किसान नेता राकेश टिकैत ने केंद्र की बीजेपी सरकार पर लगाया वादाखिलाफी का आरोप

31 जनवरी को किसानों का एक प्रोग्राम है वादाखिलाफी, कि जो वादा दिल्ली में किया, उसे पूरा नहीं किया.

उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी जितनी ज्यादा कोशिश कर रही है, विपक्षी पार्टियां और असंतुष्ट किसान, शिक्षक, छात्र और बेरोजगार युवा उतनी ही ज्यादा उनकी कोशिशों पर पानी फेरते हुये दिख रहे हैं. राकेश टिकैत के हालिया कुछ ट्वीट्स तो इसी तथ्य की तस्दीक देते दिखते हैं और मालूम होता है कि एक बार फिर किसान सड़कों पर दिखेंगे.

मीडिया स्वराज डेस्क

यूपी चुनाव और बिहार में छात्र आंदोलन के बीच अब एक बार फिर किसान आंदोलन शुरू होने की सुगबुगाहट दिखने लगी है. किसान आन्दोलन के नेता राकेश टिकैत ने सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि 31 जनवरी को हम फिर आन्दोलन करेंगे. उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने जो वादा किया, उसे पूरा नहीं किया. तो 31 जनवरी को किसानों का एक प्रोग्राम है वादाखिलाफी, कि जो वादा दिल्ली में किया, उसे पूरा नहीं किया.

बता दें कि इस समय राकेश टिकैत के एक के बाद एक कई ट्वीट चर्चा में हैं. 26 जनवरी को उन्होंने एक साल पुराना किसान आंदोलन के दौरान का एक वीडियो अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर किया और सरकार की वादाखिलाफी याद दिलायी. उसके बाद से हर रोज उन्होंने एक एक ट्वीट करके इस ओर इशारा कर दिया है कि 31 जनवरी को क्या होने वाला है.

राकेश टिकैत ने किसानों को लेकर एक पर एक कई ​ट्वीट किये हैं. इसमें कुछ वीडियो भी हैं.

टिकैत ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से एक साल पहले यूपी गेट पर हुई 26 जनवरी 2021 की घटना का वीडियो शेयर किया. वीडियो ट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा कि देश के किसानों-मजदूरों को वो 28 जनवरी भी याद है, और वह रात भी जब अन्नदाता के विश्वास पर गहरा विश्वासघात किया गया था.

राकेश टिकैत ने जो वीडियो ट्वीट किया है, उसमें 28 जनवरी को वो लोगों को समझाते नजर आ रहे हैं कि कुछ उपद्रवी तत्व आंदोलन खत्म कराना चाहते हैं, आंदोलन को बदनाम कराना चाहते हैं. बीजेपी के नेता धमकी दे रहे हैं. इसी दौरान वो मंच पर मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों को वहां से नीचे उतार देते हैं और समर्थकों से कहते हैं कि इनको जाने का रास्ता दिया जाए. ये चीजें वीडियो में दिख रही हैं.

विश्वासघात जिसकी नींव हो, क्रूरता जिनकी परिभाषा हो ।

हिटलरशाही के दम पर आंदोलन को खत्म करने का जो हर संभव षड्यंत्र रचते हो, वे देश के नौजवानों, किसानों, मजदूरों और आदिवासियों के हित में बात कहां करते हैं..?

आन्दोलन में किसानों के परिजनों ने अपने 700 से अधिक अपनों को खोया है । पिछले साल के इन दिनों को किसान कभी नहीं भूलेंगे ।

MSP है किसानों की रीढ़ और किसान चाहते हैं, खेती का भविष्य बचाने के लिए MSP गारंटी कानून ! लड़ाई जारी है, लड़ाई जारी रहेगी ।

मालूम हो कि एक साल से अधिक समय तक यूपी, पंजाब, राजस्थान और हरियाणा के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं को घेरकर आंदोलन किया था. इस आंदोलन के दौरान तमाम तरह की उठापटक देखने को मिली थी. साल 2021 में 26 जनवरी को किसानों ने दिल्ली की सड़कों पर ट्रैक्टर मार्च के दौरान जो उपद्रव किया था, उससे संगठनों की काफी किरकिरी हुई थी. किसान नेताओं को ऐसा लगने लगा था कि अब सरकार हर तरह के हथकंडे अपनाकर आंदोलन स्थल से किसानों और प्रदर्शनकारियों को भगा देगी. इससे दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान नेता काफी घबरा गए थे.

वोट पर बोले टिकैत

एबीपी को एक इंटरव्यू देते हुये भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने साफ किया कि किसानों के साथ जो होगा, किसान उसी के साथ होंगे. वोट देना सभी का मौलिक अधिकार है और यह बताना जरूरी नहीं कि हम किसे वोट देंगे इसलिये बताता कोई भी नहीं. टिकैत ने जाटों के बीजेपी के साथ होने की बात पर कहा, बीजेपी वाले जिस इलाके में जायेंगे, वहां के लोगों को लेकर यही बात कहेंगे. आज जाटों को अपने साथ बता रहे हैं, कल किसी और को अपने साथ बतायेंगे, उनका यह तरीका अब सभी समझने लगे हैं. इसलिये उनकी यह रणनीति अब चलने वाली नहीं है.

जनता पूछे कि मेरे गांव की सड़क बनी कि नहीं

वहीं, दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बाराबंकी में एक निजी कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे टिकैत ने मौजूदा सरकार पर जोरदार प्रहार करते हुये कहा कि 13 महीने आंदोलन चलाकर भी अगर हमें ये बताना पड़े कि वोट किसको दें, तो इसका मतलब ट्रेनिंग पक्की नहीं हुई है. वहीं, जिन्ना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि यह सब ढाई महीने के सरकारी मेहमान हैं. नेता ढाई महीने तक प्रवचन करेंगे, जनता उन पर ना जाए. जनता पूछे कि मेरे गांव की सड़क बनी कि नहीं, मेरे गांव में आवारा पशु तो नहीं, मेरे गांव के स्कूल सही से चल रहे हैं कि नहीं. चुनाव में वोट मांगने के लिये आने वालों से पूछने के लिये हमारे पास ये सभी मुद्दे होने चाहिए.

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केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को लेकर यूपी, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों ने आंदोलन शुरू किया था. पंजाब के किसान अपने ट्रैक्टरों के साथ टीकरी बार्डर, सिंघु बार्डर और यूपी गेट पर धरना देकर प्रदर्शन कर रहे थे. केंद्र सरकार की किसानों के साथ कई दौर की बातचीत हुई मगर उसका कोई रिजल्ट नहीं निकल सका. किसानों की मांग को देखते हुए सरकार ने कई कदम उठाए मगर कुछ काम नहीं आ सका. आखिर में गुरू पूर्णिमा के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद ही घोषणा कर दी कि तीनों कृषि कानून स्थगित किए जा रहे हैं. उनकी इस घोषणा के एक सप्ताह बाद किसान संगठनों ने दिल्ली की सीमाओं से अपने टेंट समेटने शुरू किए. किसानों के आंदोलन के दौरान इन सीमाओं पर रोजगार करने वाले दुकानदारों आदि का कारोबार पूरी तरह से चौपट हो गया था. अब धीरे-धीरे उनका कारोबार पटरी पर लौट रहा है.

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