खेतों में कँटीले तार पर प्रतिबंध से किसानों में भारी नाराज़गी

उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों द्वारा जानवरों से खेत में फसलों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले ब्लेड वाले/ कँटीले तार को पूरी तरह प्रतिबंधित करने का आदेश दिया है. इस आदेश से किसानों में नाराज़गी है और यह चुनाव में सत्तारूढ़ डाल भारतीय जनता पार्टी भाजपा के लिए परेशानी बन सकता है.

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में पहले नीलगायें बड़ी समस्या रहीं। कुछ वर्षों से छुट्टा जानवर सबसे बड़ी समस्या बन गये हैं। अनेक घोषणाओं के बावज़ूद सरकार इसका कोई जमीनी हल दे पाने में नाकाम रही है। इसका कारण प्रशासनिक प्रणाली के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार भी हो सकता है? अलबत्ता, राज्य में दिन-रात घूमने वाले आवारा मवेशियों ने फसलों को भारी नुकसान पहुँचाया है। इस तरह की क्षति अन्दाज़ने या कूतने की ना तो कभी-कहीं-कोई गरज़ दिखी और न ही इसकी कोई तकनीक ईज़ाद हो पायी। इससे क़रीब-क़रीब सभी क्षेत्रों और गाँवों में बीघा-दो बीघा तक की जोत वाले बहुतायत किसान खेती ही छोड़ चुके हैं।


मज़दूरी के अलावा डीज़ल, खाद, बीज, रासायनिक दवाओं वगैरह की महँगाई के साथ सिंचाई साधनों तथा पानी की अनुपलब्धता से भी ख़ासकर छोटे और मझोले किसान तंग हैं। खेती के लिए बैल न पाल पाने की विवशता तथा लगातार छोटे होते खेत अलग कठिनाई हैं। कारण ये ट्रैक्टर से जोतने लायक नहीं रहे।

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इसी के साथ कड़ी मेहनत से भागने तथा गाँवों में मज़दूरों की लगातार होती कमी से बहुतायत किसानों के लिए खेती कर पाना नामुमकिन हो गया है। इससे उनमें पीड़ा तथा भारी असन्तोष है। इस बीच बड़े और किसी तरह मझोले किसानों के द्वारा जानवरों से खेती की सुरक्षा के लिए की गयी कँटीले तारों की घेराबन्दी हटाने के एक सरकारी आदेश ने “आग में घी डालने” जैसा काम किया है।

ज़िला अधिकारी प्रतापगढ़ का आदेश
ज़िला अधिकारी प्रतापगढ़ का आदेश


प्रदेश में छुट्टा जानवरों पर क़ाबू के लिए पिछले सालों में गोशालाओं एवं आश्रय स्थलों को बनाये जाने से लेकर छोटे पशुपालकों-किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन देने की अनेक योजनाएँ बनीं लेकिन तमाम ख़र्चों के बावज़ूद कागज़ों और फ़ाइलों में सिमट गयीं! हालाँकि कँटीली बाड़ भी नीलगायों से खेती-बारी को कोई सुरक्षा दे पाने में बौनी साबित हुई। अब भी बहुत जगहों पर नीलगायों के झुण्ड के झुण्ड लम्बी छलाँग लगाते हुए खेतों में पहुँच जाते हैं और पूरी फसल बर्बाद कर देते हैं। इनका अभी तक कोई कारगर इलाज़ नहीं खोज़ा जा सका।


राज्य के ज़ियादातर छोटे किसान तथा पशुपालक दूध न देने वाली गायों और उनके बछड़े/बछियों को खूँटे से बाँधकर पालने में अस्मर्थ हैं। चारा-भूसे की लगातार होती कमी तथा चोकर-दाने की बढ़ती क़ीमतों ने उनकी कमर तोड़ दी है। इससे पशुपालक मवेशियों को खुला छोड़ने को मज़बूर हैं। यह प्रदेश का बड़ा दुर्भाग्य रहा है! इनमें केवल अपनी ज़ुरूरतों तथा इनके दूध की बिक्री के लिए मवेशी पालने वाले- दोनों श्रेणी के लोग शामिल हैं। परिणामत: सभी तरह के अधिकतर मवेशीपालक दूध देने वाली गायों के अलावा बैलों, भैंस और उनके पंड़े/पंड़ियों को पालने में प्राय: अक्षम हो चुके हैं। इसके विपरीत इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर पूरे प्रदेश में गोधन संरक्षण सम्बन्धी कानून सख्ती से लागू है। नतीज़तन गायों और उनके बछड़े-बछियों की ख़रीद-बिक्री तक़रीबन बन्द है। कहीं, कभी कोई गाय-बछिया बिकने की बात आती है तो वह (आदमी) गोदान के लिए ख़रीदने वाला होता है।


प्रदेश में विशेषकर 2017 के बाद आवारा जानवर बढ़ गये। पशुपालन विभाग के अनुसार निराश्रित पशुओं की सङ्ख्या 7 लाख, 33 हज़ार, 666 है। विभाग का दावा है कि 30 अप्रैल, 2019 तक 3 लाख, 21 हज़ार, 546 पशुओं को आश्रय दिया गया।

सचाई गाँवों से लेकर शहरों तक घूमते जानवरों के झुण्ड देखकर समझी जा सकती है। इनसे तंग किन्तु किसी प्रकार से समर्थ किसानों और खेती करने वाले दूसरे छोटे लोगों ने भी कर्ज़ आदि लेकर फ़सलों की सुरक्षा के लिए यहाँ-वहाँ, जैसे-तैसे उपाय किये। समर्थ लोगों ने कँटीले तारों की बाड़ लगवायी। इसने छुट्टा जानवरों को किसी प्रकार रोकने में मदद की। फ़सलों की कुछ हद तक बचत हुई। कँटीले तारों, उनको लगाने के लिए पत्थर के पायों, लोहे की एंगिल या, लकड़ी के थून-थामों के साथ महँगी मज़दूरी पर किसानों को लम्बा खर्च करना पड़ा। अब इन्हें हटाने के लिए शासन/प्रशासन की ओर से आया आदेश ‘तुगलकी फरमान’ जैसा है। इसमें कहा गया है कि “किसान फसल की सुरक्षा के लिए लगाये गये कँटीले तारों की बाड़ हटा लें।” इसकी वज़ह गायों और दूसरे पशुओं की सुरक्षा बतायी गयी है।
देखा यह गया है कि सभी सरकारों के विभिन्न फ़ैसलों/आदेशों के पीछे कुछ न कुछ तर्क हुआ करते हैं। कँटीली बाड़ हटाने के बारे में भी ऐसा ही है। यद्यपि यह (आदेश) फ़सलों के साथ किसानों के दूरगामी हितों के न सिर्फ़ विरुद्ध, बल्कि घोर अदूरदर्शितापूर्ण है!

खेतों में लगे कँटीले तार



आख़िर कोई किसान किसी तरह की बाड़ आदि लगाकर अपनी फ़सल की सुरक्षा करना चाहे तो इसमें सरकार की कोई दख़ल क्यों?
हमारा प्रदेश और देश आज भी मुख्यत: कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाला है। ऐसे में यह ‘फ़रमान’ आने वाले दिनों में प्रदेश की मौज़ूदा सरकार के लिए घातक साबित हो सकता है। मौज़ूदा सरकार के कार्यकाल की आख़िरी छमाही शुरू होने को ही है। ऐसे में एक पुराने निर्णय की रोशनी में कँटीले तारों से खेतों की घेराबन्दी तोड़ने सम्बन्धी आदेश ऐसे वक़्त ज़ारी हुआ है जब सरकार आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने में जुट गयी है।

कई अंग्रेजी अख़बारों से जुड़े रहे पूर्व प्राध्यापक डॉ० शक्ति कुमार पाण्डेय को लगता है कि “कुछ आईएएस अधिकारी चुनावी वर्ष में योगी सरकार को जड़ समेत उखाड़ फेंकने की साजिश कर रहे हैं।” उनके मुताबिक़ “हम जानते हैं कि चुनावी वर्ष में विपक्षीदलों के प्रति वफ़ादारी रखने वाले अधिकारी ऐसे खेल करते हैं। और यह खेल गोरक्षा के नाम पर हो रहा है, ताकि ‘योगी बाबा’ पकड़ न पाएँ। फ़सलों की सुरक्षा के लिए लगायी गयी बाड़ हटाने से किसान का धान तथा दूसरी फ़सलें बर्बाद हो जाएँगी, नतीज़तन वह चालू फ़सली सीज़न के फ़ौरन बाद पड़ने वाले चुनाव में सरकार से बदला लेगा!” वे कहते हैं कि यह आदेश वापस न लिया गया तो प्रदेश में बड़ा किसान आन्दोलन खड़ा हो सकता है।
फ़सलों की सुरक्षा के लिए कँटीले तारों आदि से बनायी गयी बाड़ को हटाने का आदेश ऐसा ही है जो मौज़ूदा सरकार की जड़ों में मट्ठा डालने जैसा हो सकता है। भले यह ‘शासन’ की नज़र में एक सामान्य श्रेणी की कार्यवाही भर हो!
एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि “सरकार गाय, बैलों की रक्षा करना चाहती है- करे, किसी ने उसे रोका नहीं है। …पर खेती-बारी और किसानों को बर्बाद करने वाला कोई निर्णय करने अथवा, कदम उठाने से बाज़ आना चाहिए।” वे माँग करते हैं कि “सरकार एक अभियान चलाकर तत्काल प्रभाव से आवारा जानवरों को रोकने के लिए हर गाँव में एक-दो बाड़े बनवाये, इससे पशु और फसल तो सुरक्षित होंगे ही, गाँव के दो-चार लोगों को समुचित रोज़गार भी मिलेगा।

प्रतापगढ़ के एक सम्भ्रान्त किसान एवं अधिवक्ता पण्डित परशुराम उपाध्याय कहते हैं कि “राज्य सरकार का खेतों की कँटीली बाड़ हटाने सम्बन्धी आदेश अदूरदर्शितापूर्ण है। छुट्टा मवेशियों के उचित प्रबन्ध करने के लिए उसे कारगर कदम फ़ौरन उठने चाहिए, अन्यथा किसानों के हितों और मुख्यतया फ़सलों की सुरक्षा के प्रति की जा रही भारी लापरवाही सरकार पर भारी पड़ सकती है।”

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