हुए हैं, अत्याधुनिक उपकरणों के बल पर पूरे संसार से जुड़ा हुआ महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं ,तो ऐसे समय में हमें अपनी जड़ों की ओर मुड़कर अवश्य देखना चाहिए. अपनी सकारात्मक परम्पराओं के बारे में शिद्दत से सोचते रहने की आदत पाल लेनी चाहिए.

सुनने में कुछ खास यह नहीं लगता लेकिन सकारात्मक परम्पराओं , पुरानी पुस्तकों का , उपनिषदों का अपना दबाव होता है, वे वाकई में विश्व रचतीं हैं.  

स्वस्थ परम्पराओं से जुड़े रहने की आदत हमारी जड़ों को मजबूत बनाए रखेगी और भविष्य में आगे बढ़ने में सहारा देगी . परम्पराएँ अमूल्य होती हैं , उपनिषद भी !

उपनिषद ज्ञान से जुड़े तथ्यों और कथ्यों पर केन्द्रित करते हुए सबसे पहले मैं कुछ कथ्यों को इंगित करना चाहूंगी . इसी संदर्भ में दो महत्वपूर्ण कहानियों के कुछ अंशों को उद्धृत करती हूँ .

छान्दोग्य उपनिषद के प्रथम अध्याय के दसवें खंड में चक्र के पुत्र उषस्ति कुरू देश में इभ्य नामक गाँव में पत्नी के साथ रहता था, जिन दिनों ओले और पत्थर पड़ने खेती वगैरह नष्ट हो गई थी और घर में खाने के लिए अन्न नहीं था, संदर्भ आता है, वह राजा के द्वारा किए जा रहे यज्ञ में जाने की तैयारी में है, लेकिन गरीबी ऐसी कि घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं .

तो वह एक हथीवान के जूठे उड़द मांगकर खाता है लेकिन जब वही हथीवान अपने पात्र उसे जल भी देने लगा तो उषस्ति ने मना कर दिया कि पानी तो कहीं से भी मिल जाएगा.

तो यह है व्यवहार का पक्ष कि प्राण मनुष्य के लिए सर्वोपरि है उसे बचाने के लिए किया गया प्रयत्न उचित हैं.

उपनिषदों ने ज्ञान को हर कालखंड में  बचाए रक्खा है. हाँ, यह बात और है कि सबों को यह आकर्षित नहीं कर पाता, लेकिन जिन्हें उपनिषदों ने दिया है, उन्हें बहुत दिया है. ज्ञान से लबालब भर दिया है .

उपनिषदों के बारे में चर्चा करते हुए सबसे पहले इसके शब्दार्थ पर नजर जाती है, उपनिषद योग है –       उप + नि और सद् धातु का यानि उप  नि  सद  कि गुरू के निकट बैठकर ज्ञान प्राप्ति की चर्चा.

इस चर्चा के बीच बड़ी बड़ी गुत्थिओं को सुलझाने की क्षमता उपनिषदों में दीख पड़ती है .

तो इस तरह के अनेक कथ्य उपनिषदों के बीच हैं, जो अपने व्यवहृत गुणों कारण हमें प्रभावित भी करते हैं, हमारे करीब भी आते हैं.

दूसरी कहानी है- विदेह राज जनक के बहुचर्चित सभा की. जहाँ लम्बे-लम्बे वाद-प्रतिवाद ब्राह्मणों और याज्ञवल्वय के बीच हुआ था. यह कथा बृहद आरण्यक उपनिषद के तृतीय अध्याय के प्रथम खंड से शुरू होती है.

यहाँ मैं इस कहानी का बिलकुल छोटा सा अंश की बात करती हूँ-

विदेह राज जनक ने बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें अनेकानेक ब्राह्मण कुरू देश आए थे, विदेह राज जनक ने उस यज्ञ में एक हजार गायों के दोनों सींगों में दस-दस सोने के सिक्के बंधवा दिए थे और घोषणा करवा दी कि जो ब्रह्मनिष्ठ हो वह इन गायों को ले जाए. कुरू और पांचाल देशों से आए ब्राह्मणों समेत किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वह गौवों को ले जाए. लेकिन महाज्ञानी याज्ञवल्क्य  ने अपने शिष्य सामश्रवा को कहा कि वह गौवों को हांक ले जाए.

उस सभा में जो भी ब्राह्मण मौजूद थे, वे याज्ञवल्क्य   जी के आचरण से बहुत नाराज हो गए और तब अष्बल नाम के ब्राह्मण ने उनसे पूछा- “क्या आप ब्रह्मनिष्ठ हैं ?”

याज्ञवल्क्य जी ने कहा,

“ब्रह्मनिष्ठ को तो हम प्रणाम करते हैं – नमो वयं ब्रह्मनिष्ठाय . हमें तो गौवों की इच्छा है. ”

तो ज्ञान के दर्प को साथ रखते हुए याज्ञवल्क्य जी ने जिस विनम्रता और व्यवहार कुशलता के साथ पूछे गए उद्धत प्रश्न का उत्तर दिया था वह सराहनीय है, उन्होंने नियम भंग नहीं किया, बिलकुल नहीं कहा कि

हाँ ! मैं हूँ ब्रह्मज्ञानी ! ले जाऊँगा गायों को !

तो हम देखते हैं कि उपनिषद अनजाने रूप से भी हमें ज्ञान देते,शिक्षित करते चलते हैं, व्यवहार सिखाते चलते हैं. शायद उपनिषद हमें प्रेरित करते हैं कि उच्च स्तरीय और बुद्धिमत्तापूर्ण, व्यवहार समाज में करें और अपने बल पर एक बेहतर समाज को आकार देते चलें.

अब तथ्यों की बात .

अभी के समय में हम देखते हैं कि भारतीय समाज में बार-बार ब्राह्मण, ब्राह्मणवाद, जातिवाद वगैरह को लेकर वितंडा खड़ा किया जाता है .

इस सन्दर्भ में यहाँ उपनिषद की बात को उद्धृत करना चाहूँगी- वज्रसूचिकोपनिषद में ब्राह्मण के परिभाषा की बात उठती है कि किसे ब्राह्मण कहेंगे तो यह उपनिषद बड़े औदार्यपूर्वक कहता है-………..दम्भाहंकारादि मिरसंस्पृष्ट चेता वर्तत स्वमुक्तलक्षणों यः स एव ब्राह्मण इति…अर्थात दंभ, अहंकार आदि से रहित, काम राग दोषों से रहित तथा सत्य, ज्ञान से युक्त निर्विकल्प रहने वाला, जिसने अनुभव द्वारा ज्ञान प्राप्त किया हो – उसे ही ब्राह्मण कहेंगे ! 

यह परिभाषा हमें सही रूप से ब्राह्मण की पहचान कराती है.  

एक ओर ब्राह्मण की पहचान करवाती है तो दूसरी ओर अभी के ब्राह्मणों के आचार-व्यवहार पर शंका भी उठाती है. खैर .

धर्म का सार तत्व

मन में सहज प्रश्न उठता है कि क्या पुरातन समाज में व्यक्ति के व्यवहार के आधार पर उसकी जाति निश्चित की जाती थी ? लगता है कि यही होता होगा और ऐसे में वशिष्ठ मुनि तथा विश्वामित्र के बीच ब्रह्म ऋषि की बात के तकरार की याद आती है .

इसी तरह से छान्दोग्य के   अध्याय में जानश्रुति पोत्रायण और रैकव कथा के बीच राजा उपहार वगैरह लेकर.

इसी तरह एक कथा के बीच में शूद्र की बात आती है- जानश्रुति के पौत्रायण को आत्मज्ञान की लालसा जगती है और वह राजा उपहार लेकर गाड़ीवान रैकव के पास जाते हैं , तो आत्मज्ञानी रैकव उसे फटकार देते हैं –          “ रे शूद्र ! ….. यह धन , रथ तू अपने ही पास रख ! “

यहाँ पर हमें यह समझ में आता है कि उस पुरातन काल में जिसे आत्मज्ञान नहीं था, उसे शूद्र की उपमा दी जाती थी शायद .

इसी तर्ज पर प्रवाहण की सभा में जब श्वेतकेतु जाता है तो जीवल के पुत्र , ब्रह्मज्ञानी प्रवाहण भरी सभा में श्वेतकेतु से उसके ज्ञान को परखने के लिए पाँच प्रश्न  ( जीवों के गमनागमन से संबंधित ) पूछते हैं. वह जवाब नहीं दे पाता तो प्रवाहण एक तरह से उसे उसकी जगह दिखा देते हैं , वे श्वेतकेतु से  कहते हैं –       “ जब तुम इन प्रश्नों के उत्तर नहीं जानते , फिर तुम स्वयं को शिक्षित कैसे कहते हो ?”

अर्थात् यदि सर्वोच्च ज्ञान आपने नहीं पाया तो आप अशिक्षित !

इस तरह के अनेक तथ्य उपनिषदों के बीच हैं, जो अपने व्यवहृत गुणों कारण हमें प्रभावित भी करते हैं, हमारे करीब भी आते हैं.

उपनिषद मंत्र, उपासना और ज्ञान के अनेकानेक खण्डों से मिलकर बने हैं .  

उपनिषदों के मंत्रों, उपासनाओं या कथाओं-उपकथाओं  मुख्य स्वर आत्मज्ञान ही हैं.

मुख्य उपनिषद 11 हैं , वैसे 108 हैं लेकिन कहीं – कहीं  1018 उपनिषदों के होने की बात भी कही जाती है 

आत्म की चर्चा, उसकी खोज, उस पर विचार-विमर्श उपनिषदों में सतत् प्रवाहित धारा है.

और यही धारा ने उपनिषदों को भारत से उठाकर विश्व में प्रतिष्ठित किया है. कहते हैं कि महान दार्शनिक शापन्हूवर के टेबल पर हमेशा उपनिषद मौजूद रहती थी . 

उपनिषद बड़े कायदे से आत्म को, स्व को, ब्रह्म को निरूपित करते हैं, विस्तार से उसकी चर्चा करते हैं और हम देखते हैं कि इस ज्ञान चर्चा में तरह-तरह के लोग सम्मिलित होते हैं, न स्टेटस का बंधन, न स्त्री-पुरूष का भेदभाव, न ही बच्चे या बूढ़े होने की समस्या. एक ओर छान्दोग्य में गाड़ीवान सीधे-सादे रैकव है जो ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, दूसरी सत्यकाम हैं जो सिंगल मदर जबाला के पुत्र रहे और माता के नाम पर ही सत्यकाम जाबाल कहलाये . 

प्रवाहण तो स्वयं राजा हैं ज्ञानी है और उषस्ति एकदम गरीब . उपनिषद के बीच देवराज इन्द्र और असुरराज विरोजन का नाम आता है , जो जाते हैं प्रजापति के पास ज्ञान प्राप्त करने .

 बृहदारण्यक में मैत्रेयी और गार्गी का नाम ज्ञानियों की श्रेणी में आता है और कठोपनिषद का बालक नचिकेत तो स्वयं यम से ब्रह्म की शिक्षा पाता है –

ब्रह्म को निरूपित करने के क्रम में उपनिषद उसे तरह-तरह बताने की चेष्टा करते हैं- जैसे- वैश्वानर विद्या के द्वारा, भूमा विद्या के द्वारा या फिर अक्षर ब्रह्म के द्वारा.

वैश्वानर के बारे में केकय कुमार अश्वपति ने मुमुक्ष प्राचीन, शाल, सत्ययर इंद्रद्युम्न, बुडिल तथा उद्धालक को कुछ इस प्रकार बताया था- इस वैश्वानर आत्मा का मस्तक द्युलोक, चक्षु आदित्य, प्राण वायु तथा देह का मध्य भाग एवं बस्ति क्रमशः आकाश और जल हैं और पृथ्वी चरण है. 

हम देखते हैं कि भारतीयता अपने आध्यात्मिक विरासत को अलग-अलग कोणों से दर्शाने की क्षमता रखती है, एक ओर वह स्थूल-शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की बात करती है, तो दूसरी ओर मन प्राण बुद्धि-जीव और आत्मा-परमात्मा की. जीव गमन के पथ की.  देवयान – धूमयानमार्ग – की बात भी उपनिषदों में वर्णित है, और ब्रह्म के विशाल आकर की भी.

उपनिषद बहुफलकीय भारतीय ज्ञान की विरासत बात को कायदे से बताते हैं , सम्पूर्ण विश्व और ब्रह्मांड में उपस्थित ‘एकोऽहम ’ की बात को कहते है   इसी विरासत के बारे में सोचते हुए, कहना चाहूँगी कि हमें अनन्तता की तर्ज पर विचारना चाहिए, सोचना चाहिए…..“आकाशवत् अनन्तोऽम घटवत् प्राकृत जगत्. इति ज्ञानम् तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः.”

अष्टावक्र – संहिता का यह श्लोक है, जो अनन्त आकार में स्थित होकर …………ब्रह्मांड को घट की तर्ज पर निहारता है और ब्रह्म को प्रतिष्ठित करता है .  

 इला कुमार 

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